
अंतरिक्ष की दुनिया में आज एक ऐसी जंग छिड़ चुकी है जिसकी गूंज आने वाले समय में वैश्विक तकनीकी बाजार और भू-राजनीतिक समीकरणों पर गहरा असर डालने वाली है। तकनीक और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच चल रही वर्चस्व की लड़ाई अब आसमान की ऊंचाइयों को छूने लगी है। हाल ही में चीन ने अंतरिक्ष की कक्षा में अपने ‘डिजिटल चक्रव्यूह’ को और अधिक मजबूत बनाते हुए लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में इंटरनेट सैटेलाइट्स की एक और नई और भारी-भरकम खेप सफलताપूर्वक लॉन्च कर दी है। चीन का यह महत्वाकांक्षी कदम यह साफ जाहिर करता है कि बीजिंग अब अंतरिक्ष आधारित संचार व्यवस्था में वैश्विक एकाधिकार को तोड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार बैठा है। इस नई खेप के अंतरिक्ष में स्थापित होने के बाद चीन के उस मेगा कॉन्स्टिलेशन प्रोजेक्ट को एक नया आयाम मिल गया है, जिसके जरिए वह पूरी दुनिया को अपनी हाई-स्पीड इंटरनेट सेवाओं के दायरे में लाने की योजना पर चुपचाप काम कर रहा है। अंतरिक्ष में बिछ रहा यह तकनीकी जाल न केवल दूरदराज के इलाकों में संपर्क को आसान बनाएगा, बल्कि आने वाले दिनों में अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए एक बहुत बड़ी रणनीतिक चुनौती भी पेश करेगा।
एलन मस्क की स्टारलिंक के सामने अब खड़ा हुआ सीधा और सबसे बड़ा ड्रैगन प्रतिद्वंदी
जब भी अंतरिक्ष आधारित सैटेलाइट इंटरनेट की बात होती है, तो सबसे पहले दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स और उनके ‘स्टारलिंक’ (Starlink) प्रोजेक्ट का नाम जुबान पर आता है। स्टारलिंक ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी हजारों सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में स्थापित करके वैश्विक इंटरनेट बाजार में एकछत्र राज स्थापित किया है, जिससे सुदूर इलाकों में भी बिना किसी रुकावट के हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड सेवाएं मिल रही हैं। लेकिन अब चीन द्वारा लॉन्च की गई इंटरनेट सैटेलाइट्स की इस नई खेप ने एलन मस्क और उनकी कंपनी की नींद उड़ा दी है। बीजिंग समर्थित इन कंपनियों का मुख्य उद्देश्य स्टारलिंक के इस वैश्विक दबदबे को सीधे तौर पर टक्कर देना और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी मजबूत करना है। रक्षा और अंतरिक्ष विश्लेषकों का मानना है कि चीन इस क्षेत्र में बहुत तेजी से निवेश कर रहा है और उसकी तकनीक अब पश्चिमी देशों की कंपनियों को कड़ी टक्कर देने के लिए पूरी तरह से सक्षम होती जा रही है। एलन मस्क के लिए यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि चीनी कंपनियां सरकारी बैकिंग के दम पर कम कीमतों पर अपनी सेवाएं मुहैया कराने की ताकत रखती हैं, जिससे ग्लोबल मार्केट में एक नया और भीषण मूल्य युद्ध छिड़ सकता है।
कैसे काम करता है यह ‘डिजिटल चक्रव्यूह’ और अंतरिक्ष में चीन की क्या है बड़ी दीर्घकालिक रणनीति?
चीन के इस नए अंतरिक्ष अभियान को तकनीकी रूप से ‘डिजिटल चक्रव्यूह’ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि इसके तहत हजारों की संख्या में छोटे उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया जा रहा है, जो एक अदृश्य नेटवर्क की तरह पूरी दुनिया को अपने आगोश में ले लेंगे। पारंपरिक भू-स्थिर उपग्रहों के मुकाबले लो अर्थ ऑर्बिट में मौजूद ये सैटेलाइट्स धरती के बहुत करीब होते हैं, जिसके कारण डेटा ट्रांसमिशन में लगने वाला समय यानी लेटेंसी बेहद कम हो जाती है और यूजर्स को मक्खन की तरह तेज इंटरनेट स्पीड मिलती है। चीन की इस रणनीति के दो मुख्य पहलू हैं, पहला वाणिज्यिक लाभ कमाना और दूसरा भू-सामरिक और सैन्य सुरक्षा को चाक-चौबंद करना। आज के दौर में युद्ध केवल जमीन, पानी और हवा में नहीं लड़े जाते, बल्कि अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स की सुरक्षा और उनकी मारक क्षमता किसी भी देश की ताकत तय करती है। चीन अपने इस नेटवर्क के जरिए न केवल दुनिया के डिजिटल बुनियादी ढांचे पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है, बल्कि वह अमेरिका पर अपनी तकनीकी निर्भरता को भी पूरी तरह से समाप्त करना चाहता है। यही वजह है कि पश्चिमी देशों की खुफिया एजेंसियां और स्पेस रिसर्च संस्थान चीन के इस तेजी से बढ़ते अंतरिक्ष साम्राज्य पर बेहद बारीकी से नजर बनाए हुए हैं।
वैश्विक कूटनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरिक्ष संप्रभुता पर इस लॉन्चिंग का क्या होगा दूरगामी प्रभाव?
अंतरिक्ष में बढ़ती इस होड़ ने पूरी दुनिया की भू-राजनीति को एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहाँ हर देश अपनी अंतरिक्ष सीमाओं को सुरक्षित करने के लिए हाथ-पैर मार रहा है। अंतरिक्ष अब किसी वैज्ञानिक प्रयोग की जगह नहीं, बल्कि एक ऐसा व्यावसायिक और रणनीतिक अखाड़ा बन चुका है जहाँ वर्चस्व की जंग सीधे तौर पर राष्ट्रों की आर्थिक और सैन्य ताकत को प्रभावित करती है। चीन द्वारा लगातार अंतरिक्ष में छोड़े जा रहे ये संचार उपग्रह आने वाले समय में दुनिया के कई विकासशील और उभरते बाजारों को अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं, क्योंकि चीनी कंपनियां इन्हें बेहद किफायती दरों पर पेश करने की योजना बना रही हैं। हालांकि, इसके साथ ही अंतरिक्ष में कचरे (Space Debris) की समस्या भी विकराल रूप लेती जा रही है, जिस पर पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने गंभीर चिंता जताई है। यदि इसी रफ्तार से अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स के अंबार लगते रहे, तो आने वाले समय में टकराव का खतरा और अधिक बढ़ जाएगा। इसके बावजूद, चीन ने जिस आक्रामक अंदाज में अपनी इस योजना को अमलीजामा पहनाना शुरू किया है, उससे यह साफ हो गया है कि आने वाला दशक अंतरिक्ष की तकनीक और वाणिज्यिक इंटरनेट क्रांति के नाम रहने वाला है, जिसमें अमेरिका और चीन के बीच की यह टक्कर पूरी दुनिया के तकनीकी भविष्य की दिशा तय करेगी।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया