
सनातन धर्म और हिंदू वैदिक पंचांग के अनुसार 11 सितंबर का दिन धार्मिक दृष्टिकोण से अत्यंत पावन और फलदायी है। आज भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि है, जिसे लोक परंपरा में ‘पिठोरी अमावस्या’ या ‘कुशग्रहणी अमावस्या’ के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों में इस अमावस्या को पितरों की तृप्ति, कालसर्प दोष निवारण और संतान के दीर्घायु जीवन की कामना के लिए सर्वोत्तम तिथियों में से एक माना गया है।
पंचांग गणना के पांच मुख्य अंगों—तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण—का तालमेल आज के दिन कई अत्यंत शुभ योगों की रचना कर रहा है। आज शुक्रवार का दिन होने के कारण माता महालक्ष्मी और पितरों की संयुक्त कृपा प्राप्त करने का भी दुर्लभ संयोग बना हुआ है। पवित्र नदियों में स्नान, पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और दीपदान करने से जीवन के समस्त कष्टों का निवारण होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
11 सितंबर का पंचांग: तिथि, नक्षत्र और पंचांग के मुख्य घटक
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दिनांक: 11 सितंबर
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संवत: विक्रम संवत 2083, शक संवत 1948
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मास: भाद्रपद (भादों)
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पक्ष: कृष्ण पक्ष
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तिथि: अमावस्या (पिठोरी अमावस्या / भाद्रपद अमावस्या)
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दिन/वार: शुक्रवार
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नक्षत्र: पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र (उपरांत उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र)
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योग: सिद्ध योग (इसके उपरांत साध्य योग)
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करण: चतुष्पद (तदोपरांत नाग करण)
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चंद्र राशि: सिंह राशि (सूर्य के स्वामित्व वाली राशि में चंद्रमा का संचरण)
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सूर्य राशि: सिंह राशि
आज के सबसे शुभ मुहूर्त: अभिजीत, विजय और अमृत काल का समय
धार्मिक कार्यों, पितृ तर्पण, नए संकल्प अथवा मांगलिक अनुष्ठानों को शुभ मुहूर्त में करने से उनके फलों में कई गुना वृद्धि होती है। आज के प्रमुख शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं:
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ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:32 से प्रातः 05:18 तक (स्नान, ध्यान और पितृ स्मरण के लिए सर्वश्रेष्ठ)
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प्रातः सन्ध्या: प्रातः 04:55 से प्रातः 06:04 तक
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अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:53 से दोपहर 12:43 तक (इस समय किए गए किसी भी नए कार्य में विजय प्राप्त होती है)
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विजय मुहूर्त: दोपहर 02:22 से दोपहर 03:12 तक
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गोधूलि मुहूर्त: सायं 06:31 से सायं 06:54 तक (संध्या वंदन और मुख्य द्वार पर दीप प्रज्वलन के लिए सर्वोत्तम)
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अमृत काल: रात्रि 10:15 से रात्रि 11:48 तक
अशुभ मुहूर्त और राहुकाल का समय: इन घड़ियों में भूलकर भी न करें शुभ कार्य
वैदिक ज्योतिष में राहुकाल और यमगण्ड को अशुभ काल माना गया है। इस समय किसी भी नए व्यवसाय, यात्रा अथवा मांगलिक कार्य का आरंभ करने से बचना चाहिए।
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राहुकाल (Rahu Kaal): प्रातः 10:44 से दोपहर 12:17 तक (इस समयावधि में कोई भी नवीन कार्य प्रारंभ न करें)
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यमगण्ड काल: दोपहर 03:24 से सायं 04:57 तक
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गुलिक काल: प्रातः 07:37 से प्रातः 09:11 तक
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दुर्मुहूर्त: प्रातः 08:34 से प्रातः 09:24 तक एवं पुनः दोपहर 12:43 से दोपहर 01:33 तक
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दिशाशूल: पश्चिम दिशा (यदि पश्चिम दिशा की ओर यात्रा आवश्यक हो, तो घर से जौ अथवा राई खाकर और भगवान का स्मरण कर ही निकलें)
भाद्रपद (पिठोरी) अमावस्या का धार्मिक महत्व और पितृ शांति के उपाय
पिठोरी अमावस्या के दिन माताएं अपने बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य, सुरक्षा और दीर्घायु जीवन के लिए 64 योगिनियों और मां दुर्गा की आटे की प्रतिमा बनाकर विधिवत पूजन करती हैं। इसके अतिरिक्त पितृ तर्पण के लिए भी इस दिन का विशेष महत्व है:
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प्रातःकाल किसी पवित्र नदी, सरोवर या घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान करें और सूर्य देव को तांबे के लोटे से अर्घ्य दें।
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दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पितरों के निमित्त जल में काले तिल, कच्चा दूध और जौ मिलाकर तर्पण करें।
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दोपहर के समय पंचबलि कर्म (गाय, कुत्ता, कौआ, देवादि और चींटी) को भोजन का अंश अवश्य अर्पित करें।
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पीपल के वृक्ष की जड़ में जल और कच्चा दूध अर्पित करें तथा संध्या के समय सरसों के तेल का चौमुखा दीपक जलाएं।
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शुक्रवार का दिन होने के कारण संध्याकाल में घर के ईशान कोण में गाय के घी का दीपक जलाकर कनकधारा स्तोत्र या श्री सूक्त का पाठ करें, जिससे पितृ दोष के साथ दरिद्रता भी दूर होती है।
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