
भगवान विष्णु के आठवें पूर्णावतार और जगत के पालनहार योगेश्वर श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव यानी ‘श्रीकृष्ण जन्माष्टमी’ सनातन धर्म का सबसे बड़ा और उल्लासपूर्ण महापर्व है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के शुभ संयोग में भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य मथुरा के कारागार में हुआ था। हर वर्ष की भाद्रपद अष्टमी पर देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालु बाल गोपाल के स्वागत में उपवास रखते हैं और मध्यरात्रि में उनका जन्मोत्सव मनाते हैं।
इस वर्ष भी पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि के दो दिन व्याप्त रहने के कारण जनमानस में यह असमंजस बना हुआ है कि जन्माष्टमी का पावन व्रत 4 सितंबर को रखा जाए या 5 सितंबर को। शास्त्रों और धर्मग्रंथों में गृहस्थों (स्मार्त संप्रदाय) और साधु-संतों (वैष्णव संप्रदाय) के लिए व्रत रखने के अलग-अलग नियम प्रतिपादित किए गए हैं। आइए इस लेख में विस्तार से समझते हैं कि आपके लिए जन्माष्टमी का व्रत किस दिन रखना शास्त्रसम्मत रहेगा, साथ ही जानते हैं मध्यरात्रि निशिता काल पूजा का सटीक मुहूर्त, अभिषेक विधि और पारण का सही समय।
4 या 5 सितंबर: किस दिन मनेगी जन्माष्टमी? समझें अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का गणित
धार्मिक मान्यताओं और पंचांग गणना के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि (निशिता काल) में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयुक्त प्रभाव में हुआ था। जब भी अष्टमी तिथि दो दिन पड़ती है, तो तिथियों के मान और परंपरा के अनुसार व्रत के दो अलग-अलग दिन तय होते हैं:
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स्मार्त संप्रदाय (गृहस्थ जन): गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग उस दिन व्रत रखते हैं जिस दिन अर्धरात्रि में अष्टमी तिथि विद्यमान होती है। इस गणना के अनुसार गृहस्थों और स्मार्त परंपरा के अनुयायियों के लिए 4 सितंबर का दिन जन्माष्टमी व्रत के लिए शास्त्रसम्मत माना गया है, क्योंकि 4 सितंबर की मध्यरात्रि को अष्टमी तिथि का पूर्ण प्रभाव रहेगा।
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वैष्णव संप्रदाय और इस्कॉन (ISKCON): साधु-संत, संन्यासी और वैष्णव परंपरा को मानने वाले उदयकालिक अष्टमी तिथि और नवमी युक्ता अष्टमी को प्राथमिकता देते हैं। इसलिए मथुरा के प्रमुख बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन और इस्कॉन मंदिरों में जन्माष्टमी का भव्य उत्सव 5 सितंबर को मनाया जाएगा।
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अष्टमी तिथि प्रारंभ: 4 सितंबर की दोपहर से
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अष्टमी तिथि समाप्त: 5 सितंबर की दोपहर/शाम तक
यदि आप गृहस्थ हैं और मध्यरात्रि में भगवान के जन्म का उत्सव मनाते हैं, तो 4 सितंबर का व्रत आपके लिए सर्वोत्तम है। वहीं यदि आप वैष्णव परंपरा या स्थानीय मंदिर की उदया तिथि प्रणाली का अनुसरण करते हैं, तो 5 सितंबर को जन्मोत्सव मनाना फलदायी रहेगा।
जन्माष्टमी 2026: निशिता काल मध्यरात्रि पूजन का सबसे शुभ और फलदायी मुहूर्त
शास्त्रों के अनुसार जन्माष्टमी का मुख्य पूजन और बाल गोपाल का अभिषेक सदैव ‘निशिता काल’ यानी मध्यरात्रि के समय ही किया जाता है। इस अवधि में पूरे ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा और देवत्व का संचार होता है:
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निशिता काल पूजा का समय: रात 11:57 बजे से देर रात 12:43 बजे तक (कुल अवधि लगभग 45 से 48 मिनट)
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मध्यरात्रि का क्षण (श्रीकृष्ण जन्म समय): ठीक 12:00 बजे
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अभिजित मुहूर्त (दिन का शुभ समय): दोपहर 11:54 बजे से दोपहर 12:45 बजे तक
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विजय मुहूर्त: दोपहर 02:26 बजे से दोपहर 03:17 बजे तक
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गोधूलि वेला: शाम 06:38 बजे से शाम 07:01 बजे तक
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अमृत चौघड़िया मुहूर्त: रात 10:45 बजे से देर रात 12:15 बजे तक
निशिता काल के इस 45 मिनट के पावन अंतराल में भगवान श्रीकृष्ण का पंचामृत से अभिषेक, श्रृंगार और भोग अर्पण करना साधक की सभी मनोकामनाओं को सिद्ध करने वाला माना गया है।
लड्डू गोपाल की संपूर्ण पूजा विधि: पंचामृत अभिषेक से लेकर छप्पन भोग तक
जन्माष्टमी के दिन प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि के बाद सूर्य देव को जल अर्पित करें और हाथ में गंगाजल व तुलसी दल लेकर व्रत का संकल्प लें। दिनभर फलाहार या निर्जला व्रत रखकर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ और ‘हरे कृष्ण हरे राम’ महामंत्र का निरंतर जप करें।
शाम के समय घर के पूजा घर या आंगन को फूलों, अशोक के पत्तों और रंगोली से सजाएं। एक सुंदर पालने या झूले को फूलों और मोतियों से सजाकर उसमें बाल गोपाल की धातु या अष्टधातु की प्रतिमा स्थापित करें।
मध्यरात्रि 12:00 बजे शंख की पावन ध्वनि और घंटियों के नाद के साथ भगवान का जन्मोत्सव शुरू करें। एक बड़े शंख या तांबे/चांदी के पात्र में शुद्ध गाय का कच्चा दूध, दही, देसी घी, गंगाजल और शहद मिलाकर पंचामृत तैयार करें। इस पंचामृत से लड्डू गोपाल का भक्तिभाव से अभिषेक करें।
अभिषेक के पश्चात प्रभु को स्वच्छ जल से स्नान कराकर साफ सूती वस्त्र से पोंछें। इसके बाद उन्हें नए पीले या चमकीले वस्त्र, मोरपंख लगा मुकुट, वैजयंती माला, बाजूबंद, कुंडल और कमरबंद धारण कराएं। भगवान के माथे पर सुगंधित चंदन और कस्तूरी का तिलक लगाएं तथा उनकी नन्हीं हथेली में सुंदर बांसुरी अर्पित करें।
भगवान श्रीकृष्ण को उनका सबसे प्रिय भोग—ताजा माखन, पिसी मिश्री, पंजीरी (धनिया और मेवे की पंजीरी), ऋतु फल, पंचमेवा, खीर और यदि संभव हो तो छप्पन प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाएं। ध्यान रहे कि श्रीकृष्ण के किसी भी भोग में तुलसी का पत्ता (तुलसी दल) अवश्य शामिल होना चाहिए, क्योंकि बिना तुलसी दल के प्रभु भोग स्वीकार नहीं करते हैं।
भोग अर्पण के पश्चात सुगंधित धूप-दीप प्रज्वलित कर श्रीकृष्ण की पौराणिक जन्म कथा सुनें। इसके बाद कपूर और शुद्ध घी के दीपक से ‘आरती कुंजबिहारी की’ गाते हुए प्रभु की आरती उतारें। अंत में लड्डू गोपाल को श्रद्धापूर्वक झूले में झुलाएं और घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करें।
जन्माष्टमी व्रत पारण के सटीक नियम और समय
जन्माष्टमी के व्रत का पारण शास्त्र सम्मत नियमों के अनुसार ही करना चाहिए, तभी व्रत का पूर्ण पुण्य फल प्राप्त होता है:
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पारण का समय: जो श्रद्धालु मध्यरात्रि पूजा के बाद व्रत का पारण करते हैं, वे रात 12:45 बजे के बाद भगवान का चरणामृत, माखन-मिश्री और पंजीरी का प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोल सकते हैं।
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सूर्योदय पारण नियम: कई पंचांगों और परंपराओं के अनुसार जन्माष्टमी व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद अष्टमी तिथि अथवा रोहिणी नक्षत्र की समाप्ति पर किया जाता है। ऐसे में 5 सितंबर की सुबह स्नानादि और सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद सात्विक अन्न से पारण करना अत्यंत उत्तम है।
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पारण में क्या खाएं: पारण करते समय सबसे पहले पंचामृत और तुलसी दल युक्त माखन-मिश्री का प्रसाद ग्रहण करें। इसके बाद कुट्टू, सिंघाड़े के आटे का व्यंजन अथवा बिना प्याज-लहसुन का सात्विक भोजन ग्रहण करें।
मथुरा, वृंदावन से लेकर महाराष्ट्र की दही हांडी तक: देश भर में जन्माष्टमी की अनुपम छटा
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन उत्सव केवल उत्तर भारत ही नहीं, बल्कि पूरे देश और दुनिया में अनूठी सांस्कृतिक विविधता के साथ मनाया जाता है:
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मथुरा और वृंदावन: कान्हा की जन्मभूमि मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर और वृंदावन के विश्वप्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर व प्रेम मंदिर में लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। पूरे ब्रजमंडल में ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के जयकारे गूंजते हैं और बाल स्वरूप की भव्य मंगला आरती की जाती है।
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महाराष्ट्र और गुजरात: पश्चिमी भारत, विशेषकर मुंबई, ठाणे और पुणे में जन्माष्टमी के अगले दिन ‘दही हांडी’ और ‘गोविंदा उत्सव’ का विशाल आयोजन होता है। सैकड़ों फीट की ऊंचाई पर बांधी गई माखन की हांडी को फोड़ने के लिए युवाओं की टोलियां मानव पिरामिड बनाती हैं।
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द्वारका और पुरी: गुजरात के द्वारकाधीश मंदिर और ओडिशा के जगन्नाथ पुरी धाम में इस दिन भगवान का राजभोग श्रृंगार और विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। दक्षिण भारत में घरों के प्रवेश द्वार पर चावल के आटे से बाल कृष्ण के नन्हें पदचिह्न बनाए जाते हैं, जो घर में प्रभु के आगमन का प्रतीक हैं।
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