जीवित्पुत्रिका व्रत सितंबर या अक्टूबर में कब? दूर करें 2026 की सही तारीख, नहाय-खाय, शुभ मुहूर्त और पारण का पूरा संशय

मातृस्नेह, त्याग और संतान की दीर्घायु का महापर्व जीवित्पुत्रिका व्रत यानी जितिया को लेकर हर साल पंचांग तिथियों के फेर में माताओं के मन में असमंजस की स्थिति बन जाती है। इस साल भी महिलाएं इस बात को लेकर पशोपेश में हैं कि जितिया का निर्जला व्रत सितंबर के अंत में पड़ेगा या अक्टूबर की शुरुआत में। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह पावन उपवास वर्ष 2026 में अक्टूबर महीने के पहले सप्ताह में पड़ रहा है। हिंदू धर्म शास्त्रों और उदया तिथि की प्रामाणिक गणना के मुताबिक, मुख्य जितिया व्रत शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 को पूरे विधि-विधान से रखा जाएगा।

जीवित्पुत्रिका व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मातृत्व की असीम शक्ति और संतान के आरोग्य, सुरक्षा तथा वंश वृद्धि की अखंड साधना का प्रतीक है। उत्तर भारत, विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) और नेपाल के मिथिला व तराई अंचलों में इस पर्व की छटा देखते ही बनती है। माताएं अपनी संतानों के समस्त संकटों को हरने के लिए पूरे चौबीस घंटे से अधिक समय तक अन्न और जल की एक बूंद भी ग्रहण किए बिना ‘खर जितिया’ का कठोर निर्जला संकल्प निभाती हैं।

आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि का आरंभ, समापन और उदया तिथि का निर्णय

पंचांग गणना के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर 2026, शनिवार को प्रात:काल 07 बजकर 58 मिनट से प्रारंभ होगी। इस तिथि का समापन अगले दिन यानी रविवार, 4 अक्टूबर 2026 को तड़के 05 बजकर 51 मिनट पर होगा। धर्मशास्त्रों के नियम के अनुसार, जब प्रदोष काल और उदया व्यापिनी अष्टमी तिथि का संयोग बनता है, उसी दिन खर जितिया का निर्जला व्रत रखा जाता है। 3 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद दिनभर अष्टमी तिथि विद्यमान रहने तथा सायंकालीन प्रदोष पूजा का उत्तम योग मिलने के कारण 3 अक्टूबर 2026 को ही जितिया व्रत की मूल साधना की जाएगी।

क्षेत्रीय मिथिला, बनारसी और अन्य स्थानीय पंचांगों में सूर्योदय काल के कुछ मिनटों के अंतर के कारण समय में आंशिक भिन्नता संभव है, किंतु मुख्य व्रत का दिन पूरे देश में सर्वसम्मति से 3 अक्टूबर ही मान्य रहेगा।

जितिया 2026 का तीन दिवसीय पारंपरिक कैलेंडर: नहाय-खाय से पारण तक

जीवित्पुत्रिका पर्व का अनुष्ठान तीन दिनों की क्रमिक आध्यात्मिक प्रक्रिया में संपन्न होता है। हर एक दिन का अपना अलग खान-पान और आत्मशुद्धि का विधान है:

  • पहला दिन (नहाय-खाय): शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026 — पर्व की शुरुआत पवित्र नदी, जलाशय अथवा घर पर गंगाजल युक्त जल से स्नान के साथ होगी। व्रती माताएं इस दिन पूरी सात्विकता के साथ केवल शुद्ध शाकाहारी भोजन बनाती हैं। परंपरा के अनुसार, इस दिन तोरई (नेनुआ) की सब्जी, मडुआ (रागी) की रोटी, नोनी का साग और माछ-भात (परंपरानुसार कुछ क्षेत्रों में) ग्रहण किया जाता है। रात्रि के अंतिम प्रहर में भोर होने से पहले ‘ओठगन’ (सरगही) की रस्म पूरी की जाती है, जिसके बाद व्रत का कड़ा संकल्प शुरू होता है।

  • दूसरा दिन (खर जितिया / मुख्य निर्जला व्रत): शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 — यह पर्व का सबसे प्रमुख दिन है। व्रती महिलाएं सूर्योदय के साथ ही निर्जला व्रत धारण करती हैं। दिनभर भजन-कीर्तन, शाम के समय नदी तट या आंगन में तालाब बनाकर भगवान जीमूतवाहन, चील और सियारिन की विधिवत पूजा-अर्चना और कथा श्रवण का क्रम चलता है।

  • तीसरा दिन (पारण): रविवार, 4 अक्टूबर 2026 — अष्टमी तिथि के समाप्त होने और सूर्योदय के उपरांत ही व्रत का पारण किया जाता है। 4 अक्टूबर को सुबह 06:00 बजे के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य देकर, नोनी का साग, मडुआ की रोटी और भीगे हुए चने का प्रसाद खाकर व्रत खोला जाएगा।

पूजन के श्रेष्ठ शुभ मुहूर्त और राहुकाल का त्याग

धार्मिक अनुष्ठानों में शुभ चौघड़िया और अनुकूल नक्षत्र का ध्यान रखना पूजा के फल को कई गुना बढ़ा देता है। 3 अक्टूबर 2026 को पूजा-अर्चना और उपासना के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त इस प्रकार रहेंगे:

  • ब्रह्म मुहूर्त: प्रात:काल 06:14 बजे से 07:03 बजे तक (ईश्वर स्मरण एवं ध्यान हेतु)

  • प्रात: सन्ध्या मुहूर्त: सुबह 06:38 बजे से सुबह 07:53 बजे तक

  • अभिजित मुहूर्त: दोपहर 01:16 बजे से दोपहर 02:02 बजे तक (दिन का सर्वश्रेष्ठ विजयकारी मुहूर्त)

  • विजय मुहूर्त: दोपहर 03:35 बजे से शाम 04:21 बजे तक

  • गोधूलि वेला: शाम 07:26 बजे से 07:50 बजे तक (प्रदोष कालीन कथा पाठ के लिए अति उत्तम)

  • सायाह्न सन्ध्या: रात 07:26 बजे से रात 08:40 बजे तक

ज्योतिष शास्त्र में राहुकाल को किसी भी मांगलिक या फलदायी पूजा के लिए वर्जित माना गया है। 3 अक्टूबर को राहुकाल का समय सुबह 10 बजकर 46 मिनट से दोपहर 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगा। व्रती माताओं को सलाह दी जाती है कि इस समय अवधि में मुख्य पूजन, संकल्प अथवा कथा वाचन करने से बचें।

पूजा की संपूर्ण प्रामाणिक विधि और चील-सियारिन कथा का रहस्य

जीवित्पुत्रिका व्रत की पूजा प्रक्रिया अत्यंत अनूठी और प्रकृति प्रेम को समर्पित है। इस दिन गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन की प्रतिमा कुशा (घास) से बनाई जाती है। आंगन में छोटा सा पोखर या गर्त खोदा जाता है, जिसके किनारे पाकड़ की डाल लगाई जाती है। मिट्टी अथवा गाय के गोबर से सियारिन (लोमड़ी) और चील की प्रतिमाएं तैयार कर उन्हें सिंदूर, काजल, अक्षत और पुष्प अर्पित किए जाते हैं।

व्रती महिलाएं पीले और लाल रंग के सूत से बना ‘जिउतिया धागा’ गले में धारण करती हैं, जिसमें गांठें बांधी जाती हैं। पूजा की थाली में बांस के पत्तों पर सरसों का तेल और खली रखी जाती है, जिसे बाद में संतानों के सिर पर लगाने की परंपरा है। इसके उपरांत जीमूतवाहन की दानवीरता और चील व सियारिन की वह पौराणिक कथा सुनी जाती है, जिसमें चील ने भूख से व्याकुल होने पर भी अपने व्रत की मर्यादा नहीं तोड़ी, जिसके पुण्य प्रताप से उसकी सभी संतानें दीर्घायु और तेजस्वी बनीं, जबकि भूख के वश में आकर सियारिन द्वारा मांस का टुकड़ा खा लिए जाने के कारण उसकी संतानें जीवित नहीं बच पाईं। यह कथा त्याग और संयम का सबसे बड़ा संदेश देती है।

पारण का सटीक समय और स्वास्थ्य का ध्यान

3 अक्टूबर को पूरे 24 घंटे से अधिक का निर्जला व्रत रखने के बाद 4 अक्टूबर की सुबह पारण किया जाएगा। पंचांग के अनुसार 4 अक्टूबर को सूर्योदय के पश्चात सुबह 06:00 बजे के बाद ही पारण संपन्न करें। पारण हमेशा सूर्य भगवान को जल अर्पित करने और अपने कुलदेवता व पितरों को नमन करने के बाद ही किया जाता है।

आयुर्वेद और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, 24 घंटे के निर्जला उपवास के तुरंत बाद भारी, तला-भुना या अत्यधिक मीठा भोजन नहीं करना चाहिए। व्रत खोलते समय सबसे पहले सादा पानी, नींबू पानी या थोड़ा सा मट्ठे का सेवन करें। इसके बाद पारंपरिक नोनी का साग, खीरा, अंकुरित भीगा चना और मडुआ की रोटी खाएं। यह आहार पाचन तंत्र को सुचारू बनाए रखने में मदद करता है। गर्भवती महिलाओं और किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त महिलाओं को निर्जला उपवास के कठोर नियमों में स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए स्थानीय पुरोहितों के परामर्श से फलाहार का विकल्प चुनना चाहिए।

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