पितृ पक्ष इंदिरा एकादशी: जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पारण का सटीक समय

सनातन परंपरा में पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) के दौरान पड़ने वाली इंदिरा एकादशी का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस एकादशी का व्रत करने और इसके पुण्य का फल अपने पितरों को समर्पित करने से पूर्वजों को यमलोक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है और वे सीधे मोक्ष (बैकुंठ धाम) प्राप्त करते हैं। यदि किसी पूर्वज से जाने-अनजाने में कोई पाप हुआ हो, तो इस दिन किए गए श्राद्ध, तर्पण और उपवास से उनके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

इंदिरा एकादशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का समय इस प्रकार है:

  • एकादशी तिथि प्रारंभ: 5 अक्टूबर (सोमवार) की शाम से

  • एकादशी तिथि समाप्त: 6 अक्टूबर (मंगलवार) की दोपहर/शाम तक

  • व्रत का दिन (उदयातिथि): सनातन धर्म में उदयातिथि का विशेष महत्व होता है। चूंकि 6 अक्टूबर (मंगलवार) को सूर्योदय के समय एकादशी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए इंदिरा एकादशी का उपवास 6 अक्टूबर, मंगलवार को ही रखा जाएगा।

व्रत पारण का समय और नियम

एकादशी व्रत का संपूर्ण फल तभी मिलता है जब उसका पारण नियत समय और विधि-विधान से द्वादशी तिथि के भीतर किया जाए:

  • पारण की तिथि: 7 अक्टूबर (बुधवार)

  • पारण का शुभ समय: 7 अक्टूबर को प्रातःकाल 06:18 AM से 08:38 AM के बीच।

  • पारण के नियम:

    1. पारण से पूर्व सुबह स्नान कर भगवान शालिग्राम अथवा श्रीहरि विष्णु की विधिवत पूजा करें।

    2. किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएं तथा सामर्थ्य अनुसार अन्न, वस्त्र और दक्षिणा दें।

    3. गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए ‘पंचबलि’ का भाग अवश्य निकालें।

    4. इसके बाद ही सात्विक भोजन ग्रहण कर अपना व्रत खोलें।

इंदिरा एकादशी पूजा विधि संक्षेप में

  • संकल्प: प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके हाथ में जल, कुश, अक्षत और तिल लेकर पितरों के निमित्त व्रत का संकल्प लें।

  • विष्णु व शालिग्राम अर्चन: भगवान शालिग्राम को गंगाजल और पंचामृत से स्नान कराएं। पीला चंदन, पीले पुष्प और तुलसी दल अर्पित करें (ध्यान रहे कि एकादशी के दिन तुलसी पत्र नहीं तोड़े जाते, इसे एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें)।

  • मंत्र व पाठ: ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का 108 बार जप करें तथा श्रीमद्भगवद्गीता के सातवें या ग्यारहवें अध्याय का पाठ करें।

  • पितरों का तर्पण: दोपहर के समय पितरों के निमित्त दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल और काले तिल से तर्पण करें।

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