‘बहुत कुछ मिटा देंगे!’ शुभेंदु अधिकारी की तीखी चेतावनी के बाद जादवपुर यूनिवर्सिटी में मचा हड़कंप, कैंपस की दीवारों पर शुरू हुई पेंटिंग और पुताई; बंगाल की राजनीति में नया उबाल

पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपने आक्रामक तेवरों के लिए पहचाने जाने वाले विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी के एक बयान ने राज्य के सियासी और शैक्षणिक गलियारों में नया बवंडर खड़ा कर दिया है। राज्य की सबसे प्रतिष्ठित और अक्सर छात्र आंदोलनों के केंद्र में रहने वाली जादवपुर यूनिवर्सिटी (JU) को लेकर दिए गए उनके कड़े बयान के बाद कैंपस की दीवारों की सूरत तेजी से बदलने लगी है। शुभेंदु अधिकारी ने सीधे और सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा था कि यूनिवर्सिटी की दीवारों पर मौजूद देशविरोधी, आपत्तिजनक और विवादित नारों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और ‘बहुत कुछ मिटा दिया जाएगा’। इस बयान के कुछ ही समय बाद कैंपस की चर्चित दीवारों पर सफेदी पोतने और नए सिरे से पेंटिंग करने का सिलसिला शुरू हो गया है।

कोलकाता, साल्ट लेक, हावड़ा और उत्तर 24 परगना समेत पूरे पश्चिम बंगाल में यह घटनाक्रम चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। जादवपुर यूनिवर्सिटी केवल एक विश्वविद्यालय नहीं है, बल्कि दशकों से बंगाल की वामपंथी विचारधारा, छात्र सक्रियता और राजनीतिक बहसों का सबसे बड़ा गढ़ मानी जाती रही है। ऐसे में भाजपा के शीर्ष नेता की सीधी चेतावनी और उसके तुरंत बाद दीवारों पर चले ब्रश ने इस बात का संकेत दे दिया है कि बंगाल में अब शैक्षणिक परिसरों के भीतर विचारधारा की लड़ाई एक नए और बेहद आक्रामक मोड़ पर पहुंच चुकी है।

जादवपुर यूनिवर्सिटी की दीवारों का इतिहास और विवादित ग्रैफिटी की संस्कृति

जादवपुर यूनिवर्सिटी के कैंपस में प्रवेश करते ही सबसे पहली नजर वहां की दीवारों पर पड़ती है, जो सामान्य ईंट-सीमेंट की दीवारें न होकर एक तरह से राजनीतिक और सामाजिक विचारों का कैनवास रही हैं। दशकों से छात्र संगठनों—विशेषकर वामपंथी छात्र संगठनों जैसे एसएफआई (SFI), आइसा (AISA), डीएसएफ (DSF) और अन्य स्वतंत्र वाम समूहों द्वारा इन दीवारों पर देश-विदेश के राजनीतिक मुद्दों, मानवाधिकारों, युद्ध, सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध और क्रांतिकारी विचारों से जुड़ी ग्रैफिटी बनाई जाती रही है।

हालांकि, बीते कुछ वर्षों में इन दीवारों पर लिखे गए कुछ नारों और चित्रों को लेकर दक्षिणपंथी संगठनों और मुख्यधारा के कई नेताओं ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। आरोप लगते रहे हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर यहां अक्सर भारतीय सुरक्षा बलों, संवैधानिक संस्थाओं, राष्ट्रवादी प्रतीकों और निर्वाचित सरकारों के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां और कार्टून बनाए जाते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) लंबे समय से यह मांग उठाते रहे हैं कि यूनिवर्सिटी परिसर को इस तरह के राजनीतिक और अलगाववादी नैरेटिव का अखाड़ा नहीं बनने दिया जाना चाहिए।

‘बहुत कुछ मिटा देंगे’: बयान के पीछे का सियासी और वैचारिक संदेश

शुभेंदु अधिकारी का यह बयान केवल कैंपस की रंगाई-पुताई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा वैचारिक और राजनीतिक संदेश छिपा हुआ है। शुभेंदु अधिकारी ने एक सार्वजनिक मंच से हुंकार भरते हुए कहा था कि जिन दीवारों पर वर्षों से एक खास विचारधारा के तहत नफरत और राष्ट्रविरोधी भावनाएं उकेरी गई हैं, उन पर अब कानून और राष्ट्रवाद का रंग चढ़ेगा। उन्होंने साफ कहा कि अगर प्रशासन इन विवादित नारों को खुद नहीं हटाता है, तो जनता और राष्ट्रवादी युवा इन्हें मिटाने में देर नहीं लगाएंगे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शुभेंदु अधिकारी का यह रुख पश्चिम बंगाल में भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वे राज्य में दशकों से काबिज वामपंथी बौद्धिक प्रभाव और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की कथित प्रशासनिक ढिलाई को सीधी चुनौती दे रहे हैं। जादवपुर यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान को सीधे निशाने पर लेकर भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि वह बंगाल के किसी भी हिस्से में तथाकथित ‘लेफ्ट इकोसिस्टम’ को बिना चुनौती दिए नहीं छोड़ेगी।

दीवारों पर पुती सफेदी और नए सिरे से शुरू हुई पेंटिंग की सियासत

शुभेंदु अधिकारी की इस खुली चेतावनी के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन और कैंपस के भीतर हलचल तेज हो गई। देखते ही देखते कैंपस के मुख्य गेटों, प्रशासनिक भवनों और कैंटीन के आसपास की उन दीवारों पर मजदूरों और कुछ छात्रों द्वारा सफेदी की जाने लगी जहां सबसे तीखे राजनीतिक स्लोगन लिखे हुए थे। कुछ जगहों पर विवादित पोस्टरों को हटा दिया गया और उनकी जगह सामान्य रंग-रोगन या नए सकारात्मक संदेशों वाली पेंटिंग्स बनाने की शुरुआत कर दी गई।

इस कदम से कैंपस का माहौल पूरी तरह से गरमा गया है। जहां एक पक्ष इसे कैंपस के माहौल को शुद्ध करने और शैक्षणिक गरिमा को बहाल करने की दिशा में एक जरूरी कदम बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ वामपंथी छात्र गुट इसे विश्वविद्यालय की लोकतांत्रिक परंपरा और अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा हमला करार दे रहे हैं। कई दीवारों पर पुताई होने के कुछ ही घंटों बाद छात्रों द्वारा दोबारा नए नारे लिखे जाने की भी खबरें सामने आई हैं, जिससे तनाव और बढ़ गया है।

छात्र संगठनों का विरोध और पश्चिम बंगाल की गरमाई राजनीति

दीवारों पर पेंटिंग और सफेदी शुरू होने के बाद जादवपुर यूनिवर्सिटी के छात्र संगठनों ने तत्काल विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। वामपंथी छात्र नेताओं का आरोप है कि भाजपा और उसके नेता विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को कुचलने और परिसर में भय का माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि जादवपुर का इतिहास हमेशा से सत्ता के सामने सच बोलने और प्रतिरोध का रहा है, और किसी नेता की धमकी से उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकता।

वहीं दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने भी इस मामले में सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। टीएमसी नेताओं का कहना है कि विश्वविद्यालय परिसरों में कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन का काम है, लेकिन भाजपा हर मुद्दे का राजनीतिकरण करके बंगाल में अशांति फैलाने का प्रयास कर रही है। दूसरी तरफ भाजपा की छात्र शाखा एबीवीपी का स्पष्ट कहना है कि विश्वविद्यालय टैक्सपेयर्स के पैसे से चलते हैं, इसलिए वहां किसी भी प्रकार की अराजकता या देश विरोधी प्रचार की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती।

वैचारिक जंग या कैंपस की स्वायत्तता पर टकराव?

जादवपुर यूनिवर्सिटी में दीवारों पर ब्रश और रंगों के जरिए लड़ा जा रहा यह मुकाबला असल में बंगाल की उस गहरी वैचारिक खाई को दर्शाता है जो पिछले एक दशक में और चौड़ी हुई है। एक तरफ वह वर्ग है जो विश्वविद्यालयों को पूर्ण स्वायत्तता, निर्बाध अभिव्यक्ति और किसी भी विचार के खुले प्रचार का मंच मानता है; तो दूसरी तरफ वह दृष्टिकोण है जो शैक्षणिक परिसरों में अनुशासन, राष्ट्र प्रथम की भावना और राजनीतिक गतिविधियों की सख्त सीमा तय करने की वकालत करता है।

शुभेंदु अधिकारी की चेतावनी और उसके बाद शुरू हुई यह पुताई केवल दीवारों का रंग बदलने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल के पूरे राजनीतिक परिदृश्य में अपना दबदबा साबित करने की एक बड़ी लड़ाई है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि जादवपुर यूनिवर्सिटी का प्रशासन इस अभूतपूर्व वैचारिक टकराव को कैसे संभालता है और क्या यह विवाद बंगाल के आगामी चुनावी और राजनीतिक विमर्श का एक नया केंद्र बिंदु बनने जा रहा है।

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