
उत्तर प्रदेश के सियासी अखाड़े में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर पर्दे के पीछे की गतिविधियां बेहद तेज हो गई हैं। पिछले चुनावों में समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ खड़े रहे कई छोटे और जातीय आधार वाले दल अब अपना रुख बदलते नजर आ रहे हैं। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव द्वारा इस बार छोटे दलों के साथ अलग से मोर्चा बनाने से परहेज करने के बाद, इन क्षेत्रीय नेताओं ने कांग्रेस का दामन थामने का मन बना लिया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से छोटे दलों के शीर्ष नेताओं की लगातार हो रही बैठकों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नए विपक्षी समीकरण की सुगबुगाहट तेज कर दी है।
अखिलेश यादव ने क्यों बनाई छोटे दलों से दूरी?
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने ‘भागीदारी मोर्चा’ और कई छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ बड़ा गठबंधन तैयार किया था। हालांकि, चुनाव परिणाम आने और उसके बाद के वर्षों में कई छोटे दलों के नेताओं के पाला बदलने और बयानों से सपा नेतृत्व को सियासी नुकसान उठाना पड़ा। इसी अनुभव को देखते हुए अखिलेश यादव ने इस बार अपनी रणनीति बदल दी है। सपा प्रमुख का पूरा ध्यान अब सीधे तौर पर अपने कोर ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और संगठन को मजबूत करने पर केंद्रित है। सपा की ओर से स्पष्ट संकेत दिए जा रहे हैं कि वह गठबंधन में केवल उन्हीं सीटों या नेताओं को शामिल करना चाहती है जो चुनाव जीतने की वास्तविक क्षमता रखते हों, न कि केवल दबाव की राजनीति कर सीटें हासिल करना चाहते हों।
राहुल गांधी के दरबार में हाजिरी और कांग्रेस का नया दांव
सपा के कड़े रुख के बाद छोटे दलों ने कांग्रेस और राहुल गांधी की तरफ देखना शुरू किया है। पूर्व मंत्री और अपनी जनता पार्टी के अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य समेत कई प्रमुख चेहरों ने दिल्ली में राहुल गांधी से मुलाकात की है। इसके अलावा अपना दल (कमेरावादी) के पंकज निरंजन भी कांग्रेस नेताओं के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए हैं।
कांग्रेस के लिए यह समीकरण दोनों तरफ से मुफीद साबित हो रहा है:
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मजबूत उम्मीदवारों की तलाश: उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर लंबे समय से कमजोर रही कांग्रेस को कई विधानसभा क्षेत्रों में ऐसे चेहरों की तलाश है, जिनका अपने समुदाय में सीधा प्रभाव हो।
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सीट शेयरिंग में मजबूत मोलभाव: कांग्रेस प्रभारी उत्तर प्रदेश में 150 से 200 सीटों पर दावेदारी की बात कह चुके हैं। छोटे दलों को अपने पाले में लाकर कांग्रेस सपा के साथ सीट बंटवारे की बातचीत में अपनी सौदेबाजी की ताकत (Bargaining Power) बढ़ाना चाहती है।
सिंबल को लेकर अटका पेंच: अपनी पार्टी का निशान या ‘हाथ’?
भले ही छोटे दल कांग्रेस के करीब आ रहे हों, लेकिन चुनावी तालमेल की राह में सिंबल का बड़ा पेंच फंसा हुआ है। सूत्रों के मुताबिक, स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं ने गठबंधन के तहत एक दर्जन सीटों की मांग रखी है और वे अपने दल के चुनाव चिह्न पर ही मैदान में उतरना चाहते हैं। वहीं दूसरी तरफ, कांग्रेस आलाकमान का स्पष्ट रुख है कि अगर वह इन नेताओं को अपने कोटे से टिकट देती है, तो प्रत्याशियों को कांग्रेस के आधिकारिक चुनाव निशान (‘हाथ’) पर ही चुनाव लड़ना होगा।
2017 वाली बीजेपी रणनीति को दोहराने की कोशिश
सियासी विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस यूपी में उसी रणनीति को आजमाने की कोशिश कर रही है, जो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने साल 2017 के चुनावों से पहले अपनाई थी। उस दौरान बीजेपी ने छोटे-छोटे जातीय क्षत्रपों और गैर-यादव ओबीसी व गैर-जाटव दलित समूहों का एक व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार कर बंपर जीत हासिल की थी। अब राहुल गांधी की ‘संविधान बचाओ’ और सामाजिक न्याय की पिच पर ये छोटे दल खुद को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यदि कांग्रेस सपा के साथ सीट शेयरिंग में सम्मानजनक हिस्सेदारी हासिल कर लेती है, तो यूपी चुनाव में छोटे दलों का यह नया ‘राहुल मॉडल’ चुनावी नतीजों को काफी दिलचस्प बना सकता है।
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