
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की घनघोर अंधेरी अष्टमी तिथि, मूसलाधार बारिश और मथुरा की काल-कोठरी में पसरा सन्नाटा—यह वही दिव्य कालखंड था जब धरती पर धर्म की पुनर्स्थापना के लिए साक्षात भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपने आठवें अवतार के रूप में जन्म लिया था। द्वापर युग का यह प्रसंग केवल एक बालक के जन्म की गाथा नहीं है, बल्कि अन्याय, अहंकार और अत्याचार के विरुद्ध सत्य के परम विजय की उद्घोषणा है। जब राजा उग्रसेन को बंदी बनाकर क्रूर कंस ने मथुरा के सिंहासन पर अधिकार कर लिया था, तब चारों दिशाओं में त्राहि-त्राहि मची थी। कंस का आतंक इतना बढ़ चुका था कि देवता भी व्याकुल होकर भगवान नारायण की शरण में पहुंचे थे।
कथा के अनुसार, शूरसेन जनपद के राजा शूरसेन के पुत्र वासुदेव का विवाह उग्रसेन के भाई देवक की पुत्री देवकी के साथ बड़े धूमधाम से संपन्न हुआ था। कंस अपनी चचेरी बहन देवकी से अत्यंत स्नेह करता था। विदाई के समय जब कंस स्वयं दोनों के रथ को हांक रहा था, तभी अचानक आकाश में घने काले बादल घिर आए और एक भयंकर आकाशवाणी गूंजी—”हे अज्ञानी कंस! जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां पुत्र तेरा वध करेगा।”
आकाशवाणी सुनते ही कंस का सारा प्रेम भयानक क्रोध में बदल गया। उसने तलवार खींच ली और देवकी को मौत के घाट उतारने के लिए आगे बढ़ा। तब वासुदेव जी ने धैर्य और बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए कंस को शांत किया और वचन दिया कि देवकी के गर्भ से उत्पन्न होने वाली हर संतान को वे स्वयं कंस के हाथों में सौंप देंगे। कंस ने देवकी को प्राणदान तो दे दिया, किंतु भय के साए में उसने वासुदेव और देवकी को मथुरा के अत्यंत सुरक्षित कारागार में लोहे की भारी बेड़ियों से जकड़कर कैद कर दिया।
समय बीतता गया और कारागार में देवकी ने एक-एक कर छह बालकों को जन्म दिया। निर्दयी कंस ने अपने काल के भय से उन छह नवजात शिशुओं को पत्थरों पर पटककर बेरहमी से मार डाला। जब देवकी के गर्भ में सातवें बालक का आगमन हुआ, तब भगवान विष्णु ने अपनी परम शक्ति योगमाया को आदेश दिया कि वे देवकी के इस गर्भ को गोकुल में निवास कर रहीं वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दें। यह सातवां गर्भ ही आगे चलकर भगवान बलराम (शेषनाग के अवतार) के रूप में प्रकट हुआ। इधर कारागार में यह प्रचारित हुआ कि देवकी का सातवां गर्भ स्वतः ही नष्ट हो गया है।
इसके पश्चात जब माता देवकी के गर्भ में साक्षात भगवान नारायण ने आठवें अवतार के रूप में प्रवेश किया, तब उनके मुखमंडल पर एक अलौकिक तेज छा गया। बंदीगृह में रहते हुए भी देवकी के चेहरे का दिव्य प्रकाश कंस के भय को दिन-प्रतिदिन बढ़ाता जा रहा था। कंस ने कारागार के पहरेदारों की संख्या दोगुनी कर दी और स्वयं हर क्षण चौकन्ना रहने लगा।
अंततः वह परम पावन घड़ी आ गई। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, मध्यरात्रि के ठीक 12 बजे, रोहिणी नक्षत्र और हर्षण योग में कारागार का कोना-कोना नीले आलोक से जगमगा उठा। भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए देवकी और वासुदेव के समक्ष प्रकट हुए। प्रभु के इस मनोहारी और दिव्य रूप को देखकर दोनों हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे। तब भगवान ने कहा—”हे तात! अब विलंब न करें। मुझे तुरंत गोकुल में नंदबाबा और यशोदा के घर पहुंचा दें और वहां यशोदा के गर्भ से अभी-अभी जन्मी कन्या को लाकर यहां रख दें।”
इतना कहते ही भगवान एक सुंदर, नन्हे सुकुमार शिशु के रूप में बदल गए। इसके बाद जो चमत्कार हुआ, उसने सृष्टि के नियमों को पलट दिया। वासुदेव जी के हाथों-पैरों की भारी लोहे की बेड़ियां अपने आप खुल गईं। कारागार के विशाल लोहे के दरवाजे स्वतः खुलते चले गए और पहरेदार गहरी योगनिद्रा में चले गए। वासुदेव जी ने नन्हे कान्हा को सूप (बांस की टोकरी) में रखा और उसे अपने सिर पर उठाकर घनघोर अंधेरी रात और मूसलाधार बारिश के बीच गोकुल की ओर चल पड़े।
रास्ते में शेषनाग ने अपने फणों की छत्रछाया बनाकर बालमुकुंद को वर्षा से बचाया। जब वासुदेव यमुना तट पर पहुंचे, तो यमुना नदी उफान पर थी। लहरें आकाश छू रही थीं। जैसे ही वासुदेव जी उफनती नदी में उतरे, जलस्तर बढ़ता हुआ उनके गले तक पहुंच गया। किंतु जैसे ही यमुना महारानी ने टोकरी में लेटे बालकृष्ण के चरण कमलों का स्पर्श किया, उनका सारा वेग शांत हो गया और यमुना जी ने वासुदेव जी को गोकुल जाने का सुगम मार्ग दे दिया। वासुदेव जी गोकुल पहुंचे, जहां नंद जी के घर सब निद्रा में लीन थे। वहां उन्होंने नन्हें कान्हा को यशोदा जी के पास सुला दिया और उनके पास जन्मी कन्या को उठाकर पुनः मथुरा के कारागार में लौट आए। कारागार के द्वार पूर्ववत बंद हो गए और बेड़ियां पुनः वासुदेव जी के पैरों में जकड़ गईं।
जैसे ही वासुदेव जी मथुरा लौटे, कन्या के रोने की आवाज गूंज उठी। कन्या का रुदन सुनते ही पहरेदारों की नींद टूटी और उन्होंने तुरंत भागकर राजा कंस को सूचना दी कि देवकी की आठवीं संतान ने जन्म ले लिया है। कंस नंगे पैर, हाथ में नंगी तलवार लिए पागलों की तरह कारागार की ओर दौड़ा।
देवकी ने रोते हुए कंस के पैर पकड़ लिए और गिड़गिड़ाकर कहा—”हे भ्राता! यह तो एक अबोध कन्या है। आकाशवाणी ने तो पुत्र द्वारा तेरे वध की बात कही थी। यह कोमल बालिका तेरा क्या बिगाड़ेगी? इसे छोड़ दे।” किंतु भय और क्रूरता से अंधा हो चुका कंस किसी की सुनने को तैयार नहीं था। उसने देवकी के हाथों से उस नन्ही बालिका को झपट लिया और जैसे ही उसके पैरों को पकड़कर शिला पर पटकने की चेष्टा की, वह कन्या अचानक कंस के हाथों से छूटकर आकाश में उड़ गई।
वह कन्या कोई साधारण मानवी नहीं, बल्कि साक्षात महामाया, भगवती योगमाया थीं। आकाश में वह अष्टभुजा रूप में त्रिशूल, धनुष-बाण और चक्र लिए प्रकट हुईं और अट्टहास करते हुए गर्जना की—”मूर्ख कंस! मुझे मारने से तुझे क्या मिलेगा? तुझे यमलोक पहुंचाने वाला, तेरा काल तो गोकुल में सुरक्षित पहुंच चुका है। बहुत जल्द वह तेरे सारे पापों का अंत करेगा।” यह कहकर देवी योगमाया अंतर्ध्यान हो गईं। कंस भय से कांप उठा और उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई।
यह पावन घटना केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और भौगोलिक आत्मा से जुड़ी हुई है। उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर आज भी उस पावन कारागार स्थल की गवाही देता है, जहां यह अलौकिक जन्म हुआ था। यमुना पार का गोकुल, नंदगांव और वृंदावन आज भी बालकृष्ण की मधुर स्मृतियों, माखन चोरी की लीलाओं और गौ-चारण की सुगंध से महकता है। भारत के हर कोने से लाखों श्रद्धालु इस दिन ब्रजमंडल पहुंचते हैं।
शास्त्रों में मान्यता है कि जो भी श्रद्धालु भाद्रपद कृष्ण अष्टमी के दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखते हैं, उनके जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं। यह व्रत घर में सुख, शांति, समृद्धि और संतान की दीर्घायु प्रदान करने वाला माना गया है। जन्माष्टमी के दिन दिनभर उपवास रखकर मध्यरात्रि 12 बजे खीरे की नाल काटकर भगवान के प्रतीकात्मक जन्म (नाल छेदन) का उत्सव मनाया जाता है। इसके बाद पंचामृत से लड्डू गोपाल का अभिषेक कर माखन-मिश्री, पंजीरी और धनिया की पंजीरी का भोग लगाया जाता है। योगमाया का यह संदेश हमें स्मरण कराता है कि अहंकार और पाप चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो जाए, ईश्वर का न्याय सर्वोपरि है और धर्म की रक्षा के लिए प्रभु हर युग में किसी न किसी रूप में अवतरित होते हैं।
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