समुद्र के पानी से परमाणु हथियार बनाएगा चीन: ईजाद की ‘फॉस्फेज’ तकनीक, यूरेनियम निकालने में अमेरिका को पछाड़ा

वैश्विक महाशक्तियों के बीच जारी सामरिक और तकनीकी होड़ में चीन ने एक ऐसी क्रांतिकारी सफलता हासिल की है जिसने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों और पेंटागन की नींद उड़ा दी है। चीनी शोधकर्ताओं ने समुद्र के खारे पानी से परमाणु ईंधन और संहारक परमाणु हथियार बनाने के लिए आवश्यक यूरेनियम (Uranium) को तेजी से सोखने और अलग करने की नई तकनीक विकसित कर ली है। इस वैज्ञानिक खोज में चीन ने अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी संयुक्त राज्य अमेरिका को भी काफी पीछे छोड़ दिया है। जहां अमेरिकी ऊर्जा विभाग (US Department of Energy) के बनाए विशेष फाइबर्स एक ग्राम अवशोषक (Adsorbent) सामग्री से 30 दिनों में महज 6 मिलीग्राम यूरेनियम निकालने में सक्षम थे, वहीं चीनी वैज्ञानिकों के नए मटीरियल ने प्राकृतिक समुद्री जल से प्रति ग्राम 50.4 मिलीग्राम यूरेनियम सोखकर अमेरिकी बेंचमार्क से 8 गुना से भी ज्यादा की ऐतिहासिक बढ़त हासिल कर ली है।

क्या है ‘फॉस्फेज’ तकनीक और कैसे करती है रासायनिक शिकार?

चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज और प्रमुख चीनी विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित इस नई सामग्री का नाम ‘फॉस्फेज’ (PhosCage) रखा गया है। यह एक स्पंज जैसी छिद्रयुक्त कार्बनिक आणविक संरचना (Porous Organic Cage) है, जिसमें विशेष फॉस्फेट समूह जुड़े होते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह मटीरियल समुद्र के पानी में एक सूक्ष्म रासायनिक जाल (Chemical Trap) की तरह काम करता है। खुले समुद्र में इसका व्यावहारिक इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए शोधकर्ताओं ने इसे मिलीमीटर-आकार की छोटी गोलियों (Aramid Nanofibre Composite Beads) में बदल दिया है। इन बीड्स को समुद्र के पानी में डालना, बाहर निकालना और साफ करके दोबारा इस्तेमाल करना बेहद आसान है। परीक्षणों में यह साबित हुआ है कि इन मोतियों ने प्रति ग्राम 22.55 मिलीग्राम यूरेनियम कैप्चर किया और सात बार रीसायकल किए जाने के बाद भी इनकी सोखने की क्षमता में कोई गिरावट नहीं आई।

धरती पर सीमित, लेकिन समंदर में 4.5 अरब टन का अटूट खजाना

पूरी दुनिया में धरती की खदानों के भीतर केवल 7.9 मिलियन (79 लाख) टन यूरेनियम के ज्ञात भंडार मौजूद हैं। इसके विपरीत, दुनिया भर के महासागरों में बारिश, नदियों और चट्टानों के क्षरण से घुलकर पहुंचा लगभग 4.5 बिलियन (4.5 अरब) टन यूरेनियम मौजूद है।

हालांकि, समुद्र के पानी से इसे निकालना अब तक दुनिया की सबसे जटिल वैज्ञानिक चुनौतियों में से एक माना जाता था क्योंकि एक टन समुद्री पानी में मात्र 3.3 माइक्रोग्राम यूरेनियम घुला होता है। साथ ही समुद्र में भारी मात्रा में नमक, सूक्ष्मजीव और अन्य खनिज मौजूद रहते हैं जो फिल्टर को चोक कर देते हैं। अमेरिका की ‘ओक रिज नेशनल लैबोरेटरी’ और ‘पैसिफिक नॉर्थवेस्ट नेशनल लैबोरेटरी’ दशकों से इस तकनीक पर काम कर रही थीं, लेकिन चीन के इस नए फॉर्मूले ने इस प्रक्रिया की गति और दक्षता को कई गुना बढ़ाकर समुद्र के पानी को व्यावसायिक परमाणु ईंधन का एक व्यावहारिक स्रोत बना दिया है।

चीन के परमाणु जखीरे और ऊर्जा संप्रभुता के लिए गेम चेंजर

यह तकनीकी कामयाबी चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा और परमाणु विस्तार योजना के लिए सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित होने वाली है:

  • आयात पर निर्भरता खत्म: चीन अपनी घरेलू खदानों से सालाना लगभग 1,600 टन यूरेनियम निकाल पाता है, जबकि उसके विशाल परमाणु ऊर्जा और पनडुब्बी कार्यक्रम को सालाना 13,000 टन से अधिक यूरेनियम की दरकार है। अब तक चीन कजाकिस्तान, नामीबिया और कनाडा जैसे देशों से आयात पर निर्भर था, लेकिन समुद्र से यूरेनियम दोहन शुरू होने के बाद वह किसी भी विदेशी आपूर्ति श्रृंखला के दबाव से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा।

  • परमाणु हथियारों के निर्माण में तेजी: अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) की रिपोर्टों के अनुसार, चीन बहुत तेजी से अपने परमाणु हथियारों की संख्या 1,500 के पार ले जाने की दिशा में काम कर रहा है। असीमित यूरेनियम की उपलब्धता से चीन अपने न्यूक्लियर वारहेड्स, अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBMs) और परमाणु संचालित पनडुब्बियों के रिएक्टरों के लिए स्वतंत्र रूप से ईंधन तैयार कर सकेगा।

  • वैश्विक प्रतिबंधों का बेअसर होना: भविष्य में यदि अमेरिका या पश्चिमी देश ताइवान या दक्षिण चीन सागर संकट को लेकर चीन पर किसी भी प्रकार का आर्थिक या कच्चा माल प्रतिबंध (Sanctions) लगाते हैं, तो चीन की ऊर्जा और रक्षा प्रणाली अप्रभावित रहेगी।

वैश्विक शक्ति संतुलन में मचेगी नई खलबली

समुद्र के पानी से यूरेनियम निकालने की इस चीनी उपलब्धि ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य के युद्ध केवल हथियारों की संख्या से नहीं, बल्कि उन्नत मैटेरियल साइंस और तकनीक की सर्वोच्चता से जीते जाएंगे। अमेरिका को उसके ही मानक पर आठ गुना पीछे छोड़कर चीन ने दर्शा दिया है कि वह प्रशांत महासागर और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्रों में केवल अपनी नौसेना की गश्त ही नहीं बढ़ा रहा, बल्कि उसी समंदर के पानी को अपने अजेय रक्षा कवच और घातक परमाणु शक्ति में बदलने की वैज्ञानिक क्षमता भी हासिल कर चुका है।

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