
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि यानी सर्वपितृ अमावस्या को सनातन धर्म में पितृपक्ष का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक दिन माना गया है। इस बार 10 अक्टूबर को पड़ने वाली सर्वपितृ अमावस्या पर कई शुभ ग्रहों और नक्षत्रों के मेल से अत्यंत दुर्लभ संयोग का निर्माण हो रहा है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, इस दिन किए गए श्राद्ध, तर्पण और दान का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है। जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु की सही तिथि या समय ज्ञात नहीं होता, वे इस महालय अमावस्या पर अपने सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म संपन्न करके उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार, इस पावन तिथि पर श्रद्धापूर्वक किए गए कुछ छोटे-छोटे उपाय जन्म-जन्मांतर के पितृ दोष को समाप्त कर घर में सुख, शांति और समृद्धि के द्वार खोल देते हैं।
1. पंचबलि कर्म: गाय, कौवे, कुत्ते, चींटी और देवताओं को भोजन
सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों की आत्मा की तृप्ति के लिए ‘पंचबलि’ का विधान सबसे प्रमुख माना जाता है। इस दिन घर में शुद्ध सात्विक भोजन बनाएं, जिसमें खीर और पूड़ी अवश्य शामिल करें।
भोजन तैयार होने के बाद अपने भोजन करने से पहले पांच अलग-अलग पत्तों या बर्तनों में भोजन का अंश निकालें: पहला हिस्सा गाय (गोबलि), दूसरा हिस्सा कौवे (काकबलि), तीसरा हिस्सा कुत्ते (श्वानबलि), चौथा हिस्सा चींटियों (पिपीलिकादिबलि) और पांचवां हिस्सा देवों व पक्षियों के लिए अर्पित करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन पांचों जीवों के माध्यम से पितर सीधे भोजन ग्रहण करते हैं और अपने वंशजों को वंश वृद्धि व दीर्घायु का वरदान देते हैं।
2. काले तिल और कुश से जल तर्पण: तृप्त होंगी पूर्वजों की आत्माएं
सर्वपितृ अमावस्या की सुबह स्नान के बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करना अत्यंत फलदायी माना गया है। एक तांबे या कांसे के लोटे में शुद्ध जल लें, उसमें थोड़ा कच्चा दूध, गंगाजल, सफेद फूल और विशेष रूप से काले तिल मिलाएं।
हाथ में कुश (पवित्र घास) की अंगूठी (पवित्री) पहनकर अंजलि में जल भरें और अपने अंगूठे के माध्यम से जल को नीचे गिराते हुए तीन बार पितरों के नाम से तर्पण करें। जल देते समय ‘ॐ पितृभ्यः नमः’ मंत्र का मानसिक जप करें। तिल और कुश के स्पर्श से दिया गया जल पितृलोक तक पहुंचकर अतृप्त आत्माओं की प्यास बुझाता है और कुंडली में मौजूद भारी से भारी पितृ दोष को भी शांत करता है।
3. पीपल के वृक्ष की सेवा: ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ पितरों का वास
शास्त्रों के अनुसार पीपल के वृक्ष में त्रिदेवों के साथ-साथ सभी पितरों का वास माना जाता है। 10 अक्टूबर को दोपहर के समय या शाम से पहले पीपल की जड़ में मीठा जल (जल में दूध, चीनी और काले तिल मिलाकर) अर्पित करें।
इसके बाद पीपल के तने को दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए सात बार परिक्रमा करें और पितरों से जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा याचना करें। ऐसा करने से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और पितृ बाधा के कारण कार्यों में आ रही लगातार रुकावटें दूर होने लगती हैं और जीवन में स्थिरता आती है।
4. दक्षिण दिशा में चौमुखी सरसों के तेल का दीपदान
सर्वपितृ अमावस्या की शाम को पितर पृथ्वी लोक से विदा होकर अपने लोक की ओर प्रस्थान करते हैं। इसलिए शास्त्रों में उनके मार्ग को प्रकाशित करने के लिए दीपदान का विशेष महत्व बताया गया है।
सूर्यास्त के समय घर के मुख्य द्वार पर या आंगन में दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके सरसों के तेल का एक चौमुखी दीपक अवश्य प्रज्वलित करें। इसके अलावा एक दीपक किसी नदी, तालाब के किनारे, पीपल के पेड़ के नीचे या मंदिर में भी रखें। मान्यता है कि इस प्रकाश के सहारे पितर बिना किसी कष्ट के अपनी यात्रा पूरी करते हैं और विदा होते समय घर-परिवार पर अपनी भरपूर कृपा बरसाकर जाते हैं।
5. ब्राह्मण भोज और जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र का महादान
पितरों की प्रसन्नता के लिए सामर्थ्यानुसार किसी योग्य ब्राह्मण, साधु या जरूरतमंद व्यक्ति को आदरपूर्वक घर बुलाकर भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा दें। यदि घर पर बुलाना संभव न हो, तो सूखा सीधा (आटा, दाल, चावल, घी, नमक और गुड़) निकालकर मंदिर या किसी गरीब परिवार को दान करें।
अमावस्या के दिन सफेद वस्त्र, छाता, जूते-चप्पल और अन्न का दान सबसे उत्तम माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति सर्वपितृ अमावस्या पर निस्वार्थ भाव से दीन-दुखियों की सेवा करता है, उसके घर में कभी धन-धान्य और अन्न की कमी नहीं होती तथा संतान पक्ष से जुड़े सभी कष्ट स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया