
सनातन धर्म में सुहागिन महिलाओं और मनचाहा वर पाने की कामना रखने वाली कुंवारी कन्याओं के लिए हरतालिका तीज का व्रत सबसे कठिन और सर्वोच्च फलदायी माना जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाए जाने वाले इस महापर्व को लेकर अक्सर पंचांगों के गणित और तिथियों के घटने-बढ़ने के कारण असमंजस की स्थिति बन जाती है। श्रद्धालुओं और व्रतियों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिस दिन तृतीया तिथि का सूर्योदय (उदयातिथि) नहीं हो रहा है या तिथि दो दिनों में विभाजित हो रही है, उस स्थिति में व्रत किस दिन रखा जाना शास्त्रसम्मत है।
वैदिक ज्योतिष और धर्मसिंधु के अनुसार, हरतालिका तीज का निर्धारण केवल सूर्योदय की तिथि से नहीं, बल्कि प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) में तृतीया तिथि की व्याप्ति से तय होता है। जब तृतीया तिथि दोपहर या शाम से शुरू होकर अगले दिन सुबह समाप्त हो जाती है, तो किस दिन को मुख्य व्रत दिवस माना जाए, इसको लेकर शास्त्रों में बेहद स्पष्ट और अकाट्य नियम दिए गए हैं।
उदयातिथि बनाम प्रदोष व्यापिनी: धर्मशास्त्रों का अकाट्य फैसला
हिंदू धर्मग्रंथों जैसे ‘निर्णयसिंधु’, ‘धर्मसिंधु’ और ‘स्कंद पुराण’ में हरतालिका तीज के लिए विशेष शास्त्रीय व्यवस्था दी गई है। तीज का व्रत करने से पहले इन दो मुख्य नियमों को समझना अनिवार्य है:
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द्वितीया युक्ता तृतीया का पूर्ण निषेध: यदि तृतीया तिथि का आरंभ द्वितीया तिथि के मिश्रण के साथ हो रहा हो, तो उस दिन हरतालिका तीज का व्रत भूलकर भी नहीं करना चाहिए। शास्त्रों में द्वितीया विद्धा तृतीया को निष्फल और दोषपूर्ण माना गया है।
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चतुर्थी युक्ता तृतीया सर्वोत्तम: यदि तृतीया तिथि सूर्योदय के समय कम समय के लिए ही क्यों न हो या वह चतुर्थी तिथि के साथ मिल रही हो (चतुर्थी युक्ता तृतीया), तो उसी दिन व्रत रखना परम कल्याणकारी माना गया है। इसे ‘गौरी-गणेश’ का पावन संयोग कहा जाता है।
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प्रदोष काल की प्रधानता: हरतालिका तीज की मुख्य पूजा शाम के समय यानी प्रदोष काल में मिट्टी के शिव-पार्वती बनाकर की जाती है। इसलिए जिस दिन शाम के समय तृतीया तिथि विद्यमान रहती है, वही दिन व्रत और पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ स्वीकार किया जाता है।
यदि किसी वर्ष तृतीया तिथि का उदय सुबह न होकर दोपहर में हो रहा हो, तो उदयातिथि के भ्रम में न पड़ते हुए उस दिन व्रत रखा जाता है जिस दिन प्रदोष काल में तृतीया मिल रही हो और जो आगे चलकर चतुर्थी से युक्त हो रही हो।
हरतालिका तीज 2026: शुभ मुहूर्त और चौघड़िया समय
हरतालिका तीज के दिन भगवान शिव, माता पार्वती और प्रथम पूज्य गणेश जी की पूजा तीन अलग-अलग प्रहरों में की जा सकती है:
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प्रातःकाल पूजा का शुभ मुहूर्त: सुबह 06:05 बजे से सुबह 08:35 बजे तक (अमृत व शुभ चौघड़िया में पूजन अत्यंत मंगलकारी रहेगा)।
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प्रदोष काल (मुख्य पूजा) मुहूर्त: शाम 06:40 बजे से रात 08:55 बजे तक (यह समय बालू या काली मिट्टी के शिवलिंग निर्माण और श्रृंगार पूजा के लिए सर्वोत्तम है)।
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रात्रि के चार प्रहर की पूजा: जो महिलाएं रातभर जागरण करती हैं, वे प्रत्येक तीन घंटे के अंतराल पर शिव-पार्वती की आरती और मंत्र जाप कर सकती हैं।
माता पार्वती की कठोर तपस्या और ‘हरतालिका’ नाम का पौराणिक रहस्य
हरतालिका शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—’हरत’ (हरण करना) और ‘आलिका’ (सखी या सहेली)। पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं, जबकि उनके पिता महर्षि पर्वतराज हिमालय उनका विवाह भगवान विष्णु से कराना चाहते थे।
जब माता पार्वती को इस बात का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी हुईं। तब उनकी प्रिय सखियों ने उनका ‘हरण’ यानी उन्हें गुप्त रूप से महल से ले जाकर घने और बीहड़ जंगल की एक गुफा में छिपा दिया। वहां माता पार्वती ने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन रेत (बालू) का शिवलिंग बनाकर अन्न और जल का पूर्ण त्याग करते हुए कठोर तपस्या की। उनकी इस निष्काम और कठिन भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने प्रकट होकर उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया। तभी से इस पावन व्रत का नाम ‘हरतालिका तीज’ पड़ा।
घर पर हरतालिका तीज पूजा की संपूर्ण और सरल विधि
हरतालिका तीज की पूजा घर पर विधि-विधान से संपन्न करने के लिए इन शास्त्रीय चरणों का पालन करें:
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पवित्र प्रतिमा का निर्माण: पूजा से पहले गीली काली मिट्टी या नदी की शुद्ध रेत (बालू) से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की सुंदर प्रतिमाएं अपने हाथों से बनाएं।
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मंडप और चौकी की स्थापना: पूजा स्थल पर केले के पत्तों और फूलों से एक सुंदर मंडप बनाएं। लकड़ी की चौकी पर नया पीला या लाल कपड़ा बिछाकर प्रतिमाओं को स्थापित करें।
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कलश स्थापना: तांबे या पीतल के लोटे में जल भरकर उसमें सुपारी, सिक्का, अक्षत और आम के 5 पत्ते लगाएं। ऊपर जटा वाला नारियल रखें।
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16 श्रृंगार का समर्पण: माता पार्वती को सुहाग की 16 वस्तुएं (सिंदूर, बिंदी, मेंहदी, चूड़ी, महावर, चुनरी, बिछिया, काजल आदि) अर्पित करें।
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भगवान शिव को प्रिय वस्तुएं: शिवलिंग पर गंगाजल, कच्चा दूध, सफेद चंदन, 21 बेलपत्र, धतूरा, भांग, शमी पत्र और मदार के पुष्प चढ़ाएं।
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कथा और आरती: पूजा के बाद हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर हरतालिका तीज की पावन व्रत कथा अवश्य सुनें। इसके बाद घी के दीपक और कपूर से शिव परिवार की सामूहिक आरती करें।
निर्जला व्रत के कड़े नियम और पारण का सही विधान
हरतालिका तीज का व्रत सनातन धर्म के सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। इसके नियम अत्यंत कड़े होते हैं जिनका पालन हर व्रती को करना चाहिए:
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पूर्ण निर्जला और निराहार: इस व्रत में पूरे 24 घंटे तक अन्न और जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती है। केवल अत्यंत वृद्ध या गर्भवती महिलाओं को फलाहार की छूट शास्त्रों में दी गई है।
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रात्रि जागरण का महत्व: इस पावन रात को सोना वर्जित माना गया है। महिलाएं रातभर जागकर भजन-कीर्तन करती हैं और चारों प्रहर की आरती उतारती हैं।
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क्रोध और कटु वचनों से बचाव: व्रत के दौरान मन को पूरी तरह शांत और शिव-भक्ति में लीन रखें। किसी की निंदा या विवाद से बचें।
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पारण का नियम: व्रत का पारण अगले दिन सुबह चतुर्थी तिथि में सूर्योदय के बाद किया जाता है। विसर्जन से पहले माता पार्वती को सिंदूर चढ़ाकर अपनी मांग में लगाएं और सुहाग सामग्री किसी ब्राह्मण महिला या सास को भेंट करें। इसके बाद ककड़ी, भिगोए हुए चने और मीठा जल ग्रहण करके ही व्रत खोलें।
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