पीएम मोदी के संबोधन पर संग्राम: 700 दिग्गजों ने चुनाव आयोग से की ‘बराबर समय’ और ‘एक्शन’ की मांग

नई दिल्ली। विधानसभा चुनावों के शोर के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 18 अप्रैल को दिया गया ‘राष्ट्र के नाम संबोधन’ एक बड़े कानूनी और राजनीतिक विवाद में तब्दील हो गया है। पूर्व नौकरशाहों, प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत 700 से अधिक लोगों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को पत्र लिखकर इसे आदर्श आचार संहिता (MCC) का सीधा उल्लंघन बताया है। शिकायतकर्ताओं का तर्क है कि सरकारी मशीनरी और टैक्सपेयर्स के पैसे से चलने वाले मीडिया का उपयोग विपक्षी दलों को घेरने के लिए करना चुनावी मर्यादाओं के खिलाफ है।

सरकारी संसाधनों के ‘पक्षपातपूर्ण’ उपयोग का आरोप

मुख्य चुनाव आयुक्त को भेजी गई इस शिकायत में आरोप लगाया गया है कि दूरदर्शन, संसद टीवी और ऑल इंडिया रेडियो जैसे आधिकारिक प्लेटफार्मों का उपयोग प्रधानमंत्री ने राजनीतिक लाभ के लिए किया। पत्र में कहा गया है कि जब कई राज्यों (असम, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी) में चुनाव प्रक्रिया जारी है, तब सरकारी मीडिया पर ऐसा संबोधन देना सत्ताधारी दल को ‘अनुचित लाभ’ पहुंचाता है। यह कदम निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ (समान अवसर) के सिद्धांत को कमजोर करता है।

क्या हैं 700 नागरिकों की प्रमुख मांगें?

शिकायतकर्ताओं ने निर्वाचन आयोग के सामने तीन मुख्य मांगें रखी हैं:

  • सामग्री की जांच: आयोग प्रधानमंत्री के भाषण की विषयवस्तु और प्रसारण के तौर-तरीकों की गहन जांच करे और उचित कार्रवाई शुरू करे।

  • विपक्ष को समान समय: यदि इस संबोधन के लिए पूर्व अनुमति ली गई थी, तो विपक्षी दलों को भी सरकारी प्रसारकों पर अपनी बात रखने के लिए समान समय (Equal Airtime) आवंटित किया जाए।

  • कंटेंट हटाना: यदि नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो इस संबोधन को सभी सरकारी डिजिटल और ब्रॉडकास्ट प्लेटफॉर्म से तुरंत हटाया जाए।

इन बड़ी हस्तियों ने किया शिकायत पर हस्ताक्षर

इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में देश के कई प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं। इनमें दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, अर्थशास्त्री जयती घोष, पूर्व केंद्रीय सचिव ई.ए.एस. सरमा, और संगीतकार टी.एम. कृष्णा प्रमुख हैं। इन दिग्गजों का कहना है कि चुनाव आयोग को चुनावी प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखने के लिए अपनी संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल करना चाहिए।

विवाद की जड़: 18 अप्रैल के भाषण में क्या था?

प्रधानमंत्री के जिस संबोधन पर यह विवाद खड़ा हुआ है, उसमें उन्होंने 131वें संविधान संशोधन (महिला आरक्षण बिल) के संसद में पास न हो पाने का जिक्र किया था। पीएम मोदी ने इसके लिए सीधे तौर पर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (TMC), डीएमके (DMK) और सपा (SP) जैसी विपक्षी पार्टियों को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए महिलाओं के हितों को नुकसान पहुंचाया है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि आधिकारिक संबोधन में विपक्षी दलों का नाम लेकर आलोचना करना सीधे तौर पर चुनावी प्रचार है।

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