हवा में घुले PM2.5 कण 21 दिन तक बढ़ाते हैं अस्पताल जाने का जोखिम, 34 करोड़ मेडिकल रिकॉर्ड्स के अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा

सर्दियों और बदलते मौसम के साथ जब शहरों की हवा में धुआं और धुंध घुलती है, तो ज्यादातर लोग इसे आंखों में होने वाली हल्की जलन, गले की खराश या कुछ दिनों की सामान्य खांसी मानकर अनदेखा कर देते हैं। लेकिन मेडिकल साइंस के ताजा आंकड़े बताते हैं कि जहरीली हवा का दुष्प्रभाव फौरी लक्षणों से कहीं ज्यादा गहरा और दूरगामी होता है। हवा में तैरने वाले बेहद सूक्ष्म कण यानी पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) हमारे पूरे शरीर के अंदरूनी तंत्र पर लंबे समय तक वार करते हैं। हाल ही में छह देशों के करोड़ों मरीजों के रिकॉर्ड पर किए गए एक बड़े वैश्विक अध्ययन ने साबित कर दिया है कि हवा में प्रदूषण का स्तर बढ़ने के बाद अगले 3 सप्ताह (21 दिन) तक लोगों के अस्पताल में गंभीर रूप से भर्ती होने की आशंका काफी बढ़ जाती है। इसका सीधा मतलब है कि प्रदूषण को महज दो-चार दिन की मौसमी समस्या समझना जानलेवा साबित हो सकता है।

34.65 करोड़ मरीजों के डेटा से सामने आई प्रदूषण की भयावह सच्चाई

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने वर्ष 2000 से 2019 के बीच ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चिली, न्यूजीलैंड और ताइवान के अस्पतालों में दर्ज लगभग 34.65 करोड़ इनपेशेंट रिकॉर्ड्स का विस्तृत विश्लेषण किया। वैज्ञानिकों ने दैनिक वायु गुणवत्ता डेटा और अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों की तारीखों का मिलान करके यह समझने की कोशिश की कि प्रदूषण और स्वास्थ्य संकट के बीच कितना गहरा संबंध है। विश्लेषण में पाया गया कि हवा में PM2.5 की सघनता जैसे ही प्रति 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर ($\mu\text{g/m}^3$) बढ़ती है, वैसे ही अगले 21 दिनों के भीतर किसी भी मेडिकल इमरजेंसी के कारण अस्पताल में भर्ती होने का जोखिम औसतन 8 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। यह ‘लैग इफेक्ट’ दर्शाता है कि खराब हवा शरीर के सिस्टम को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती है और इसका असर संपर्क में आने के हफ्तों बाद तक बना रहता है।

सांस के साथ-साथ कैंसर, मानसिक और न्यूरो समस्याओं का भी बढ़ा खतरा

अक्सर यह माना जाता है कि वायु प्रदूषण केवल सांस की नली और फेफड़ों को ही नुकसान पहुंचाता है, लेकिन इस शोध ने कई स्थापित धारणाओं को बदल कर रख दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक हवा में घुले PM2.5 का संबंध कई अन्य गंभीर और गैर-सांस संबंधी बीमारियों से भी मजबूती से जुड़ा हुआ है। शोध के आंकड़ों के अनुसार, प्रदूषण बढ़ने पर कैंसर से पीड़ित मरीजों के अस्पताल में भर्ती होने के जोखिम में 10.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण अस्पताल जाने की संभावना 10 प्रतिशत और तंत्रिका तंत्र (न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर) से जुड़ी बीमारियों में 8.5 प्रतिशत का इजाफा देखा गया। सांस संबंधी बीमारियों जैसे अस्थमा और ब्रोंकाइटिस के मामलों में यह जोखिम 6.7 प्रतिशत बढ़ा हुआ पाया गया। यह सांख्यिकीय संबंध साफ करता है कि सूक्ष्म कण रक्त परिसंचरण के जरिए शरीर के हर मुख्य अंग और मस्तिष्क तक पहुंचकर जटिलताएं पैदा करते हैं।

माइक्रोस्कोपिक PM2.5 शरीर के अंदर कैसे बनता है साइलेंट किलर

PM2.5 वास्तव में हवा में मौजूद ऐसे धूल, कालिख, रसायनों और धातुओं के अति-सूक्ष्म कण हैं, जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे भी कम होता है। एक सामान्य मानवीय बाल की तुलना में ये कण लगभग तीस गुना अधिक पतले होते हैं। जब हम ऐसी हवा में सांस लेते हैं, तो हमारी नाक और गले के सामान्य प्राकृतिक फिल्टर इन्हें रोक नहीं पाते। ये कण सीधे श्वास नली से गुजरते हुए फेफड़ों के सबसे गहरे हिस्से (एल्वियोली) तक पहुंच जाते हैं और वहां से सीधे खून में प्रवेश कर जाते हैं। रक्त प्रवाह में मिलते ही ये कण पूरे शरीर में व्यापक सूजन (सिस्टमिक इन्फ्लेमेशन) और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को ट्रिगर करते हैं। इससे रक्त धमनियों में रुकावट, दिल का दौरा, ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव और ऑटो-इम्यून प्रतिक्रियाएं बढ़ जाती हैं। विशेष रूप से बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, बच्चों और पहले से किसी पुरानी बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए यह स्थिति सबसे अधिक खतरनाक बन जाती है।

प्रदूषण के चरम दिनों में सेहत बचाने के लिए जरूरी सावधानियां

खराब हवा के इस लंबे असर से बचने के लिए सतर्कता और समय पर सही सुरक्षात्मक कदम उठाना ही सबसे प्रभावी ढाल है। जब भी आपके इलाके का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) ‘खराब’ या ‘गंभीर’ श्रेणी में दर्ज हो, तो सुबह और शाम के समय पार्क में टहलने, दौड़ने या खुले में भारी वर्कआउट करने से पूरी तरह परहेज करें। बाहर निकलते समय कपड़े का रूमाल या साधारण सर्जिकल मास्क लगाने से कोई फायदा नहीं होता, क्योंकि PM2.5 कण इनमें से आसानी से पार हो जाते हैं; इसलिए चेहरे पर अच्छी फिटिंग वाला प्रमाणित N95 या N99 मास्क ही पहनें। जिन लोगों को अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, हाई बीपी या हार्ट की समस्या है, वे अपनी नियमित दवाएं और इनहेलर हमेशा साथ रखें और डॉक्टरों की सलाह के बिना खुराक न बदलें। यदि अचानक सीने में भारीपन, सांस फूलने, तेज सिरदर्द या चक्कर आने की शिकायत हो, तो घरेलू नुस्खों के भरोसे न रहकर तुरंत नजदीकी अस्पताल में डॉक्टर से संपर्क करें।

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