नवरात्र में तिथियों के फेर से न हों परेशान, काशी पंचांग से दूर करें सप्तमी, महाष्टमी, नवमी और विजयादशमी का सारा कंफ्यूजन

शारदीय नवरात्र के पावन पर्व पर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की उपासना पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ की जाती है, लेकिन पंचांग में तिथियों के घटने और बढ़ने के कारण अक्सर श्रद्धालुओं के मन में व्रत, पूजन और कन्या भोज की सटीक तारीखों को लेकर बड़ा संशय पैदा हो जाता है। इस वर्ष भी सप्तमी, महाष्टमी व्रत और कन्या पूजन के दिनों को लेकर भक्तों के बीच असमंजस की स्थिति देखी जा रही है। हिंदू धर्म में धार्मिक निर्णय और तिथियों के निर्धारण के लिए धर्मनगरी काशी (वाराणसी) के पंचांगों को सबसे प्रामाणिक और मान्य आधार माना जाता है। प्रख्यात ज्योतिर्विद डॉ. दिवाकर त्रिपाठी के अनुसार, काशी पंचांग के गणितीय और शास्त्रीय नियमों के आधार पर तिथियों की पूरी स्थिति स्पष्ट हो चुकी है, जिससे भक्त बिना किसी संशय के अपनी पूजा और अनुष्ठान संपन्न कर सकते हैं।

17 अक्टूबर को मनेगी सप्तमी और पंडालों में होगी प्रतिमा स्थापना

काशी पंचांग के अनुसार सप्तमी तिथि का मान 17 अक्टूबर दिन शनिवार को रहेगा और यही नवरात्र का सातवां दिन होगा। सप्तमी तिथि सूर्योदय पूर्व से आरंभ होकर रात में 5:53 बजे तक व्याप्त रहेगी। इस दिन मूल नक्षत्र सुबह 8:58 बजे तक रहेगा, जिसके बाद पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र शुरू हो जाएगा। इसके अलावा दिन में अतिगंड योग रात 11:06 बजे तक और गद नामक औदायिक योग उपस्थित रहेगा। शास्त्रों के अनुसार यह दिन मां भगवती के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की आराधना और दर्शन के लिए समर्पित है। जो श्रद्धालु सप्तमी तिथि का व्रत रखते हैं, वे शनिवार को ही उपवास करेंगे। इसके साथ ही सार्वजनिक दुर्गा पूजा पंडालों में देवी प्रतिमाओं की स्थापना 17 अक्टूबर को प्रातः 8:58 बजे से पूर्व कर लेना शास्त्रीय दृष्टि से अत्यंत शुभ माना गया है।

18 अक्टूबर को रखा जाएगा महाष्टमी व्रत, होगी निशा पूजा और कन्या पूजन

अष्टमी तिथि को लेकर श्रद्धालुओं के मन में सबसे ज्यादा सवाल उठते हैं। पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर दिन रविवार को पड़ रही है। अष्टमी तिथि सूर्योदय पूर्व से प्रारंभ होकर पूरे दिन और पूरी रात रहेगी तथा अगले दिन यानी 19 अक्टूबर दिन सोमवार की सुबह 7:53 बजे तक प्रभावी रहेगी। उदयातिथि और शास्त्रीय मान के आधार पर इस बार नवरात्र में अष्टमी तिथि की वृद्धि हो रही है। इस दिन पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र दिन में 11:34 बजे तक रहेगा, जिसके बाद उत्तराषाढ़ा नक्षत्र लगेगा। सुकर्मा योग और शुभ नामक औदायिक योग इस दिन की दिव्यता को और बढ़ाते हैं। दिन में 11:34 बजे के बाद सर्वार्थ सिद्धि योग भी प्रारंभ हो जाएगा। इसलिए महाष्टमी का मुख्य व्रत 18 अक्टूबर दिन रविवार को ही रखा जाएगा और इसी दिन रात्रि में निशा पूजा का विधान पूरा किया जाएगा। जो परिवार अष्टमी के दिन कन्या पूजन की परंपरा निभाते हैं, वे भी 18 अक्टूबर को ही कन्याओं को भोजन कराएंगे। अष्टमी व्रत का पारण 19 अक्टूबर दिन सोमवार को सुबह 7:55 बजे के बाद किया जाएगा।

19 और 20 अक्टूबर को नवमी: हवन, पूजन और 9 दिनों के व्रत का पारण

19 अक्टूबर दिन सोमवार को प्रातः 7:53 बजे के बाद नवमी तिथि शुरू हो जाएगी, यद्यपि उदयाकालिक नवमी 20 अक्टूबर को मानी जाएगी। नवरात्र व्रत से जुड़े हवन, कन्या पूजन और अन्य मुख्य धार्मिक कार्य 19 अक्टूबर की सुबह 7:53 बजे से 20 अक्टूबर दिन मंगलवार की सुबह 9:35 बजे तक संपन्न किए जाएंगे। जो लोग नवमी तिथि में कन्या पूजन और कंजक जिमाने की परंपरा का पालन करते हैं, वे 19 अक्टूबर की सुबह 7:53 बजे के बाद से लेकर 20 अक्टूबर की सुबह 9:35 बजे से पहले तक कन्या पूजन कर सकते हैं। महानवमी का व्रत भी 19 अक्टूबर को ही रखा जाएगा क्योंकि 20 अक्टूबर को नवमी तिथि केवल सुबह 9:35 बजे तक ही रहेगी। जो श्रद्धालु पूरे 9 दिनों का उपवास रखते हैं, वे अपना व्रत पारण 20 अक्टूबर दिन मंगलवार को सुबह 9:35 बजे के बाद से लेकर शाम तक किसी भी समय कर सकते हैं।

20 अक्टूबर को मनाया जाएगा विजयादशमी का महापर्व

20 अक्टूबर दिन मंगलवार को प्रातः काल 9:35 बजे के उपरांत दशमी तिथि लग जाएगी, जिसके चलते विजयादशमी (दशहरा) का परम पवित्र पर्व 20 अक्टूबर को ही धूमधाम से मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार विजयादशमी का पूजन श्रवण नक्षत्र से युक्त दशमी तिथि में करना सर्वोत्तम माना गया है। पंचांग के अनुसार 20 अक्टूबर को अपराह्न 4:08 बजे से पूर्व श्रवण नक्षत्र से युक्त दशमी तिथि में दशहरा और शस्त्र पूजन संपन्न करना सबसे मंगलकारी और फलदायी रहेगा।

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