राज्यसभा में कांग्रेस का ग्राफ गिरा, भाजपा के सामने ‘इंडिया’ गठबंधन हुआ पस्त, डीएमके को भी लगा बड़ा झटका…

नई दिल्ली: देश की राजनीति के ऊपरी सदन यानी राज्यसभा में शक्ति संतुलन के समीकरण एक बार फिर बदलते हुए नजर आ रहे हैं। एनडीए के बढ़ते दबदबे के बीच विपक्षी गठबंधन ‘INDIA’ की स्थिति काफी कमजोर दिखाई दे रही है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, विपक्षी गठबंधन की धुरी कही जाने वाली कांग्रेस के पास अब सदन में महज 29 सीटें ही शेष रह गई हैं। सत्ताधारी भाजपा के विशाल संख्या बल के सामने कांग्रेस का यह आंकड़ा एक तिहाई से भी कम रह गया है, जो आगामी विधायी प्रक्रियाओं में विपक्ष की घेराबंदी को और मुश्किल बना सकता है।

भाजपा की भारी बढ़त और कांग्रेस की घटती ताकत

उच्च सदन में भारतीय जनता पार्टी का विजयरथ लगातार आगे बढ़ रहा है, जबकि कांग्रेस की सीटों का ग्राफ लगातार नीचे आ रहा है। वर्तमान स्थिति में भाजपा के मुकाबले कांग्रेस की ताकत काफी कम हो गई है। अगर पूरे विपक्षी कुनबे की बात करें, तो राज्यसभा में विपक्ष की कुल सीटों की संख्या सिमटकर 62 तक पहुंच गई है। सदन में संख्या बल की यह कमी विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण बिलों पर मतदान के दौरान बड़ी चुनौती पेश कर सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों का सीधा असर अब उच्च सदन की तस्वीर पर साफ दिखाई देने लगा है।

तमिलनाडु से भी आई बुरी खबर, डीएमके को बड़ा नुकसान

विपक्ष के लिए झटका केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं है। दक्षिण भारत में विपक्षी एकता का अहम हिस्सा मानी जाने वाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) को भी राज्यसभा में अपनी सीटों से हाथ धोना पड़ा है। डीएमके के सांसदों की संख्या सदन में घटकर अब केवल 8 रह गई है। क्षेत्रीय दलों में डीएमके का दबदबा कम होना ‘इंडिया’ ब्लॉक के लिए एक सामूहिक क्षति माना जा रहा है। तमिलनाडु की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली स्टालिन की पार्टी के लिए दिल्ली के गलियारों में संख्या बल कम होना रणनीतिक लिहाज से चिंता का विषय है।

उच्च सदन में अब क्या होगी विपक्ष की रणनीति?

राज्यसभा में विपक्ष की कुल 62 सीटों के साथ अब कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना होगा। भाजपा के पास बहुमत के आंकड़े के करीब होने से अब सरकार के लिए महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराना और भी आसान हो जाएगा। दूसरी ओर, कांग्रेस नेतृत्व के लिए सदन के भीतर अपनी आवाज को मुखर रखने के लिए अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ समन्वय बनाना अनिवार्य हो गया है। सदन के भीतर बदलता यह गणित देश की भविष्य की राजनीति और संसद की कार्यवाही पर गहरा प्रभाव डालने वाला साबित होगा।

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