ईरान का ऐसा डर, मनाने पहुंचे सऊदी-पाकिस्तान-तुर्की, तेहरान में मक्का पैक्ट का दम दिखाएंगे आसिम मुनीर

मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) की सरजमीं पर इस समय एक ऐसा अप्रत्याशित और बड़ा रणनीतिक घटनाक्रम आकार ले रहा है, जिसने वैश्विक राजनीति और कूटनीति के जानकारों को चौंका दिया है। ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते जबरदस्त तनाव, युद्ध की मंडराती आशंकाओं और अमेरिका की रणनीतिक मौजूदगी के बीच एक नई क्षेत्रीय घेराबंदी देखने को मिल रही है। ईरान के कड़े रुख और संभावित बड़े हमलों के खौफ के बीच सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की जैसे प्रमुख मुस्लिम राष्ट्रों ने सक्रिय कूटनीति का मोर्चा संभाल लिया है। इसी सिलसिले में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर, सऊदी अरब के उच्चस्तरीय राजनयिक और तुर्की के शीर्ष प्रतिनिधि एक बेहद महत्वपूर्ण मिशन पर ईरान की राजधानी तेहरान पहुंचे हैं। इस अभूतपूर्व बैठक का मुख्य उद्देश्य पूरे क्षेत्र को एक बड़े और विनाशकारी युद्ध की आग में झुलसने से बचाना है। तेहरान की धरती पर हो रही इस उच्चस्तरीय बैठक को केवल एक सामान्य कूटनीतिक मुलाकात नहीं माना जा रहा है, बल्कि यह मुस्लिम जगत के सबसे बड़े शिया और सुन्नी ताकतों के बीच एक नए संतुलन को साधने का एक बेहद गंभीर और ऐतिहासिक प्रयास है।

तेहरान में ‘मक्का पैक्ट’ का दिखेगा असली दम: जनरल आसिम मुनीर की मध्यस्थता और सुरक्षा गारंटी पर टिकी दुनिया की नजरें

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका पाकिस्तान के शक्तिशाली सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की मानी जा रही है, जो सऊदी अरब और ईरान के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में उभरकर सामने आए हैं। कुछ समय पहले हुए ऐतिहासिक ‘मक्का पैक्ट’ (Macca Pact) के तहत मुस्लिम देशों के बीच रक्षा, सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर जो सहमति बनी थी, तेहरान की इस बैठक में उसी पैक्ट की ताकत का प्रदर्शन किया जा रहा है। जनरल आसिम मुनीर तेहरान में ईरान के शीर्ष सैन्य कमान और सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व से मुलाकात कर यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि ईरान कोई ऐसा आत्मघाती या अति-आक्रामक कदम न उठाए, जिससे पूरे खाड़ी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा तंत्र पर संकट के बादल मंडराने लगें। पाकिस्तान अपने पुराने और विश्वसनीय सहयोगी सऊदी अरब तथा तुर्की के साथ मिलकर ईरान को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा है कि मुस्लिम देशों का यह नया गठबंधन क्षेत्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दों पर एक साथ खड़ा है, बशर्ते तेहरान अपनी युद्धकारी रणनीति में थोड़ी नरमी दिखाए और बातचीत के रास्ते को प्राथमिकता दे।

सऊदी अरब और तुर्की की बड़ी चिंता: क्यों ईरान के आक्रामक रुख से सहमे हैं खाड़ी के सबसे अमीर और ताकतवर देश?

सऊदी अरब और तुर्की भले ही सैन्य और आर्थिक रूप से बेहद मजबूत देश माने जाते हों, लेकिन ईरान की मिसाइल क्षमता, उसके खतरनाक ड्रोन बेड़े और पूरे क्षेत्र में फैले उसके प्रॉक्सी नेटवर्क (जैसे हिजबुल्लाह, हूती और इराकी मिलिशिया) का खौफ किसी से छिपा नहीं है। यदि ईरान और इजराइल या अमेरिका के बीच पूर्णकालिक युद्ध छिड़ता है, तो उसका सबसे पहला और विनाशकारी असर सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों, लाल सागर के समुद्री व्यापारिक मार्गों और तुर्की की क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ना तय है। यही वजह है कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और तुर्की का शीर्ष नेतृत्व खुद सीधे टकराने के बजाय कूटनीतिक रास्तों से ईरान के गुस्से को शांत करने में लगे हैं। रियाद और अंकारा अच्छी तरह जानते हैं कि अगर तेहरान ने अपने द्वार पूरी तरह से बंद कर लिए और आक्रामक सैन्य कार्रवाई का रुख किया, तो वैश्विक तेल संकट के साथ-साथ पूरे मिडिल ईस्ट की बुनियादी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगी। इसलिए ये देश ईरान को अपने पाले में बनाए रखने और उसे संयम बरतने के लिए मनाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।

इजराइल, अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों पर क्या पड़ेगा इस नए तेहरान-सऊदी-पाक-तुर्की गठजोड़ का असर?

तेहरान में बन रहे इस नए समीकरण ने वाशिंगटन से लेकर तेल अवीव तक की खुफिया एजेंसियों और रणनीतिकारों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अमेरिका और इजराइल लंबे समय से ईरान को अलग-थलग करने और उस पर अधिकतम दबाव बनाने की नीति पर काम कर रहे थे। लेकिन सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की जैसे अमेरिकी सहयोगियों का अचानक तेहरान पहुंचकर ईरान के साथ मेज पर बैठना इस बात का साफ संकेत है कि खाड़ी देश अब अपने फैसले खुद लेने लगे हैं और वे अमेरिका की हर नीति पर आंख मूंदकर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। यदि जनरल आसिम मुनीर और सऊदी-तुर्की प्रतिनिधिमंडल तेहरान को एक साझा सुरक्षा समझौते या समझबूझ पर राजी करने में कामयाब हो जाते हैं, तो यह पश्चिमी देशों की मिडिल ईस्ट नीति के लिए एक बहुत बड़ा झटका होगा। यह नया घटनाक्रम इस बात की भी तस्दीक करता है कि आने वाले समय में मध्य पूर्व का शक्ति-संतुलन अब केवल पश्चिमी ताकतों के इशारों पर नहीं चलेगा, बल्कि क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा खुद तय करेंगे।

मध्य पूर्व की राजनीति में क्या शांति बहाल कर पाएगा यह मिशन या बढ़ेगा संघर्ष का नया दौर?

अंत में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या तेहरान में ‘मक्का पैक्ट’ का दम दिखाने पहुंचे जनरल आसिम मुनीर, सऊदी अरब और तुर्की के प्रतिनिधि ईरान के सख्त और अडिग रुख को मोड़ने में सफल हो पाएंगे? ईरान का स्पष्ट मानना है कि जब तक उस पर लगे प्रतिबंध और उसकी सुरक्षा को होने वाले खतरों को पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता, तब तक वह अपनी सैन्य तैयारियों और आक्रामक रुख से पीछे नहीं हटेगा। हालांकि, मुस्लिम जगत के इन तीन बड़े देशों की संयुक्त मध्यस्थता ने बातचीत की एक नई और उम्मीद भरी खिड़की जरूर खोल दी है। यदि यह मिशन सफल रहता है, तो यह न केवल मध्य पूर्व को एक भीषण युद्ध से बचाएगा, बल्कि शिया-सुन्नी मतभेदों को दरकिनार कर एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा ब्लॉक के निर्माण की राह भी हमवार करेगा। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि तेहरान की इस हाई-प्रोफाइल बैठक से शांति का कोई रास्ता निकलता है या फिर मिडिल ईस्ट की सरजमीं पर बारूद का एक नया और भयानक धमाका देखने को मिलता है।

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