
उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधान सभा के साथ-साथ विधान परिषद (Legislative Council) का भी अत्यधिक महत्व माना जाता है। राज्य की उच्च सदन कही जाने वाली 100 सदस्यीय विधान परिषद की 11 सीटों (5 स्नातक और 6 शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र) के लिए हाल ही में मतदान संपन्न हुआ है। 152 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला मंगलवार, 27 अक्टूबर को होने वाली मतगणना के साथ सामने आ जाएगा। इस चुनाव परिणाम पर सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दल सपा दोनों की नजरें टिकी हुई हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में एमएलसी (MLC यानी विधान परिषद सदस्य) बनने की पूरी प्रक्रिया क्या है, कौन-कौन से लोग इनके चुनाव में वोट डालते हैं और संविधान में इसके लिए क्या नियम तय किए गए हैं? आइए जानते हैं यूपी विधान परिषद चुनाव, इसके विभिन्न कोटा प्रणालियों और वरीयता वोटिंग सिस्टम का पूरा गणित।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 171 के तहत राज्यों में विधान परिषद के गठन और उसके संचालन की रूपरेखा तय की गई है। उत्तर प्रदेश में विधान परिषद एक स्थाई सदन है, जिसका अर्थ यह है कि यह कभी भी भंग नहीं होती, बल्कि इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है। हर दो साल में इसके एक-तिहाई (1/3) सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं और नए सदस्यों का चुनाव होता है। यूपी में एमएलसी का चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार का भारत का नागरिक होना अनिवार्य है और उसकी न्यूनतम आयु 30 वर्ष होनी चाहिए (जबकि विधानसभा के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष है)। इसके अतिरिक्त उम्मीदवार का मानसिक रूप से स्वस्थ होना और किसी भी लाभ के पद (Office of Profit) पर न होना आवश्यक है।
उत्तर प्रदेश विधान परिषद में कुल 100 सीटें हैं, जो देश के किसी भी राज्य में सबसे अधिक हैं। इन 100 सदस्यों का चयन 5 अलग-अलग श्रेणियों और चुनाव मंडलों के माध्यम से होता है:
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विधानसभा विधायकों द्वारा (38 सीटें): 38 एमएलसी सीधे उत्तर प्रदेश विधानसभा के 403 विधायकों (MLAs) द्वारा अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर चुने जाते हैं।
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स्थानीय निकायों द्वारा (36 सीटें): 36 सदस्यों का चुनाव जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत (BDC) सदस्य, नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर पंचायतों के जनप्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है।
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स्नातक निर्वाचन क्षेत्र (8 सीटें): 8 सदस्यों का चुनाव राज्य के उन नागरिकों द्वारा किया जाता है जिन्होंने कम से कम तीन वर्ष पूर्व स्नातक (Graduation) की डिग्री प्राप्त कर ली हो। (वर्तमान में इनमें से 5 सीटों पर चुनाव हुआ है)।
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शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र (8 सीटें): 8 सदस्यों को माध्यमिक और उच्च शिक्षण संस्थानों में कम से कम तीन साल से पढ़ा रहे पंजीकृत शिक्षक वोट देकर चुनते हैं। (वर्तमान में इनमें से 6 सीटों पर चुनाव हुआ है)।
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राज्यपाल द्वारा नामांकित (10 सीटें): 10 सदस्यों को राज्य के राज्यपाल साहित्य, कला, विज्ञान, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा के क्षेत्र से सीधे नामांकित करते हैं।
स्नातक, शिक्षक और स्थानीय निकाय चुनावों में सामान्य आम चुनाव की तरह ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ (जिसको सबसे ज्यादा वोट मिले वो जीता) प्रणाली काम नहीं करती। यहाँ ‘एकल संक्रमणीय मत प्रणाली’ (Single Transferable Vote System) का पालन किया जाता है। मतदाता बैलेट पेपर पर उम्मीदवारों के नाम के आगे 1, 2, 3 जैसी प्राथमिकताएं (Preferences) दर्ज करते हैं। मतगणना के दौरान जीत के लिए एक न्यूनतम कोटा (Quota) निर्धारित किया जाता है। यदि पहली प्राथमिकता के वोटों में कोई उम्मीदवार निर्धारित कोटा हासिल नहीं कर पाता, तो सबसे कम वोट पाने वाले प्रत्याशी को दौड़ से बाहर कर उसके दूसरी प्राथमिकता वाले वोटों को अन्य उम्मीदवारों में ट्रांसफर कर दिया जाता है। यही कारण है कि एमएलसी चुनावों के नतीजे अक्सर देर रात तक आते हैं।
23 अक्टूबर को संपन्न हुए यूपी एमएलसी चुनाव में स्नातक और शिक्षक कोटा की 11 सीटों पर लगभग 55.24% वोटिंग दर्ज की गई थी। मंगलवार, 27 अक्टूबर को सुबह से शुरू होने वाली मतगणना के बाद 152 प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला हो जाएगा। इन नतीजों को 2027 के आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले शिक्षित वर्ग, बुद्धिजीवियों और शिक्षकों के बीच राजनीतिक माहौल को भांपने का एक बड़ा पैमाना माना जा रहा है। जहां सत्ताधारी दल अपना वर्चस्व बरकरार रखने के लिए प्रयासरत है, वहीं विपक्षी दल भी अपनी पैठ साबित करने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं।
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