कार्तिक मास के स्नान और दीपदान का अद्भुत फल, जानिए कैसे इसी पावन व्रत से सत्यभामा और रुक्मिणी को मिले थे भगवान श्रीकृष्ण

सनातन धर्म के पंचांग में कार्तिक मास को सभी बारह महीनों में सबसे पवित्र और पुण्य फलदायी माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख आता है कि जिस प्रकार सतयुग के समान कोई युग नहीं, वेदों के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, ठीक उसी प्रकार कार्तिक मास के समान कोई अन्य मास नहीं है। यह पूरा महीना जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु और उनके पूर्णावतार भगवान श्रीकृष्ण की आराधना के लिए समर्पित रहता है। शरद पूर्णिमा से प्रारंभ होकर कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाले इस महीने में ब्रह्म मुहूर्त में पवित्र नदियों, जलाशयों या घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान करने, आकाशदीप प्रज्वलित करने और तुलसी जी की नियमित पूजा करने का विधान है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान किया गया छोटा सा जप, तप और दान भी अक्षय पुण्य में बदल जाता है और जीवन के समस्त पापों का शमन कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

पद्म पुराण की पावन कथा: पूर्व जन्म में सत्यभामा का कार्तिक व्रत

कार्तिक मास के महात्म्य से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा पद्म पुराण के उत्तर खंड में विस्तार से मिलती है, जिसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पटरानी सत्यभामा को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराते हुए सुनाया था। सत्यभामा ने एक बार प्रभु से प्रश्न किया कि महाराज, मैंने पूर्व जन्म में ऐसा कौन सा पुण्य कर्म किया था जिसके फलस्वरूप मुझे आपकी पटरानी बनने और आपका अगाध प्रेम पाने का यह दुर्लभ सौभाग्य प्राप्त हुआ। तब भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए उन्हें बताया कि पूर्व जन्म में वे कावेरी नदी के तट पर एक पवित्र ब्राह्मण परिवार में गुणवती नाम की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थीं। गुणवती का विवाह एक सदाचारी ब्राह्मण युवक से हुआ था, किंतु दुर्भाग्यवश उनके पिता और पति दोनों की एक धार्मिक यात्रा के दौरान असामयिक मृत्यु हो गई। इस भीषण दुख और एकाकीपन के समय में गुणवती ने संसार के मोह को त्यागकर अपना संपूर्ण जीवन भगवान विष्णु की भक्ति में समर्पित कर दिया।

गुणवती की अखंड साधना और ब्रह्म मुहूर्त का पावन स्नान

पति और पिता के वियोग के बाद गुणवती ने प्रतिवर्ष कार्तिक मास आते ही कठोर नियमों का पालन करते हुए नियमपूर्वक कार्तिक स्नान और व्रत का अनुष्ठान प्रारंभ किया। वे पूरे कार्तिक मास में प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व तारों की छांव में नदी में स्नान करती थीं, भगवान विष्णु के विग्रह के सम्मुख घी और तिल के तेल का अखंड दीप जलाती थीं तथा तुलसी के पौधे की श्रद्धापूर्वक परिक्रमा और सेवा करती थीं। भोजन में वे केवल एक समय फलाहार अथवा सात्विक आहार ग्रहण करती थीं और दिन-रात ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का मानसिक जप करती रहती थीं। एक वर्ष कार्तिक मास के अंतिम दिनों में जब वे नदी में स्नान करने गईं, तो अत्यधिक ठंड और वृद्धावस्था के कारण उनका शरीर शिथिल पड़ गया और वे नदी के जल में ही समा गईं। उनके इस अखंड कार्तिक व्रत, दीपदान और पवित्र स्नान के अलौकिक प्रभाव से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु के पार्षद उन्हें सीधे वैकुंठ लोक ले गए, जहां उन्होंने दीर्घकाल तक दिव्य सुख भोगा।

द्वापर युग में सत्यभामा के रूप में अवतार और श्रीकृष्ण से विवाह

भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा को आगे रहस्य बताते हुए कहा कि जब पृथ्वी का भार हरने के लिए द्वापर युग में उनका पूर्णावतार हुआ, तो पूर्व जन्म की उसी तपस्विनी गुणवती ने राजा सत्राजित की परम सुंदरी और तेजस्वी पुत्री सत्यभामा के रूप में जन्म लिया। उनके पूर्व जन्म के कार्तिक स्नान और निष्काम दीपदान के प्रभाव से ही वे इस जन्म में साक्षात भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी बनीं और उन्हें सदैव प्रभु का विशेष सान्निध्य प्राप्त हुआ। भगवान ने स्पष्ट किया कि जो तुलसी का पौधा गुणवती ने अपने आंगन में सींचा था, वही उनके इस जन्म में कल्पवृक्ष के रूप में उनके महल के प्रांगण में स्थापित हुआ। इससे यह सिद्ध होता है कि कार्तिक मास में की गई सच्ची भक्ति और ब्रह्म स्नान का फल कभी निष्फल नहीं जाता, बल्कि वह जन्म-जन्मांतर तक आत्मा को दिव्यता और ईश्वर की समीपता प्रदान करता है।

देवी रुक्मिणी का नियमपूर्वक कार्तिक पूजन और प्रभु मिलन का योग

सत्यभामा की भांति ही भगवान श्रीकृष्ण की पट्टमहिषी देवी रुक्मिणी के जीवन में भी कार्तिक मास की पूजा और साधना का गहरा संबंध रहा है। विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री देवी रुक्मिणी बाल्यकाल से ही मन ही मन भगवान श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व और पति मान चुकी थीं। जब उनके भाई रुक्मी ने उनका विवाह जबरन चेदिराज शिशुपाल से तय कर दिया, तब रुक्मिणी जी ने अपने इष्ट की प्राप्ति के लिए कुलदेवी मां पार्वती यानी कात्यायनी देवी और भगवान नारायण की विशेष आराधना का संकल्प लिया। धार्मिक आख्यानों के अनुसार देवी रुक्मिणी ने भी कार्तिक के पावन दिनों में नियमपूर्वक सूर्योदय पूर्व स्नान कर देवी गौरी के साथ-साथ भगवान श्रीहरि का ध्यान किया था और अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु अखंड दीप जलाया था। इसी व्रत और अनन्य समर्पण के प्रभाव से भगवान श्रीकृष्ण ने ऐन विवाह के दिन विदर्भ पहुंचकर देवी रुक्मिणी का हरण किया और उन्हें अपनी प्रमुख पटरानी के रूप में द्वारका में प्रतिष्ठित किया।

कार्तिक मास में किन सरल नियमों के पालन से मिलता है अक्षय पुण्य

शास्त्रों के अनुसार जो भी भक्त कार्तिक मास के पावन दिनों में पूरी निष्ठा से नियमों का पालन करता है, उसके घर में सुख, शांति, सौभाग्य और लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। इस पूरे महीने में ब्रह्म मुहूर्त यानी सुबह चार से साढ़े पांच बजे के बीच स्नान करना सर्वोत्तम माना गया है; यदि पवित्र नदी में स्नान संभव न हो तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है। शाम के समय घर के मुख्य द्वार, तुलसी के पौधे के समीप और पूजा घर में देसी घी या तिल के तेल का दीपक जलाना अत्यंत कल्याणकारी होता है। पूरे महीने सात्विक आहार लेना, तामसिक भोजन जैसे प्याज, लहसुन और मदिरा से दूर रहना और प्रतिदिन श्रीमद्भागवत कथा या कार्तिक महात्म्य का एक अध्याय पढ़ना आध्यात्मिक चेतना को जागृत करता है। कार्तिक पूर्णिमा और देवउठनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह संपन्न कराने से कन्यादान के बराबर फल की प्राप्ति होती है और जीवन के सभी अमंगल दूर हो जाते हैं।

Check Also

अगले 44 दिन शनि की उल्टी चाल से मचेगी हलचल, इन 6 राशियों को रहना होगा बेहद सावधान

वैदिक ज्योतिष शास्त्र में न्याय और कर्म के अधिपति शनि देव को सबसे धीमे चलने …