वॉशिंगटन/नई दिल्ली: वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत के लिए एक चिंताजनक खबर सामने आ रही है। अमेरिका ने रूस और ईरान से तेल खरीद के लिए दी गई विशेष छूट (Waivers) की समय सीमा को आगे बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के इस कड़े फैसले के बाद अब भारत को सस्ते तेल के लिए खाड़ी देशों या अमेरिकी बाजार पर निर्भर रहना होगा, जो देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता की जेब पर भारी पड़ सकता है।
क्या है अमेरिकी ट्रेजरी विभाग का फैसला?
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने बुधवार को स्पष्ट घोषणा की कि रूस और ईरान के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों में जो अस्थायी ढील दी गई थी, उसकी मियाद अब खत्म हो चुकी है।
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रूस के लिए मियाद: 11 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गई।
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ईरान के लिए मियाद: 19 अप्रैल 2026 को समाप्त होने जा रही है।
अब कोई नया लाइसेंस जारी नहीं किया जाएगा, जिसका अर्थ है कि भारत जैसे देश अब इन देशों से रियायती दरों पर तेल नहीं खरीद पाएंगे।
भारत के लिए क्यों है यह ‘तगड़ा झटका’?
भारत इस छूट का सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है। जब फरवरी 2026 में अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थीं, तब भारत ने इस छूट का लाभ उठाकर रूस से लगभग 3 करोड़ बैरल तेल के ऑर्डर दिए थे।
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रिफाइनरियों पर असर: रिलायंस जैसी भारतीय रिफाइनरियों ने छूट मिलने के बाद रूसी कंपनी रोसनेफ्ट और लुकोइल से बड़ी मात्रा में तेल मंगवाया था।
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बढ़ती निर्भरता: एशियाई देशों की अपील के बावजूद अमेरिका ने यह रुख अपनाया है, जिससे अब सस्ती ऊर्जा की आपूर्ति पर संकट मंडराने लगा है।
ट्रंप प्रशासन की मजबूरी और विपक्षी दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दी गई इस छूट की उनके अपने देश में कड़ी आलोचना हो रही थी।
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डेमोक्रेट्स का तर्क: विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं (जैसे चक शूमर) का आरोप था कि भारत और अन्य देशों को दी गई इस छूट से रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध लड़ने के लिए भारी फंड मिल रहा है।
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सुरक्षा चिंताएं: अमेरिकी सीनेटरों का कहना है कि एक तरफ रूस यूक्रेन में हमले कर रहा है, तो दूसरी तरफ ईरान अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाने के लिए खुफिया जानकारी जुटा रहा है। ऐसे में उन्हें आर्थिक राहत देना अमेरिका के हित में नहीं है।
घरेलू अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
रूस और ईरान से तेल का आयात बंद होने या कम होने की स्थिति में भारत को महंगे विकल्पों की ओर मुड़ना पड़ेगा:
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महंगा पेट्रोल-डीजल: आपूर्ति कम होने और महंगे आयात से घरेलू स्तर पर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (LPG) की कीमतों में बढ़ोतरी का दबाव बनेगा।
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वैकल्पिक पेमेंट गेटवे: भारत को अब अमेरिकी डॉलर से बचते हुए रुपया-रुबल (Rupee-Ruble) व्यापार प्रणाली को और अधिक मजबूत करना होगा, ताकि प्रतिबंधों के बावजूद रूस के साथ व्यापार जारी रखा जा सके।
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महंगाई का खतरा: ईंधन की कीमतों में उछाल सीधे तौर पर परिवहन लागत को बढ़ाएगा, जिससे जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।
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