Bollywood Retro: भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो अपने समय से इतनी आगे होती हैं कि दर्शक और बॉक्स ऑफिस उन्हें समझ ही नहीं पाते। आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसी ही कल्ट क्लासिक फिल्म की, जो बनने के बाद पूरे 25 साल तक ‘ठंडे बस्ते’ में रही। ताज्जुब की बात यह है कि इस फिल्म को ‘भारतीय LSD ट्रिप’ कहा जाता है और आज के दौर के दिग्गज फिल्ममेकर अनुराग कश्यप और इम्तियाज अली भी इससे प्रेरणा लेते हैं। हम बात कर रहे हैं साल 1988 में बनी फिल्म ‘ओम दर-ब-दर’ (Om-Dar-B-Dar) की।
कमल स्वरूप का वो प्रयोग, जिसने हिला दिया था बॉलीवुड
इस फिल्म का निर्देशन कमल स्वरूप ने किया था। कमल स्वरूप फ्रेंच सिनेमा और एक्सपेरिमेंटल फिल्ममेकिंग के जबरदस्त शौकीन थे। उन्होंने ‘ओम दर-ब-दर’ को उस दौर के पारंपरिक और घिसे-पिटे बॉलीवुड मसालों से बिल्कुल अलग हटकर बनाया था। फिल्म के दृश्य, इसकी कहानी कहने का तरीका और इसके इमोशन्स इतने जुदा थे कि आज भी फिल्ममेकिंग के छात्रों के लिए यह किसी ‘टेक्स्टबुक’ से कम नहीं है। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में आज भी इस फिल्म की मिसाल दी जाती है।
अवॉर्ड मिला पर रिलीज का रास्ता रहा बंद
फिल्म की त्रासदी देखिए, साल 1989 में इस फिल्म ने ‘क्रिटिक्स च्वॉइस अवॉर्ड’ जीता, लेकिन इसके बावजूद इसे सिनेमाघरों का मुंह देखने के लिए ढाई दशक का लंबा इंतजार करना पड़ा। डिस्ट्रीब्यूटर्स को लगा कि यह फिल्म आम जनता के पल्ले नहीं पड़ेगी, और इसे शेल्फ (Shelf) कर दिया गया। देखते ही देखते 25 साल बीत गए और यह सिनेमाई मास्टरपीस डिब्बों में कैद धूल फांकता रहा।
दिग्गज निर्देशकों की प्रेरणा और फिल्म का ‘पुनर्जन्म’
अनुराग कश्यप और इम्तियाज अली जैसे निर्देशकों ने कई इंटरव्यूज में स्वीकार किया है कि उनकी फिल्मों के कई अतरंगी आइडियाज ‘ओम दर-ब-दर’ से प्रेरित रहे हैं। अब अच्छी खबर यह है कि इस फिल्म को डिजिटल रूप से री-स्टोर किया जा रहा है। नई तकनीक और कलर्स के साथ इसे फिर से तैयार किया जा रहा है, ताकि आज की पीढ़ी इस ऐतिहासिक प्रयोग को देख सके।
क्या बॉलीवुड लौटेगा अपनी ओरिजिनलिटी की ओर?
पिछले कुछ समय से बॉलीवुड ‘रीमेक’ और ‘कॉपी पेस्ट’ कल्चर की वजह से साउथ सिनेमा की आंधी में पिछड़ता नजर आया था। हालांकि, अब कुछ ओरिजिनल कंटेंट वाली फिल्मों ने फिर से उम्मीद जगाई है। ‘ओम दर-ब-दर’ जैसी फिल्मों का फिर से चर्चा में आना यह बताता है कि दर्शक अब फ्रेश और आर्टिस्टिक सिनेमा की मांग कर रहे हैं। बॉलीवुड के मेकर्स को समझना होगा कि केवल कॉमर्शियल मसाला ही नहीं, बल्कि ‘आर्ट’ और ‘ओरिजिनलिटी’ ही सिनेमा को अमर बनाती है।
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