हिमंत बिस्वा सरमा का ‘मामा’ अवतार: आखिर क्यों असम का हर बच्चा पुकारता है उन्हें यह नाम? जानिए लोकप्रियता का असली राज

गुवाहाटी: असम की सियासत में ‘किंगमेकर’ से लेकर ‘किंग’ तक का सफर तय करने वाले हिमंत बिस्वा सरमा ने मंगलवार को लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में हुए इस शपथ ग्रहण समारोह ने यह साफ कर दिया कि पूर्वोत्तर में हिमंत का कद अब हिमालय जैसा ऊंचा हो चुका है। लेकिन इस कड़क और सख्त प्रशासक की एक दूसरी छवि भी है, जो असम की गलियों और स्कूलों में बेहद मशहूर है— वह है सबका ‘मामा’ होना।

क्लासरूम से शुरू हुआ ‘मामा’ बनने का सफर

हिमंत बिस्वा सरमा को ‘मामा’ का उपनाम किसी पीआर एजेंसी ने नहीं दिया, बल्कि इसकी शुरुआत असम के माजुली क्षेत्र के क्लासरूम्स से हुई। दरअसल, जब सरमा शिक्षा मंत्री थे, तब उन्होंने राज्य की स्कूली छात्राओं के लिए साइकिल वितरण योजना शुरू की थी। इस योजना की सफलता को देखकर छात्रों ने भी मजाक-मजाक में उनसे साइकिल की मांग शुरू कर दी।

एक चुनावी रैली के दौरान जब छात्रों ने उनसे साइकिल मांगी, तो उन्होंने मजाकिया लहजे में पूछा, “क्या आपको भी साइकिल चाहिए?” बच्चों ने जोश में ‘हां’ कहा और वहीं से सवाल शुरू हुआ— “मामा हमें साइकिल कब मिलेगी?” देखते ही देखते यह नाम रैलियों से निकलकर सोशल मीडिया और फिर घर-घर तक पहुंच गया।

‘मामा की गारंटी’ और सरकारी योजनाओं का जादू

2021 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद हिमंत ने अपनी छवि को ‘आम आदमी के नेता’ के रूप में ढाल लिया। चुनावी रैलियों में छोटे बच्चों का उन्हें गले लगाना और ‘मामा-मामा’ चिल्लाना उनकी लोकप्रियता का प्रमाण बन गया।

  • पारिवारिक जुड़ाव: असमिया संस्कृति में ‘मामा’ (मां का भाई) एक भरोसेमंद और लाड़-प्यार करने वाला रिश्ता माना जाता है।

  • कल्याणकारी योजनाएं: स्वास्थ्य, शिक्षा और वित्त विभाग संभालने के दौरान उनके द्वारा लागू की गई सीधी लाभ वाली योजनाओं ने उन्हें जनता के बेहद करीब ला दिया।

  • ब्रैंडिंग: चुनाव के दौरान “मामा की गारंटी” जैसे नारों ने विपक्ष के हर वार को फीका कर दिया।

सख्त प्रशासक और कोमल राजनेता का संगम

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिमंत बिस्वा सरमा ने खुद को एक ऐसे बहुआयामी नेता के रूप में स्थापित किया है जो अपराधियों के लिए सख्त है, लेकिन आम जनता और बच्चों के लिए सुलभ। वे अक्सर बिना किसी सुरक्षा तामझाम के लोगों के बीच चले जाते हैं और उनकी समस्याएं सुनते हैं। यही सहजता उन्हें एक पारंपरिक राजनेता से अलग ‘पारिवारिक सदस्य’ की पहचान देती है।

राजनीति में उपनामों का पुराना नाता

भारतीय राजनीति में भावनात्मक जुड़ाव के लिए उपनामों का चलन बहुत पुराना है। जिस तरह तमिलनाडु में जयललिता ‘अम्मा’ बनीं, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ‘दीदी’ और उत्तर प्रदेश में मायावती ‘बहनजी’ के रूप में जानी गईं, उसी तरह अब पूर्वोत्तर की राजनीति में हिमंत बिस्वा सरमा ‘मामा’ के रूप में एक मजबूत ब्रैंड बन चुके हैं।

2015 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने वाले हिमंत ने न केवल असम में कमल खिलाया, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर (Northeast) को भगवा रंग में रंगने में अहम भूमिका निभाई। अब दूसरी बार मुख्यमंत्री बनकर उन्होंने साबित कर दिया है कि ‘मामा’ का जादू अभी बरकरार है।

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