बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने हाल ही में तीस्ता और पद्मा बैराज परियोजनाओं के निर्माण का ऐलान कर पड़ोसी भारत की रणनीतिक नींद उड़ा दी है। खास बात यह है कि रहमान अब इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए चीन से अरबों डॉलर की फंडिंग मांगने की तैयारी में हैं, जो सीधे तौर पर भारत के ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर की सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है।
चीन दौरे से पहले रहमान का बड़ा दांव
जून के अंत में तारिक रहमान चीन के आधिकारिक दौरे पर जाने वाले हैं। उससे ठीक पहले गाजीपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनकी सरकार पद्मा और तीस्ता बैराज परियोजनाओं पर काम शुरू करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रहमान का यह कदम महज जल प्रबंधन नहीं, बल्कि चीन के साथ एक गहरे आर्थिक और रणनीतिक गठबंधन की शुरुआत है।
भारत के लिए क्यों है यह ‘रेड फ्लैग’?
बांग्लादेश के इस फैसले के पीछे की सबसे बड़ी वजह ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) है। भारत का यह 22 किलोमीटर चौड़ा संकरा रास्ता पूर्वोत्तर राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। इस इलाके के इतने करीब तीस्ता बैराज के निर्माण में चीन की सरकारी कंपनियों और चीनी इंजीनियरों की मौजूदगी भारत के लिए गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा चिंता का विषय है। भारत को डर है कि इस प्रोजेक्ट के बहाने चीन इस संवेदनशील इलाके में अपनी निगरानी और पकड़ मजबूत कर सकता है।
पानी की राजनीति और कूटनीतिक झटका
बांग्लादेश का कहना है कि उसे सूखे के मौसम में पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है और फरक्का बैराज की वजह से दक्षिण में खारा पानी बढ़ रहा है। तारिक रहमान ने कहा, “हमें यह बैराज बनाना ही होगा ताकि मॉनसून का पानी जमा किया जा सके।” हालांकि, कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि तीस्ता जल बंटवारे का समझौता सालों से लटका हुआ है, और भारत में आंतरिक राजनीतिक विरोध के चलते समझौते पर हस्ताक्षर न हो पाना अब बांग्लादेश को चीन की गोद में धकेल रहा है।
क्या है चीन की चाल?
बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने हाल ही में बीजिंग में चीनी समकक्ष वांग यी से मिलकर 1 अरब डॉलर के इस प्रोजेक्ट पर चर्चा की है। चीन इस पूरे काम को अपने महत्वाकांक्षी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के तहत आगे बढ़ाना चाहता है। अगर चीन इस परियोजना को फंड करता है, तो यह स्पष्ट है कि बांग्लादेश के इंफ्रास्ट्रक्चर पर बीजिंग का दबदबा और अधिक बढ़ जाएगा, जो भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति के लिए एक बड़ी चुनौती है।
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