पश्चिम बंगाल की राजनीति से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। साल 2026 के विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर अब तक का सबसे बड़ा ऐतिहासिक विभाजन और राजनीतिक संकट गहरा गया है। पार्टी के 58 विधायकों ने ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया है।
इस बीच, बंगाल भाजपा (BJP) के कद्दावर और वरिष्ठ नेता स्वपन दासगुप्ता ने अपनी ही पार्टी को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला और कड़ा बयान दिया है। स्वपन दासगुप्ता ने भाजपा नेतृत्व को आगाह किया है कि वे टीएमसी से पाला बदलकर आने वाले नेताओं को लेकर अति-उत्साहित न हों, बल्कि पूरी तरह सतर्क और सावधान रहें।
सोशल मीडिया पर स्वपन दासगुप्ता का धमाका: ‘झूठे दोस्तों से हमेशा सावधान रहें’
गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर एक बेहद तीखा और कड़ा पोस्ट साझा करते हुए स्वपन दासगुप्ता ने भाजपा के भीतर मची संभावित हलचल पर ब्रेक लगा दिया। उन्होंने लिखा:
“TMC के इस आत्मविनाश (Self-Destruction) पर मुझे रत्ती भर भी दुख नहीं है। मेरी बस यही एकमात्र उम्मीद है कि टीएमसी के गुंडों की राजनीतिक संस्कृति पश्चिम बंगाल भाजपा को भी दूषित न करने लगे। हम सभी भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं को ऐसे झूठे दोस्तों से हमेशा सावधान रहना होगा, जो आज हमसे सिर्फ इसलिए नजदीकी बढ़ा रहे हैं, क्योंकि उन्हें सत्ता से बाहर होने के बाद अपने पिछले पाप धोने हैं। बंगाल को इस राजनीतिक गंदगी से साफ-सुथरा बनाने का यह काम बीच में अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता।”
‘नई TMC’ का गठन! 80 में से 58 विधायकों का तख्तापलट, अभिषेक बनर्जी ‘गेट आउट’
स्वपन दासगुप्ता की यह तीखी प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है, जब कोलकाता में टीएमसी के भीतर जारी बगावत ने एक नया और विध्वंसक मोड़ ले लिया है। सूत्रों से मिली पक्की जानकारी के मुताबिक, विधानसभा में टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों ने बगावत का झंडा बुलंद करते हुए सीधे विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) रथींद्रनाथ बोस से मुलाकात की। इन बागी विधायकों ने लिखित रूप से तृणमूल कांग्रेस विधायक दल पर अपना असली दावा पेश कर दिया है।
बागी विधायकों ने हाल ही में ममता बनर्जी द्वारा पार्टी से निष्कासित किए गए कद्दावर नेता और विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में अपना नया ‘नेता प्रतिपक्ष’ (Leader of Opposition) चुनने का आधिकारिक प्रस्ताव दिया है। इस पूरे घटनाक्रम को डायमंड हार्बर से सांसद और ममता के उत्तराधिकारी माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी के लिए सबसे बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। बागी गुट ने सार्वजनिक रूप से ऐलान कर दिया है कि भविष्य में ‘नई टीएमसी’ के न तो विधायक दल में और न ही संगठन के ढांचे में अभिषेक बनर्जी की कोई भूमिका होगी।
‘ममता बनर्जी हमारी सर्वोच्च नेता, लेकिन…’ बागी गुट की नई शर्त
हैरानी की बात यह है कि विद्रोही खेमे ने पार्टी को तोड़ने और अभिषेक बनर्जी को बाहर का रास्ता दिखाने के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर अपना भरोसा जताया है। बागी गुट ने स्पष्ट किया है कि ममता बनर्जी ही उनकी सर्वोच्च नेता बनी रहेंगी। हालांकि, उन्होंने एक नया फॉर्मूला पेश करते हुए प्रस्ताव दिया है कि ममता बनर्जी अब सक्रिय राजनीति और रोजमर्रा के फैसलों से दूर रहकर विपक्ष का मार्गदर्शन करने के लिए केवल ‘मुख्य सलाहकार’ (Chief Advisor) की भूमिका निभाएं।
नकली हस्ताक्षर या असली बगावत? टीएमसी नेतृत्व ने खटखटाया कानून का दरवाजा
दूसरी तरफ, इस अप्रत्याशित तख्तापलट से सकते में आए टीएमसी के केंद्रीय नेतृत्व ने बागी विधायकों के दावों और दस्तावेजों की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। टीएमसी के वरिष्ठ प्रवक्ता और नेता कुनाल घोष ने बागी गुट पर धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए कहा कि विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए पत्रों में कई ऐसे विधायकों के हस्ताक्षर हैं, जो दोनों पक्षों (ममता गुट और बागी गुट) के दस्तावेजों में दिखाई दे रहे हैं। कुनाल घोष ने कहा कि हस्ताक्षरों में की गई इस बड़ी हेराफेरी की कानूनी और फॉरेंसिक जांच होना बेहद जरूरी है और पार्टी इस पूरे मामले को बहुत जल्द अदालत में चुनौती देने जा रही है।
बंगाल की राजनीति में अब आगे क्या? क्यों बंद हैं भाजपा के दरवाजे
TMC में जारी यह भयंकर गृहयुद्ध पश्चिम बंगाल की सियासत को एक बिल्कुल नई और अप्रत्याशित दिशा में ले जा रहा है। ममता बनर्जी की पार्टी सत्ता से बेदखल होने के बाद अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर और संगठनात्मक बिखराव से गुजर रही है। वहीं, भाजपा इस पूरे घटनाक्रम पर बाज जैसी पैनी नजर बनाए हुए है।
स्वपन दासगुप्ता की इस बेहद तल्ख टिप्पणी से यह साफ संकेत मिलता है कि भाजपा का वैचारिक और पुराना नेतृत्व टीएमसी से होने वाले संभावित राजनीतिक पलायन (दलबदल) को लेकर ज्यादा खुश नहीं है। यही कारण है कि भाजपा ने फिलहाल टीएमसी के दागियों के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह नहीं खोले हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा से हरी झंडी न मिलने के कारण ही बागी गुट फिलहाल पूरी तरह भाजपा में शामिल होने के बजाय ममता बनर्जी को ही अपना मुखौटा (नेता) बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहा है।
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