Maya Bazar 1957: न कंप्यूटर, न VFX! 1957 में मेकर्स ने इस गजब के जुगाड़ से शूट किए थे जादुई सीन्स, देखकर रह जाएंगे दंग

आज के आधुनिक सिनेमा में अगर किसी सुपरहीरो का साइज बढ़ाना हो, हवा में गाड़ियां उड़ानी हों या थाली से उड़कर खाना सीधे मुंह में पहुंचाना हो, तो मेकर्स आंख बंद करके VFX (विजुअल इफेक्ट्स) और CGI तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। कंप्यूटर के कुछ क्लिक्स से आज सब कुछ मुमकिन है। लेकिन जरा सोचिए, आज से करीब 7 दशक पहले साल 1957 में जब तकनीक का नामोनिशान नहीं था, तब मेकर्स इन जादुई दृश्यों को पर्दे पर कैसे उतारते होंगे? इसका सबसे बेजोड़ और ऐतिहासिक उदाहरण है तेलुगु और तमिल सिनेमा की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘मायाबाजार’ (Mayabazar)। इस फिल्म के क्रिएटिव सीन्स को देखकर आज की जेनरेशन को भी यह भ्रम हो सकता है कि कहीं यह AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का कमाल तो नहीं! आइए जानते हैं कि बिना किसी आधुनिक तकनीक के मेकर्स ने केवल अपने दिमाग और कैमरे के एंगल से यह इतिहास कैसे रचा था।

जब घटोत्कच का साइज देखकर हैरान रह गए थे दर्शक

फिल्म ‘मायाबाजार’ का एक सीन आज भी सिनेमा के शौकीनों के बीच बेहद लोकप्रिय है। इस सीन में भीमपुत्र ‘घटोत्कच’ को भोजन करने से पहले अचानक अपना आकार (साइज) बहुत बड़ा करते हुए दिखाया गया है। साल 1957 के लिहाज से यह चमत्कार जैसा था। महज 2 लाख रुपये के बेहद सीमित बजट में बनी इस फिल्म के लिए मेकर्स ने किसी कंप्यूटर का सहारा नहीं लिया।

इस सीन को फिल्माने के लिए डायरेक्टर ने ‘लो एंगल कैमरा शॉट’ (Low Angle Shot) का इस्तेमाल किया। घटोत्कच का किरदार निभा रहे एक्टर को एक विशेष मूविंग ट्रॉली पर बिठाया गया और कैमरे को नीचे रखकर ट्रॉली को धीरे-धीरे कैमरे की तरफ आगे बढ़ाया गया। कैमरे के इस सटीक एंगल और सही टाइमिंग की वजह से स्क्रीन पर ऐसा भ्रम पैदा हुआ कि घटोत्कच का आकार सचमुच बहुत विशाल हो रहा है।

उड़ते हुए लड्डू और रिवर्स गियर का वो अनोखा फॉर्मूला

फिल्म का दूसरा सबसे जादुई और मजेदार सीन वह था, जब घटोत्कच के सामने रखी थालियां अपने आप आगे बढ़ती हैं और मिठाई व लड्डू हवा में उड़कर सीधे उनके मुंह में चले जाते हैं। इस सीन के पीछे मेकर्स ने ‘रिवर्स क्रोनोलॉजी’ (Reverse Film Technique) का इस्तेमाल किया था।

असल में, इस सीन की शूटिंग बिल्कुल सामान्य तरीके से की गई थी, जिसमें लड्डू को मुंह से बाहर निकाला गया था और बाद में संपादन (Editing) के समय फिल्म की रील को उल्टा (रिवर्स) चलाकर उसकी स्पीड बढ़ा दी गई। जब दर्शकों ने इसे स्क्रीन पर देखा, तो ऐसा लगा जैसे लड्डू हवा में तैरते हुए घटोत्कच के मुंह में समा रहे हैं।

स्टॉप मोशन एनिमेशन का पहला देसी देसी प्रयोग

थाली और बर्तनों के अपने आप आगे बढ़ने वाले सीन के लिए मेकर्स ने एक बेहद चालाक और थका देने वाली ट्रिक अपनाई। उन्होंने खाने के बर्तनों की अलग-अलग दूरियों और पोजीशन्स पर हजारों तस्वीरें खींचीं। जिस तरह शुरुआती दौर में कार्टून या एनिमेशन फिल्में बनाई जाती थीं (जिसे आज हम स्टॉप मोशन एनिमेशन कहते हैं), मेकर्स ने उन सभी तस्वीरों को एक खास तेज सीक्वेंस में रील पर चला दिया। जब इन तस्वीरों को एक के बाद एक तेजी से प्रोजेक्ट किया गया, तो भ्रम पैदा हुआ कि टेबल पर रखे बर्तन अपने आप ही धीरे-धीरे आगे खिसक रहे हैं।

क्या VFX के आने से सुस्त हो गई है मेकर्स की क्रिएटिविटी?

सिनेमा के जानकार मानते हैं कि तकनीक ने जहां आज फिल्ममेकर्स का काम बहुत आसान कर दिया है, वहीं कहीं न कहीं निर्देशकों की ‘रॉ क्रिएटिविटी’ (मौलिक रचनात्मकता) को कम भी किया है। आज के समय में किसी भी मुश्किल सीन को शूट करने से पहले मेकर्स दिमाग लगाने के बजाय उसे सीधे पोस्ट-प्रोडक्शन और VFX टीम के हवाले कर देते हैं। जबकि ‘मायाबाजार’ जैसी फिल्में हमें सिखाती हैं कि अगर आपके पास सीमित संसाधन और बजट हो, तब भी केवल कैमरे के लेंस, लाइटिंग और गजब के कॉमन सेंस से स्क्रीन पर जादू बिखेरा जा सकता है।

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