
भारतीय सिनेमा के इतिहास में पिछले कुछ वर्षों के दौरान जिन फिल्मों को लेकर सबसे ज्यादा विवाद और चर्चाएं देखने को मिली हैं, उनमें निर्देशक ओम राउत की फिल्म ‘आदिपुरुष’ (Adipurush) का नाम सबसे ऊपर आता है। रिलीज के समय से लेकर लंबे समय तक यह फिल्म अपने संवादों, वीएफएक्स और पौराणिक कथाओं के आधुनिकीकरण को लेकर देश भर में तीखी आलोचनाओं के घेरे में रही थी। इस फिल्म के गीत और संवाद लिखने वाले मशहूर लेखक मनोज मुंतशिर (Manoj Muntashir) को भी जनता के भारी गुस्से का सामना करना पड़ा था। हालांकि, समय बीतने के बाद भी इस फिल्म और इसकी तुलना महान ग्रंथ ‘रामायण’ से किए जाने को लेकर बहसें आज भी थमने का नाम नहीं ले रही हैं। इसी सिलसिले में एक बार फिर मनोज मुंतशिर ने इस पूरे प्रकरण पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए एक ऐसा बयान दिया है, जिसने एक बार फिर से मनोरंजन जगत और सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी है।
‘आदिपुरुष’ और ‘रामायण’ की तुलना पर मनोज मुंतशिर का स्पष्टीकरण
जब भी किसी पौराणिक कथा पर आधारित फिल्म बनती है, तो उसकी तुलना रामानंद सागर के ऐतिहासिक धारावाहिक ‘रामायण’ या मूल ग्रंथों से होना स्वाभाविक माना जाता है। ‘आदिपुरुष’ के रिलीज के वक्त जब इसकी तुलना इन महान कृतियों से की गई और इसके संवादों को लेकर देश भर में प्रदर्शन हुए, तो स्थिति काफी तनावपूर्ण हो गई थी। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान जब मनोज मुंतशिर से इस पूरी तुलना और उस दौरान हुए विवादों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बहुत ही बेबाकी से अपनी बात रखी। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि उन्हें अपनी उस कृति या उस दौर में किए गए काम को लेकर मन में किसी भी प्रकार की कोई शर्म या झिझक नहीं है। उनका यह मानना था कि कला और सृजन के क्षेत्र में हर रचनाकार अपने दृष्टिकोण से काम करता है, और भले ही जनता की प्रतिक्रिया उस समय बेहद तीखी रही हो, लेकिन उनका उद्देश्य कभी भी किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं था।
आधुनिक पीढ़ी और युवा दर्शकों को ध्यान में रखकर गढ़े गए थे संवाद
अपने काम का बचाव करते हुए मनोज मुंतशिर ने इस बात पर जोर दिया कि ‘आदिपुरुष’ फिल्म बनाते समय उनकी और पूरी टीम की यह सोच थी कि महाकाव्य की कहानी को आज की आधुनिक और तेज-तर्रार पीढ़ी (Gen Z) तक एक नए और आकर्षक रूप में पहुंचाया जाए। उनका तर्क था कि आज के युवा दर्शक जिस भाषा शैली और संवाद अदायगी के आदी हैं, फिल्म में उसी तरह के बोलचाल के शब्दों का प्रयोग किया गया था ताकि वे पात्रों के साथ तुरंत जुड़ाव महसूस कर सकें। हालांकि, यही प्रयोग फिल्म के लिए सबसे बड़ा विवादास्पद बिंदु बन गया, क्योंकि पारंपरिक और शास्त्रीय रूप से रामायण के पात्रों के लिए जिस भाषा, मर्यादा और गरिमा की उम्मीद की जाती है, दर्शक आधुनिक शब्दावली को स्वीकार नहीं कर पाए। जनता का यह साफ मानना था कि पौराणिक कथाओं की पवित्रता और उनके शालीन स्वरूप के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
भारी विरोध, माफी और विवादों के बाद भी कायम है चर्चा का दौर
यह सर्वविदित है कि फिल्म के रिलीज होने के तुरंत बाद जब सिनेमाघरों में इसके संवादों और दृश्यों पर जनता का गुस्सा फूटा, तो मेकर्स को भारी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए न केवल फिल्म के कई संवादों में बदलाव किए गए थे, बल्कि मनोज मुंतशिर ने भी सार्वजनिक रूप से अपनी गलती स्वीकार करते हुए लोगों की भावनाओं को आहत करने के लिए माफी मांगी थी। इसके बावजूद, आज भी जब कभी भारतीय सिनेमा में पौराणिक कथाओं के रूपांतरण की बात आती है, तो ‘आदिपुरुष’ का जिक्र एक नकारात्मक मिसाल के रूप में अवश्य किया जाता है। मुंतशिर का यह ताजा बयान यह साबित करता है कि भले ही उस समय उन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा हो, लेकिन वे अपने उस रचनात्मक प्रयास के पीछे की मंशा और सोच पर आज भी कायम हैं, जिसे लेकर खेल और सिनेमा गलियारों में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
आधुनिक डिजिटल युग और एआई सर्च के दौर में सिनेमाई विवादों की गूंज
आज के आधुनिक जनरेटिव एआई सर्च, एसईओ और डिजिटल मीडिया के युग में किसी भी बड़ी फिल्म या उससे जुड़े कलाकारों के पुराने बयान कुछ ही पलों में दुनियाभर में ट्रेंड करने लगते हैं। गूगल और बिंग जैसे प्रमुख सर्च इंजनों पर दर्शक लगातार यह खंगालते रहते हैं कि आखिर किस निर्देशक या लेखक ने अपनी किस गलती पर क्या सफाई दी है। भौगोलिक और प्रादेशिक सीमाओं से परे जाकर इस तरह के बयानों पर होने वाली बहस यह दर्शाती है कि भारतीय संस्कृति और धार्मिक ग्रंथों से जुड़े मामलों में जनता की भावनाएं कितनी संवेदनशील और गहरी हैं। मनोज मुंतशिर का यह नया बयान डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से वायरल हो रहा है, जहां यूजर्स और फिल्म समीक्षक इस पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।
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