अकाली दल-बीजेपी गठबंधन की फिर होगी वापसी? पीएम मोदी से सुखबीर की मुलाकात के बाद 2027 पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले गर्माई सियासी हवा

दिल्ली के सियासी गलियारों से लेकर पंजाब के मालवा, माझा और दोआबा क्षेत्रों तक इस समय एक ही सवाल की सबसे ज्यादा गूंज है—क्या पंजाब में शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) एक बार फिर 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले एक मंच पर साथ आ सकते हैं?

संसद भवन परिसर में शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई एक अहम मुलाकात ने पंजाब के सियासी पारे को अचानक से बढ़ा दिया है। यद्यपि दोनों ही दलों के कुछ नेता इसे एक शिष्टाचार भेंट बता रहे हैं, लेकिन इस मुलाकात के तुरंत बाद अकाली दल द्वारा केंद्र सरकार के दो प्रमुख मुद्दों—संसद में महिला आरक्षण विधेयक और राज्यों के परिसीमन (Delimitation) के प्रस्ताव—का खुला समर्थन करने के फैसले ने गठबंधन की अटकलों को कई गुना तेज कर दिया है।

क्यों महसूस हो रही है दोनों दलों को एक-दूसरे की राजनीतिक जरूरत?

पंजाब की राजनीति में दशकों तक बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन एक प्राकृतिक और अटूट ‘सिख-हिंदू भाईचारे’ के प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है। साल 1997 से 2020 तक लगातार 24 वर्षों तक दोनों दलों ने एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा और 1997, 2007 तथा 2012 में राज्य में पूर्ण बहुमत के साथ सरकारें चलाईं।

हालांकि, सितंबर 2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान आंदोलनों के दबाव के चलते अकाली दल को एनडीए (NDA) से अलग होना पड़ा था। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। बाद में मोदी सरकार ने उन कृषि कानूनों को वापस ले लिया, लेकिन दोनों दलों के बीच बनी दूरियां 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव तक जारी रहीं।

अलग-अलग चुनाव लड़ने का नुकसान दोनों ही पार्टियों को उठाना पड़ा:

  • 2022 विधानसभा चुनाव का सच: 117 सीटों वाली पंजाब विधानसभा में अकाली दल को मात्र 3 सीटें और बीजेपी को केवल 2 सीटें ही हासिल हो सकीं। आम आदमी पार्टी (AAP) ने रिकॉर्ड 92 सीटें जीतकर ऐतिहासिक प्रचंड बहुमत हासिल किया।

  • 2024 लोकसभा चुनाव के आंकड़े: लोकसभा चुनाव में भी अलग-अलग किस्मत आजमाने पर अकाली दल केवल 1 सीट (बठिंडा) ही जीत पाया, जबकि बीजेपी का खाता तक नहीं खुल सका। हालांकि, आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि बीजेपी का वोट शेयर बढ़कर लगभग 19% हो गया और अकाली दल का वोट शेयर मिलाकर दोनों का संयुक्त वोट प्रतिशत लगभग 33% बैठता है। यदि दोनों मिलकर लड़ते, तो चुनावी नतीजे काफी अलग हो सकते थे।

2027 के चुनावी गणित में ‘हिंदू-सिख’ वोट बैंक का पुनर्मिलन?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी (AAP) के शासन और कांग्रेस के मजबूत आधार के मुकाबले खड़े होने के लिए अकाली दल और बीजेपी दोनों को ही एक-दूसरे के पारंपरिक जनाधार की आवश्यकता है।

  • ग्रामीण बनाम शहरी वोट बैंक: अकाली दल का प्रभाव पारंपरिक रूप से पंजाब के ग्रामीण इलाकों, किसानों और सिख कैडर में है। दूसरी ओर, बीजेपी ने पंजाब के शहरी केंद्रों, व्यापारिक वर्ग और हिंदू वोटरों के बीच अपनी पकड़ को काफी मजबूत किया है।

  • कैडर और नेताओं की राय: अकाली दल के वरिष्ठ नेता सिकंदर सिंह मलूका जैसे कई दिग्गजों का खुलकर मानना है कि पंजाब के राज्य हित और दोनों दलों के कैडर की भावना यही है कि गठबंधन को फिर से आकार दिया जाए। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी पहले ही यह बयान दे चुके हैं कि 2027 में पंजाब में सरकार बनाने के लिए एक व्यावहारिक गठबंधन ही एकमात्र रास्ता है।

बीजेपी और अकाली दल का आधिकारिक स्टैंड: ‘अभी पत्ते पूरी तरह नहीं खुले’

प्रधानमंत्री मोदी के साथ सुखबीर बादल की इस मुलाकात के बाद जहां विपक्षी दल (कांग्रेस और आम आदमी पार्टी) सहमे नजर आ रहे हैं और रणनीति बदलने में जुट गए हैं, वहीं दोनों दलों का शीर्ष नेतृत्व अभी फूंक-फूंककर कदम रख रहा है।

पंजाब बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों और राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपी सिंह ने मीडिया के सामने कहा है कि पार्टी फिलहाल पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारियां कर रही है। बीजेपी का एक धड़ा मानता है कि पार्टी को अपने बूते राज्य में मुख्य विपक्षी दल बनने की कोशिश करनी चाहिए।

दूसरी तरफ, सुखबीर सिंह बादल का कहना है कि उनकी पहली प्राथमिकता अकाली दल के संगठन को पुनर्गठित और मजबूत करना है। लेकिन कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि राजनीति में कोई भी दरवाजा हमेशा के लिए बंद नहीं होता। 2027 के चुनाव आते-आते सीटों के बंटवारे (Seat Sharing Ratio) पर सहमति बनाकर दोनों दल एक बार फिर एनडीए के झंडे तले हाथ मिला सकते हैं।

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