यूपी विधानसभा चुनाव 2027 के लिए भाजपा प्रत्याशियों पर दिल्ली में महामंथन शुरू, राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन एक-एक सांसद से ले रहे ग्राउंड फीडबैक

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर होने वाले 2027 के सियासी महासमर को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अभी से अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। देश के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से सबसे अहम राज्य में लगातार तीसरी बार सरकार बनाकर इतिहास रचने के इरादे से पार्टी का शीर्ष नेतृत्व चुनावी मोड में आ चुका है। चुनाव में जीत-हार का सबसे बड़ा पैमाना सही, बेदाग और जिताऊ प्रत्याशियों का चयन होता है, और इसी रणनीति के तहत देश की राजधानी दिल्ली में भाजपा प्रत्याशियों के चयन और जमीनी समीकरणों पर गंभीर विचार-विमर्श शुरू हो गया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने खुद इस पूरे चुनावी मिशन की कमान संभाल ली है। वे नई दिल्ली में उत्तर प्रदेश के भाजपा सांसदों के साथ लगातार वन-ऑन-वन (आमने-सामने) बैठकें कर रहे हैं, ताकि हर लोकसभा क्षेत्र और उसके अंतर्गत आने वाली विधानसभाओं की सटीक नब्ज पहचानी जा सके।

दिल्ली में ‘वन-टू-वन’ बैठकें: 25 से अधिक सांसदों से लिया गया ग्राउंड रिपोर्ट

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की अध्यक्षता में चल रही इन मुलाकातों का सिलसिला बेहद गोपनीय और रणनीतिक है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी अध्यक्ष अब तक उत्तर प्रदेश के 25 से अधिक लोकसभा और राज्यसभा सांसदों से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर चुके हैं। इन बैठकों में न केवल संबंधित क्षेत्र के राजनीतिक माहौल पर चर्चा हो रही है, बल्कि जनता के मूड, स्थानीय समस्याओं, जातिगत प्राथमिकताओं और सरकारी योजनाओं के धरातल पर क्रियान्वयन को लेकर भी सवाल-जवाब किए जा रहे हैं।

सांसदों से स्पष्ट शब्दों में पूछा जा रहा है कि उनके संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विधानसभा क्षेत्रों में मौजूदा विधायकों की क्या छवि है, क्या उनके खिलाफ कोई एंटी-इंकंबेंसी (सत्तारूढ़ विरोधी लहर) है, और यदि किसी सीट पर विधायक के खिलाफ नाराजगी है तो उसके विकल्प के रूप में कौन सा नया चेहरा सबसे मजबूत साबित हो सकता है। सांसदों से सीधे फीडबैक लेने की इस कवायद का मकसद किसी भी गुटबाजी या सिफारिशी राजनीति से हटकर पूरी तरह यथार्थवादी रिपोर्ट तैयार करना है।

मौजूदा विधायकों की परफॉर्मेंस का ऑडिट और संभावित चेहरों पर राय

भाजपा आलाकमान इस बार किसी भी तरह का जोखिम उठाने के मूड में नहीं है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि 2027 के चुनाव में बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों के टिकट कटने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। सांसदों से लिए जा रहे फीडबैक में विधायकों की कार्यशैली, जनता के बीच उनकी उपलब्धता, कार्यकर्ताओं से उनका संवाद और उनके प्रति इलाके का आक्रोश जैसे बिंदुओं को परखा जा रहा है।

नितिन नवीन की इस कवायद के साथ-साथ पार्टी विभिन्न स्वतंत्र एजेंसियों के जरिए भी राज्य की सभी विधानसभा सीटों पर मल्टी-लेवल सर्वे करा रही है। जब सांसदों की व्यक्तिगत राय और निजी सर्वे की रिपोर्ट का मिलान किया जाएगा, तब जाकर संभावित प्रत्याशियों के नामों का पैनल तैयार होगा। जो विधायक अपने क्षेत्रों में निष्क्रिय पाए जाएंगे या जिनकी छवि विवादित रही है, उनकी जगह नए, युवा और सामाजिक रूप से मजबूत चेहरों को मौका देने की रूपरेखा बनाई जा रही है।

2024 के लोकसभा चुनाव से सबक और ‘मिशन 2027’ से 2029 की राह

भाजपा के इस कड़े रुख और समय से काफी पहले शुरू हुई तैयारी के पीछे 2024 के आम चुनाव के परिणाम भी एक बड़ी वजह हैं। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 403 में से 255 सीटें जीतकर 41.29 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 37 साल बाद यूपी में लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर इतिहास रचा था। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन ने भाजपा को उत्तर प्रदेश में कड़ा झटका दिया और आधी से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की।

लोकसभा चुनाव के इस झटके से सबक लेते हुए भाजपा नेतृत्व ने यह ठान लिया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में किसी भी स्तर पर ढिलाई नहीं बरती जाएगी। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व यह भली-भांति जानता है कि यदि 2027 में उत्तर प्रदेश में सत्ता की हैट्रिक लगती है, तभी 2029 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सत्ता का रास्ता आसान होगा। यही वजह है कि चुनाव से महीनों पहले ही संगठन और बूथ-स्तरीय संरचना को मजबूत करने का काम युद्धस्तर पर शुरू हो चुका है।

एनडीए के सहयोगी दलों के साथ सामाजिक समीकरण और संतुलन की रणनीति

भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन सांसदों के साथ बैठकों में अपने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के सहयोगियों के प्रभाव और जमीनी ताकत का भी बारीकी से आकलन कर रहे हैं। इस बार चुनावी मैदान में भाजपा के साथ ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) और जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोकदल (RLD) मजबूती से खड़ी हैं। ये दोनों दल 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के साथ मिलकर लड़े थे, लेकिन अब एनडीए के पाले में हैं।

इसके अलावा डॉ. संजय निषाद की निषाद पार्टी और केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल का अपना दल (सोनेलाल) भी भाजपा के पुराने और विश्वसनीय सहयोगी हैं। सांसदों से फीडबैक लिया जा रहा है कि पश्चिमी यूपी में रालोद के साथ और पूर्वांचल में सुभासपा व निषाद पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर सीटों का क्या समीकरण बनेगा। किस सीट पर किस सहयोगी दल को लड़ाना फायदे का सौदा होगा और कहां भाजपा का अपना सिंबल ज्यादा प्रभावी रहेगा, इस पर भी गहन चिंतन हो रहा है।

संगठन के विस्तार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ समन्वय

हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी दिल्ली का दौरा कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से लंबी मुलाकात की थी। इस बैठक में उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक विकास कार्यों के साथ-साथ पार्टी संगठन के विस्तार और सरकार व संगठन के बीच बेहतर तालमेल बिठाने पर विस्तृत चर्चा हुई थी।

बीजेपी ने हाल ही में अपने क्षेत्रीय प्रभारियों, मोर्चा प्रभारियों और जिला संयोजकों की नई टीमों की घोषणा कर सामाजिक संतुलन साधने का बड़ा प्रयास किया है। ब्रज, पश्चिम, अवध, काशी, गोरखपुर और कानपुर-बुंदेलखंड के क्षेत्रों में ब्राह्मण, ठाकुर, कुर्मी, लोधी, मौर्य, शाक्य और अन्य गैर-यादव ओबीसी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व देकर यह साफ कर दिया गया है कि भाजपा 2027 की लड़ाई सामाजिक समीकरण, बूथ प्रबंधन और मजबूत प्रत्याशियों के त्रिकोण पर लड़ेगी।

दिल्ली में सांसदों के साथ नितिन नवीन का यह मंथन आने वाले दिनों में और तेज होगा। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, इन बैठकों से निकला निष्कर्ष भाजपा की अंतिम कैंडिडेट लिस्ट और प्रचार रणनीति की सबसे मजबूत रीढ़ साबित होगा।

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