आईएएस रिंकू सिंह का बड़ा खुलासा: सरकारी विभागों में आउटसोर्सिंग के नाम पर चल रहे करोड़ों के सिंडिकेट और भ्रष्टाचार का पर्दाफाश

सरकारी विभागों में मानव संसाधन की आपूर्ति के लिए शुरू की गई आउटसोर्सिंग व्यवस्था अब भ्रष्टाचार और संगठित लूट का सबसे बड़ा अड्डा बन चुकी है। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह ने विभिन्न प्रशासनिक विभागों और निगमों में आउटसोर्सिंग के नाम पर चल रहे सुनियोजित फर्जीवाड़े का पर्दाफाश करते हुए पूरे सिस्टम को हिलाकर रख दिया है। आधिकारिक जांच और औचक निरीक्षण के दौरान यह बात सामने आई है कि निजी एजेंसियों, बिचौलियों और कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से हर महीने करोड़ों रुपये के सरकारी बजट का बंदरबांट किया जा रहा था। इस खुलासे के बाद शासन स्तर पर हड़कंप मच गया है और संबंधित एजेंसियों के साथ-साथ विभागीय नोडल अधिकारियों की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच शुरू कर दी गई है।

संविदा कर्मचारियों का आर्थिक शोषण और कट मनी का संगठित नेटवर्क

जांच रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला पहलू उन गरीब और जरूरतमंद युवाओं का शोषण है, जो आउटसोर्सिंग के जरिए चतुर्थ और तृतीय श्रेणी के पदों पर काम कर रहे हैं। एजेंसियों द्वारा कागजों पर सरकार से निर्धारित न्यूनतम वेतन, ईपीएफ (कर्मचारी भविष्य निधि) और ईएसआईसी (कर्मचारी राज्य बीमा) का पूरा भुगतान लिया जाता था, लेकिन जमीन पर कर्मियों को उसका आधा हिस्सा भी नहीं दिया जा रहा था। कई मामलों में सामने आया है कि कर्मचारियों के खातों में पूरा वेतन भेजने के बाद उनसे नकद के रूप में तय कमीशन या ‘कट मनी’ वापस ले ली जाती थी। यदि कोई संविदाकर्मी इसका विरोध करता, तो उसे बिना किसी नोटिस के नौकरी से बाहर करने की धमकी दी जाती थी। इस तरह हजारों युवाओं की मजबूरी का फायदा उठाकर एजेंसी संचालक अपनी तिजोरियां भर रहे थे।

फाइलों में दर्ज ‘घोस्ट वर्कर’: कागजों पर तैनाती और खातों में फर्जी निकासी

आईएएस रिंकू सिंह की पड़ताल में बड़े पैमाने पर ‘घोस्ट वर्कर’ यानी फर्जी कर्मचारियों का मामला भी पकड़ा गया है। कई सरकारी दफ्तरों, नगर निकायों और अस्पतालों में स्वीकृत पदों के सापेक्ष जितने आउटसोर्स कर्मचारी कागजों पर तैनात दिखाए गए थे, मौके पर उनमें से आधे भी मौजूद नहीं मिले। उपस्थिति पंजिका में फर्जी हस्ताक्षर और बायोमेट्रिक हाजिरी में हेरफेर करके उन लोगों के नाम पर भी हर महीने लाखों रुपये का वेतन निकाला जा रहा था, जो कभी काम पर आए ही नहीं। यह पैसा सीधे एजेंसी संचालकों और विभागीय अफसरों की जेब में कमीशन के रूप में पहुंच रहा था। इस गंभीर वित्तीय अनियमितता के ठोस सबूत मिलने के बाद कई विभागों की पुरानी फाइलों को जब्त कर फोरेंसिक ऑडिट कराने की तैयारी की जा रही है।

टेंडर प्रक्रिया में फर्जीवाड़ा और चहेती कंपनियों को ठेके देने का खेल

आउटसोर्सिंग के इस पूरे मायाजाल की जड़ें टेंडर आवंटन प्रक्रिया से जुड़ी हुई हैं। जांच में पाया गया कि कई ऐसी कंपनियों को आउटसोर्सिंग के बड़े ठेके दिए गए, जिनके पास न तो आवश्यक अनुभव था और न ही वित्तीय क्षमता। नियमों को ताक पर रखकर चहेती फर्मों को लाभ पहुंचाने के लिए टेंडर की शर्तों में जानबूझकर बदलाव किए गए थे। कई जगहों पर एक ही व्यक्ति द्वारा अलग-अलग नामों से बनाई गई मुखौटा कंपनियों (शेल कंपनियों) ने टेंडर में भाग लिया और मिलीभगत करके बोली हासिल कर ली। पारदर्शिता के लिए बनाए गए जेम पोर्टल (GeM Portal) और ई-टेंडरिंग नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं, जिससे सरकारी खजाने को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा।

प्रशासनिक स्तर पर व्यापक एक्शन: एजेंसियों की ब्लैकलिस्टिंग और एफआईआर के निर्देश

आईएएस अधिकारी द्वारा रिपोर्ट शासन को सौंपे जाने के बाद अब दोषियों के खिलाफ चौतरफा कार्रवाई की रणनीति बनाई गई है। दोषी पाई गई निजी मैनपावर एजेंसियों को तत्काल प्रभाव से ब्लैकलिस्ट करने और उनकी बैंक गारंटी जब्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसके अलावा गबन और धोखाधड़ी में शामिल कंपनी संचालकों तथा सांठगांठ करने वाले विभागीय अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करने की तैयारी है। संबंधित जनपदों में तैनात वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में सभी आउटसोर्स कर्मचारियों का भौतिक सत्यापन करें और बैंक खातों के सीधे लेनदेन की पुष्टि करें।

पारदर्शी व्यवस्था और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) से भ्रष्टाचार पर लगेगी लगाम

इस बड़े सिंडिकेट के उजागर होने के बाद अब आउटसोर्सिंग व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की रूपरेखा तैयार की जा रही है। भविष्य में ऐसे घोटालों को रोकने के लिए संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों का वेतन सीधे उनके आधार लिंक बैंक खातों में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए भेजने पर विचार किया जा रहा है। इसके अलावा सभी विभागों में केंद्रीयकृत ऑनलाइन पोर्टल और फेस-रिकॉग्निशन आधारित बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली को अनिवार्य किया जाएगा। आईएएस रिंकू सिंह की इस साहसिक पहल को प्रशासनिक सुधार और सिस्टम की शुचिता के लिए एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है, जिससे न केवल युवाओं को उनका हक मिलेगा बल्कि सरकारी धन की बर्बादी पर भी प्रभावी रोक लगेगी।

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