जेल से रिहा होते ही कहां गायब हुआ 30 मुकदमों वाला हिस्ट्रीशीटर? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस की भूमिका पर उठाए सवाल

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के कुख्यात हिस्ट्रीशीटर मुत्तलिव के जेल से रिहा होने के तुरंत बाद रहस्यमयी परिस्थितियों में लापता हो जाने के मामले ने सूबे के पुलिस महकमे और प्रशासनिक गलियारों में भारी हड़कंप मचा दिया है। जिले के विभिन्न थानों में करीब 30 संगीन आपराधिक मामलों में नामजद रहे मुत्तलिव की गुमशुदगी को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। रिहाई के बाद से उसका कोई सुराग न मिलने और पुलिस द्वारा अवैध हिरासत में लिए जाने के आरोपों की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने निष्पक्ष जांच के लिए इस पूरे प्रकरण की कमान केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने का ऐतिहासिक आदेश जारी किया है। अदालत का मानना है कि चूंकि इस मामले में सीधे तौर पर स्थानीय पुलिस की भूमिका ही सवालों के घेरे में है, इसलिए राज्य पुलिस से निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती।

जेल से बाहर आते ही हिरासत में लेने का आरोप: भाई आलम की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से हुआ पर्दाफाश

इस सनसनीखेज घटनाक्रम का खुलासा तब हुआ जब मुत्तलिव के भाई आलम ने अपने लापता भाई की तलाश और जीवन रक्षा की गुहार लगाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका दाखिल की। याचिका में पेश किए गए तथ्यों के अनुसार, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 17 दिसंबर 2025 को ही मुत्तलिव की जमानत अर्जी मंजूर कर ली थी। कानूनी प्रक्रियाओं और सत्यापन के लंबे दौर के बाद 4 मई 2026 को उसे औपचारिक रूप से जेल से रिहा किया गया। याचिकाकर्ता का गंभीर आरोप है कि जैसे ही मुत्तलिव जेल की चहारदीवारी से बाहर आया, पहले से घात लगाकर मौजूद पुलिसकर्मियों ने उसे और उसके पिता को जबरन अपनी गाड़ी में बैठाकर अवैध हिरासत में ले लिया। इसके बाद 7 मई 2026 को पुलिस ने मुत्तलिव के पिता को तो छोड़ दिया, लेकिन मुत्तलिव को अपने पास ही रोक लिया। उस दिन के बाद से मुत्तलिव का आज तक कोई अता-पता नहीं चला है।

‘गायब होने के सिर्फ दो ही रास्ते’: पुलिस की कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट की तीखी और गंभीर टिप्पणी

मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरे घटनाक्रम, पुलिस डायरी और दाखिल किए गए जवाबों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद बेहद तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि जेल से छूटने के बाद किसी व्यक्ति के इस तरह एकाएक ओझल हो जाने की परिस्थितियों में केवल दो ही मुख्य संभावनाएं बनती हैं। पहली संभावना यह हो सकती है कि पुलिस ने उसे अपनी अवैध हिरासत में रखा और उसके साथ कोई गंभीर अनहोनी या जानलेवा कृत्य घटित हो गया हो, जिसे छिपाने का प्रयास किया जा रहा है। दूसरी संभावना यह बनती है कि हिस्ट्रीशीटर कानून के शिकंजे और अदालती जवाबदेही से बचने के लिए खुद भूमिगत हो गया हो और इसमें कहीं न कहीं पुलिस की शिथिलता या मिलीभगत रही हो। अदालत ने कहा कि चाहे जो भी स्थिति हो, राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसी की नाक के नीचे से किसी व्यक्ति का इस प्रकार लापता हो जाना कानून के शासन और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

राज्य पुलिस की जांच पर अविश्वास: सीबीआई करेगी मुजफ्फरनगर के थानों और अफसरों की पड़ताल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जब आरोप सीधे तौर पर स्थानीय पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ लगे हों, तो उत्तर प्रदेश पुलिस की किसी भी आंतरिक शाखा द्वारा की जाने वाली जांच पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि न्यायिक शुचिता और पीड़ित परिवार के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए मामले को स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी को सौंपा जाना नितांत आवश्यक है। हाईकोर्ट ने सीबीआई को निर्देशित किया है कि वह तुरंत मुजफ्फरनगर पुलिस से मामले से संबंधित सभी केस डायरी, एफआईआर, जनरल डायरी (GD), संबंधित पुलिस चौकियों व थानों के सीसीटीवी फुटेज और हिरासत के समय तैनात पुलिसकर्मियों के मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) को अपने कब्जे में ले। सीबीआई अब इस बात की तह तक जाएगी कि 4 मई को जेल से निकलने के बाद मुत्तलिव को आखिरी बार कहां और किसके साथ देखा गया था।

मुजफ्फरनगर के अपराध जगत में मुत्तलिव का इतिहास और मानवाधिकार का संवैधानिक संतुलन

मुत्तलिव कोई सामान्य नागरिक नहीं, बल्कि मुजफ्फरनगर जिले का एक कुख्यात हिस्ट्रीशीटर रहा है, जिसके खिलाफ हत्या के प्रयास, लूट, रंगदारी, गैंगस्टर एक्ट और आर्म्स एक्ट जैसे करीब 30 गंभीर मुकदमे दर्ज हैं। उसके आपराधिक अतीत के कारण इलाके में उसकी दहशत रही है। हालांकि, न्यायपालिका ने अपने फैसलों में बार-बार यह स्थापित किया है कि किसी व्यक्ति का आपराधिक इतिहास चाहे कितना भी लंबा क्यों न हो, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस या राज्य मशीनरी को कानून अपने हाथ में लेने या ‘एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल’ तरीके से कार्रवाई करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष ट्रायल और विधिक संरक्षण की गारंटी देता है। यदि किसी हिस्ट्रीशीटर की कस्टोडियल सुरक्षा में चूक होती है या वह संदिग्ध परिस्थितियों में गायब होता है, तो यह संपूर्ण न्याय प्रणाली के लिए एक बड़ा अलार्म है।

खाकी की जवाबदेही पर उठे सवाल: अब सीबीआई जांच से खुलेगा हिस्ट्रीशीटर की गुमशुदगी का राज

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस कड़े फैसले के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस महकमे में खलबली मच गई है। मुजफ्फरनगर के संबंधित सर्किल और थानों में उस दौरान तैनात रहे पुलिस अधिकारियों और बीट प्रभारियों पर अब सीबीआई का शिकंजा कसना तय माना जा रहा है। केंद्रीय जांच एजेंसी जल्द ही मुजफ्फरनगर जेल के तत्कालीन अधिकारियों, रिहाई के गवाहों और पीड़ित परिजनों के बयान दर्ज कर अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट अदालत में पेश करेगी। इस पूरे मामले ने एक बार फिर पुलिस कस्टडी, कानूनी प्रक्रियाओं और हिरासत में बंदियों के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ी राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। अब सबकी निगाहें सीबीआई की जांच पर टिकी हैं कि क्या मुत्तलिव को जीवित बरामद किया जा सकेगा या फिर पुलिस फाइलों के पीछे छिपे किसी बड़े राज का पर्दाफाश होगा।

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