
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को संपूर्ण सनातन जगत में योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर समूचा ब्रजमंडल—मथुरा, वृंदावन, गोकुल, नंदगांव और बरसाना—कान्हा के जयकारों से गुंजायमान है। वहीं उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात समेत पूरे देश के कृष्ण मंदिरों में भव्य तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। वैदिक पंचांग के अनुसार इस वर्ष भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को लेकर श्रद्धालुओं के मन में समय और मुहूर्त को लेकर विशेष उत्सुकता है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 4 सितंबर को भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का मुख्य पर्व गृहस्थ और स्मार्त परंपरा के अनुसार मनाया जा रहा है।
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि (निशीथ काल) में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग में हुआ था। यही कारण है कि जन्माष्टमी की पूजा का मुख्य केंद्र रात के 12 बजे का समय होता है। शास्त्रों में वर्णित है कि जो श्रद्धालु इस दिन पूरे विधि-विधान से उपवास रखते हैं और शुभ मुहूर्त में बाल गोपाल का पंचामृत अभिषेक कर भोग अर्पित करते हैं, उनके जीवन के समस्त कष्ट, ग्रह दोष और संताप स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
जन्माष्टमी की अष्टमी तिथि और निशीथ काल पूजा का सटीक मुहूर्त
वैदिक पंचांग की सूक्ष्म गणना के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 3 सितंबर की देर रात से हो रहा है और यह तिथि 4 सितंबर की रात तक प्रभावी रहेगी। चूंकि भगवान श्रीकृष्ण का अवतार अर्धरात्रि में हुआ था, इसलिए जिस रात अष्टमी तिथि व्यापिनी होती है, उसी दिन गृहस्थ जन जन्माष्टमी का व्रत और पूजन संपन्न करते हैं। स्थानीय मानक समय के अनुसार 4 सितंबर की रात्रि में पूजा का सबसे फलदायी मुहूर्त प्राप्त हो रहा है।
4 सितंबर की रात को पूजा का सबसे श्रेष्ठ ‘निशीथ काल’ मुहूर्त रात्रि 11 बजकर 57 मिनट से प्रारंभ होकर देर रात 12 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। इस प्रकार भगवान श्री बांके बिहारी और लड्डू गोपाल के जन्मोत्सव, अभिषेक और महाआरती के लिए श्रद्धालुओं को कुल 46 मिनट की अत्यंत शुभ समयावधि प्राप्त होगी। इस 46 मिनट की समयावधि को शास्त्रों में अमृत वेला के समान माना गया है। धर्मशास्त्रियों का मत है कि इसी समयावधि के भीतर कान्हा का जन्मोत्सव मनाना, खीरे की नाल काटकर उनका प्राकट्य कराना और शंखनाद करना परम कल्याणकारी सिद्ध होता है।
रोहिणी नक्षत्र और जयंती योग का दुर्लभ खगोलीय संयोग
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय वृषभ राशि में चंद्रमा और रोहिणी नक्षत्र का संचरण था। जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का मिलन मध्यरात्रि में होता है, तो इसे अत्यंत दुर्लभ ‘जयंती योग’ कहा जाता है। इस वर्ष 4 सितंबर की रात को नक्षत्रों की चाल विशेष रूप से अनुकूल बन रही है। चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में विराजमान होकर भक्तों पर अपनी अमृतमयी शीतलता बरसाएंगे।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जयंती योग में किया गया जन्माष्टमी का व्रत हजारों एकादशी व्रतों के पुण्य फल के बराबर माना गया है। जो जातक संतान सुख, पारिवारिक शांति या आर्थिक संपन्नता की कामना रखते हैं, उनके लिए इस विशिष्ट नक्षत्र योग में पूजन करना मनोवांछित फल प्रदान करने वाला होगा। काशी और अयोध्या के प्रकांड पंचांगकारों का कहना है कि यह खगोलीय स्थिति कई वर्षों बाद भक्तों के लिए दुर्लभ आध्यात्मिक ऊर्जा का संचय लेकर आई है।
स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय की तिथियों में क्या है अंतर
भारतीय सनातन परंपरा में जन्माष्टमी का पर्व दो अलग-अलग नियमों के आधार पर मनाया जाता है—पहला स्मार्त परंपरा (गृहस्थ जीवन जीने वाले लोग) और दूसरा वैष्णव संप्रदाय (साधु, संत और इस्कॉन परंपरा)। स्मार्त मत में अर्धरात्रि में अष्टमी तिथि की प्रधानता को प्राथमिकता दी जाती है, जिसके अनुसार 4 सितंबर को व्रत रखना शास्त्रसम्मत माना गया है।
वहीं वैष्णव परंपरा में सूर्योदय व्यापिनी अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र की उदया तिथि को आधार बनाया जाता है। वैष्णव संप्रदाय के मंदिरों और अखाड़ों में साधु-संत अगली तिथि को उत्सव के रूप में मनाते हैं। हालांकि सामान्य गृहस्थों के लिए 4 सितंबर का दिन ही व्रत संकल्प और निशीथ काल पूजन के लिए सर्वमान्य और शुभ फलदायी है। मथुरा के प्रमुख मंदिरों में भी 4 सितंबर की मध्यरात्रि को ही जन्मोत्सव का मुख्य महाभिषेक आयोजित किया जा रहा है।
जन्माष्टमी व्रत पारण का समय और शास्त्रसम्मत नियम
जन्माष्टमी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण (उपवास खोलना) शास्त्रीय विधि और सही समय पर किया जाए। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को पारण के समय का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है, क्योंकि गलत समय पर व्रत खोलने से पूजा का फल क्षीण हो जाता है।
4 सितंबर को रखे गए व्रत का पारण अगले दिन यानी 5 सितंबर को प्रातः काल किया जाएगा। पंचांग के अनुसार 5 सितंबर को सूर्योदय के उपरांत प्रातः 06 बजकर 04 मिनट के बाद किसी भी समय व्रत का पारण किया जा सकता है। जिन श्रद्धालुओं ने अष्टमी तिथि या रोहिणी नक्षत्र के समापन के बाद पारण करने का संकल्प लिया है, वे 5 सितंबर की सुबह प्रातः कालीन पूजा संपन्न कर पारण करें। व्रत खोलते समय सबसे पहले भगवान को अर्पित किए गए पंचामृत और चरणामृत को ग्रहण करना चाहिए। इसके पश्चात पंजीरी या माखन-मिश्री का प्रसाद लेकर ही सात्विक अन्न या फलाहार ग्रहण करना धर्मसम्मत माना गया है। पारण के भोजन में लहसुन, प्याज या भारी तेल-मसालों का प्रयोग वर्जित माना गया है।
घर पर लड्डू गोपाल की पूजा और अभिषेक की प्रामाणिक विधि
जन्माष्टमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और हाथ में जल, अक्षत व पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें। दिनभर भगवान के नाम का स्मरण करें और सात्विक आचरण बनाए रखें। शाम के समय पूजा स्थल की सफाई कर एक चौकी पर लाल या पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं और वहां भगवान कृष्ण की बाल रूप प्रतिमा (लड्डू गोपाल) अथवा राधा-कृष्ण की छवि स्थापित करें।
मध्यरात्रि 11 बजकर 57 मिनट पर पूजा प्रारंभ करें। सबसे पहले एक तांबे या चांदी की थाली में लड्डू गोपाल को विराजमान करें और गंगाजल, कच्चा दूध, दही, देसी घी, शहद और शर्करा (पंचामृत) से उनका विधिवत महाभिषेक करें। अभिषेक के समय शंख में गंगाजल भरकर अर्पित करना अत्यंत फलदायी होता है। इसके बाद शुद्ध जल से स्नान कराकर पीले वस्त्र, मुकुट, बांसुरी, मोरपंख और वैजयंती माला पहनाएं। कान्हा को चंदन और अक्षत का तिलक लगाएं और तुलसी दल अवश्य अर्पित करें, क्योंकि बिना तुलसी दल के भगवान भोग स्वीकार नहीं करते। अंत में माखन, मिश्री, धनिया की पंजीरी, खीरा और मौसमी फलों का भोग लगाकर कपूर से मंगल आरती करें और प्रसाद का वितरण करें। श्रद्धा और निष्ठा से की गई यह पूजा घर-परिवार में सुख, समृद्धि और आरोग्य की वर्षा करती है।
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