
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात जब घड़ी की दोनों सुइयां 12 पर मिलती हैं, तब संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल एक ही गूंज सुनाई देती है—”नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की।” रोहिणी नक्षत्र और वृषभ लग्न के पावन संयोग में भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ था। मथुरा की कारागार से लेकर गोकुल, वृंदावन, द्वारका और देश-विदेश के हर सनातनी घर में यह पर्व किसी उत्सव से कम नहीं होता। वर्तमान समय में अधिकांश घरों में लड्डू गोपाल विराजित हैं, इसलिए जन्माष्टमी पर केवल सामान्य पूजा नहीं होती, बल्कि एक नवजात शिशु के जन्म की तरह कान्हा का स्वागत किया जाता है। यदि आप भी इस पावन अवसर पर अपने घर के पूजा स्थल पर प्रभु के जन्मोत्सव को शास्त्रोक्त मर्यादा और पूर्ण विधि-विधान से संपन्न करना चाहते हैं, तो यह संपूर्ण पूजा संहिता आपके लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगी।
जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का शुभ मुहूर्त और ज्योतिषीय महत्व
शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को निशिता काल यानी मध्यरात्रि में हुआ था। निशिता काल वह समय होता है जब रात्रि का आठवां मुहूर्त व्याप्त होता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार जब अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का मिलन होता है, तो उसे ‘जयंती योग’ कहा जाता है, जिसमें की गई साधना और पूजन कोटि गुना फल प्रदान करता है।
गृहस्थ साधकों के लिए मध्यरात्रि 12:00 बजे से 12:45 बजे तक का समय कान्हा के प्राकट्य और अभिषेक के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस पावन बेला में ब्रह्मांड में सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा अपने चरम पर होती है। घर के मंदिर को इस दिन फूलों, वंदनवार, रंगोली और छोटे-छोटे खिलौनों से सजाया जाता है ताकि गोकुल जैसा वातावरण निर्मित हो सके।
कान्हा के जन्मोत्सव के लिए आवश्यक संपूर्ण पूजन सामग्री
जन्माष्टमी की पूजा शुरू करने से पहले समस्त आवश्यक सामग्री को एकत्रित कर लेना चाहिए ताकि मध्यरात्रि में पूजा में किसी प्रकार का व्यवधान न आए।
-
अभिषेक सामग्री: तांबे या चांदी की परात, दक्षिणावर्ती शंख, गाय का कच्चा दूध, ताजा दही, देसी घी, शुद्ध शहद, गंगाजल और बूरा या पिसी मिश्री (पंचामृत हेतु)।
-
श्रृंगार सामग्री: लड्डू गोपाल के लिए नई पीली या लाल रंग की पोशाक, मोरपंख मुकुट, बांसुरी, कुंडल, कमरबंद, बाजूबंद, पायल, अष्टगंध चंदन, इत्र (गुलाब या चंदन का शुद्ध अर्क) और नया रुई का मुलायम वस्त्र।
-
जन्मोत्सव विशेष सामग्री: एक बड़ा ताजा डंठल (पत्ती) वाला हरा खीरा, नया सिक्का या चांदी का चम्मच (नाल छेदन के लिए)।
-
भोग और नैवेद्य: ताजा माखन, मिश्री, धनिया की पंजीरी, पंचमेवा, ऋतु फल, चरणामृत और तुलसी दल। ध्यान रहे कि कान्हा का कोई भी भोग तुलसी दल के बिना अधूरा माना जाता है।
-
पूजन दीप व धूप: शुद्ध घी का दीपक, धूपबत्ती, कपूर, रोली, अक्षत, सुपारी, पान के पत्ते और पीले गेंदे के फूल।
घर पर बाल गोपाल का जन्म कैसे कराएं? खीरा नाल छेदन की प्रामाणिक विधि
जन्माष्टमी की रात सबसे महत्वपूर्ण और भावुक कर देने वाली रस्म होती है खीरे से कान्हा का जन्म कराना। इसे धार्मिक शब्दावली में ‘नाल छेदन’ कहा जाता है।
शास्त्रों में खीरे को माता देवकी के गर्भ का प्रतीक माना गया है और उसमें विराजमान लड्डू गोपाल गर्भस्थ शिशु का स्वरूप होते हैं। शाम के समय पूजा की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। एक ताजा हरा खीरा लें जिसके ऊपरी हिस्से में डंठल जुड़ी हो। चाकू की सहायता से खीरे के ऊपरी हिस्से को डंठल सहित इस प्रकार काटें कि वह ढक्कन की तरह अलग हो जाए और अंदर थोड़ा सा स्थान बन सके।
रात 11:30 बजे से पहले लड्डू गोपाल की प्रतिमा को इस खीरे के भीतर सांकेतिक रूप से विराजमान कर दें और कटे हुए हिस्से को वापस लगाकर खीरे को किसी स्वच्छ वस्त्र से ढंक दें। जैसे ही मध्यरात्रि के 12 बजें, घर के सभी सदस्य एकत्रित होकर शंख, घंटी और मंजीरा बजाना शुरू करें। इसके बाद परिवार के मुखिया या मुख्य साधक चांदी के सिक्के अथवा चम्मच से खीरे की डंठल को काटकर अलग करें। यह प्रक्रिया नाल छेदन कहलाती है, जो यह दर्शाती है कि शिशु अपने मातृ-गर्भ से मुक्त होकर संसार में प्रकट हो चुका है। इसके तुरंत बाद “गोविंद बोलो हरि गोपाल बोलो” के जयकारों के साथ लड्डू गोपाल को खीरे से बाहर निकालकर एक थाल में स्थापित किया जाता है।
पंचामृत महाभिषेक और दिव्य श्रृंगार की षोडशोपचार प्रक्रिया
जन्म के उपरांत बाल रूप भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक अत्यंत प्रेम और सावधानी से किया जाता है।
सर्वप्रथम दक्षिणावर्ती शंख में गंगाजल भरकर लड्डू गोपाल को स्नान कराएं। इसके पश्चात दूध, दही, घी, शहद और शर्करा से बने पंचामृत से प्रभु का अभिषेक करें। पंचामृत डालते समय ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ अथवा ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे’ महामंत्र का निरंतर जाप करते रहें।
पंचामृत स्नान के बाद प्रभु को इत्र मिले शुद्ध सुहाने जल से दोबारा स्नान कराएं। फिर एक अत्यंत कोमल सूती वस्त्र से प्रभु के श्रीअंग को पोंछें। अब कान्हा को सुंदर जरीदार पीतांबर (वस्त्र) धारण कराएं। उनके मस्तक पर चंदन, रोली और अष्टगंध का त्रिपुंड या तिलक लगाएं। उनके सिर पर मोरपंख लगा मुकुट सजाएं, कानों में कुंडल, हाथों में प्रिय बांसुरी और गले में मोतियों की माला पहनाएं। कान्हा की आंखों में हल्का सा काजल का टीका लगाएं ताकि उन्हें किसी की नजर न लगे। श्रृंगार पूर्ण होने के बाद उन्हें एक छोटे से दर्पण में उनका स्वरूप दिखाएं।
कान्हा के प्रिय भोग, महाआरती और व्रत पारण के नियम
श्रृंगार के पश्चात लड्डू गोपाल को एक सजे-धजे सुंदर झूले में विराजमान कराया जाता है। इसके बाद उन्हें षोडशोपचार नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
भोग में सबसे पहले घर का निकला हुआ ताजा सफेद माखन और मिश्री का कटोरा रखें। इसके साथ ही भुने हुए धनिए, बूरा, काजू, बादाम और मखाने से तैयार विशेष ‘धनिया पंजीरी’ अर्पित करें। कान्हा को दूध से बनी खीर, फल और मिष्ठान्न भी अर्पित किए जाते हैं। प्रत्येक भोग सामग्री के ऊपर तुलसी का एक पत्ता अवश्य रखें, क्योंकि पद्म पुराण के अनुसार भगवान विष्णु तुलसी दल के बिना कोई भी भोग स्वीकार नहीं करते।
भोग अर्पण के पश्चात कपूर और गाय के घी का पंचमुखी दीपक प्रज्वलित करके ‘आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की’ श्रद्धापूर्वक गाएं। आरती के बाद परिवार के सभी सदस्य श्रद्धापूर्वक झूला झुलाएं और अपनी मनोकामनाएं प्रभु के चरणों में समर्पित करें।
जन्माष्टमी के व्रत का पारण भी शास्त्रसम्मत होना चाहिए। सामान्यतः रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के समाप्त होने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। जो साधक रात में पारण करते हैं, वे मध्यरात्रि की पूजा और आरती के पश्चात भगवान के चरणामृत, पंजीरी और फलाहार से अपना व्रत खोलते हैं। वहीं जो साधक सूर्योदय के बाद पारण करते हैं, वे अगले दिन प्रातः नवमी तिथि में स्नान-ध्यान कर अन्न ग्रहण करते हैं।
मथुरा-वृंदावन से लेकर घर-घर तक: भौगोलिक परंपरा और आध्यात्मिक रहस्य
उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान और वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी का दृश्य अलौकिक होता है। यहां रात्रि 12 बजे सहस्रधारा से कान्हा का अभिषेक होता है। गुजरात के द्वारकाधीश मंदिर में प्रभु को सोने के आभूषणों से सजाया जाता है, जबकि महाराष्ट्र में अगले दिन दही-हांडी की भव्य प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।
भौगोलिक विविधता के बावजूद इस पर्व का मूल तत्व एक ही है—अधर्म पर धर्म की विजय और निष्काम प्रेम की स्थापना। कारागार की बेड़ियां स्वयं कट जाना और यमुना का मार्ग देना इस बात का प्रमाण है कि जब हृदय में ईश्वर का प्राकट्य होता है, तो जीवन की समस्त सांसारिक बाधाएं और नकारात्मकताएं अपने आप समाप्त हो जाती हैं। अपने घर में इस विधि से जन्मोत्सव मनाकर साधक न केवल आध्यात्मिक शांति प्राप्त करता है, बल्कि घर में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का स्थायी वास होता है।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया