मथुरा श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर आज रात 12 बजे होगा पालनहार का महा-जन्माभिषेक, अलौकिक पंचरत्नी पोशाक में दर्शन देंगे बालमुकुंद

तीर्थनगरी मथुरा इस समय पूरी तरह से वैकुंठ धाम के रूप में परिवर्तित नजर आ रही है। चारों ओर गूंजते वेद मंत्र, घंटों और घड़ियालों की मंगल ध्वनि, और ‘हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की’ के गगनभेदी जयकारों के बीच श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर आज भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर पालनहार के प्राकट्य का महोत्सव अपने चरम पर पहुंच गया है। भगवान श्रीकृष्ण के 5250 से अधिक वर्ष पुराने इस ऐतिहासिक और पावन प्राकट्य स्थल पर आज रात्रि ठीक 12 बजे वह अलौकिक क्षण आएगा, जब कारागार रूपी गर्भगृह में साक्षात परमात्मा बाल रूप में अवतरित होंगे। इस महामहोत्सव के साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने और सात समंदर पार से लाखों श्रद्धालु ब्रजभूमि में डेरा डाले हुए हैं। संपूर्ण मंदिर परिसर को रंग-बिरंगी रोशनी, देशी-विदेशी सुगंधित फूलों और दिव्य झांकियों से इस तरह सजाया गया है मानो स्वयं देवलोक मथुरा की धरा पर उतर आया हो।

इस वर्ष जन्माष्टमी पर बालमुकुंद का रूप-रंग और शृंगार अत्यंत अद्भुत, दिव्य और नयनाभिराम होने जा रहा है। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के अनुसार, आज जन्मोत्सव की मुख्य वेला में ठाकुर जी को विशेष रूप से हस्तनिर्मित ‘पंचरत्नी पोशाक’ धारण कराई जा रही है। रेशम, मखमली कपड़े और सोने-चांदी के तारों की महीन जरदोजी कारीगरी से तैयार इस पोशाक में हीरा, पन्ना, माणिक्य, पुखराज और नीलम की आभा बिखेरते पंचरत्नों के सूक्ष्म तत्वों को गूंथा गया है। ब्रज के परंपरागत सिद्ध कारीगरों द्वारा महीनों की साधना और पूर्ण सात्विकता के साथ तैयार की गई यह पोशाक कान्हा के श्रीअंग पर सजते ही उनके सम्मोहक रूप को अद्वितीय कांति प्रदान करेगी। ठाकुर जी के मस्तक पर मोरमुकुट, हाथों में सोने की मुरली, गले में वैजयंती माला और माथे पर कस्तूरी-चंदन का त्रिपुंड सुशोभित किया जाएगा। भगवान के इस रूप का प्रथम दर्शन करते ही श्रद्धालु भावविभोर होकर नतमस्तक हो उठेंगे।

श्रीकृष्ण जन्मस्थान के भागवत भवन में रात्रि 11 बजे से ही जन्माभिषेक के विशेष धार्मिक अनुष्ठान प्रारंभ हो जाएंगे। वैदिक ब्राह्मणों और आचार्यों द्वारा श्रीगणेश पूजन, नवग्रह पूजन और स्वस्तिवाचन के साथ वातावरण को पूर्णतः आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया जाएगा। जैसे ही घड़ी की दोनों सुइयां मध्यरात्रि के 12 पर एक साथ मिलेंगी, शंखों की गूंज, नगाड़ों की थाप और मृदंग की थाप के साथ गर्भगृह के कपाट खुलेंगे और पूरा परिसर ‘नंद के आनंद भयो’ के उद्घोष से झूम उठेगा। इसके तुरंत बाद ठाकुर जी का महाभिषेक अनुष्ठान प्रारंभ होगा। इस वर्ष भी अभिषेक के लिए विशेष रूप से निर्मित रजत (चांदी) की कामधेनु गाय के स्तनों से निरंतर बहने वाली पय-धारा (दूध की धारा) से भगवान का अभिषेक किया जाएगा। इसके अतिरिक्त गाय के शुद्ध घी, देशी खांड, शहद, दही, गंगाजल, यमुना जल और देश की प्रमुख पवित्र नदियों के जल के साथ-साथ अनेक दुर्लभ औषधियों और सुगंधित द्रव्यों के मिश्रण से तैयार पंचामृत से भगवान के बाल विग्रह का अभिषेक संपन्न होगा।

मथुरा प्रशासन और पुलिस विभाग ने इस ऐतिहासिक आयोजन की सुरक्षा और सुगमता के लिए अभेद्य प्रबंध किए हैं। श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर और संपूर्ण मथुरा शहर को कई सुरक्षा जोन और सेक्टरों में विभाजित किया गया है। मंदिर की परिधि में ड्रोन कैमरों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस युक्त हाई-डेफिनिशन सीसीटीवी नेटवर्क और कमांडो दस्ते की चौबीसों घंटे निगरानी बनी हुई है। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए जन्मस्थान की ओर जाने वाले प्रमुख मार्गों पर बैरिकेडिंग और रूट डायवर्जन लागू किया गया है। मथुरा के रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और प्रमुख चौराहों पर ब्रजवासियों द्वारा जगह-जगह निःशुल्क भंडारे, शीतल जल और विश्राम की व्यवस्था की गई है। नगर के हर गली-मोहल्ले में भगवान का स्वागत करने के लिए रंगोली बनाई गई है और घरों के द्वारों पर बंदनवार सजाए गए हैं। गोकुल, महावन, नंदगांव, बरसाना और वृंदावन सहित समूचा ब्रज क्षेत्र आज अपने लाडले कान्हा के जन्म की खुशियों में एक साथ थिरक रहा है।

महाभिषेक की प्रक्रिया लगभग एक घंटे तक चलेगी, जिसके पश्चात ठाकुर जी को नवीन पंचरत्नी पोशाक पहनाकर उनका पूर्ण राजभोग शृंगार किया जाएगा। रात्रि लगभग 12:45 बजे भगवान को माखन, मिश्री, धनिया की पंजीरी, कमल गट्टे, पंचमेवा, मालपुआ और ऋतुफलों का महाभोग अर्पित किया जाएगा। भोग अर्पण के बाद मुख्य धर्माचार्यों द्वारा कपूर और 108 बत्तियों वाली भव्य स्वर्ण आरती उतारी जाएगी। इस महाआरती के दर्शन के लिए मंदिर प्रांगण में उपस्थित हर श्रद्धालु की आंखें उस ज्योति पर टिकी होंगी। आरती संपन्न होते ही गर्भगृह से वितरित होने वाले चरणामृत और प्रसादी को ग्रहण करने के लिए भक्तों में अनुपम उल्लास देखने को मिलेगा। धार्मिक मान्यता है कि जन्माष्टमी की रात जन्मभूमि पर किया जाने वाला अभिषेक दर्शन और चरणामृत पान मनुष्य के समस्त संतापों को हर लेता है और जीवन में भक्ति, शांति तथा संपन्नता का मार्ग प्रशस्त करता है।

श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर आयोजित होने वाला यह पर्व केवल एक परंपरा का निर्वहन नहीं, बल्कि समूची मानवता के लिए प्रेम, त्याग और अधर्म पर धर्म के शाश्वत विजय का जीवंत उद्घोष है। आज की यह पावन रात हर भक्त के हृदय में बसी आस्था को एक नया आलोक दे रही है, जहां अमीर-गरीब, देशी-विदेशी का भेद मिटकर केवल एक ही पहचान शेष रह जाती है—कान्हा का अनन्य सेवक।

Check Also

भाद्रपद पिठोरी अमावस्या 2026: 10 या 11 सितंबर कब करें तर्पण और स्नान-दान? दूर करें असमंजस

सनातन धर्म की पावन परंपरा में प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि का आध्यात्मिक दृष्टिकोण से …