गुंडा एक्ट का इस्तेमाल दमन के हथियार के तौर पर कर रहे हैं नौकरशाह: इलाहाबाद हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी

उत्तर प्रदेश में ‘यूपी कंट्रोल ऑफ गुंडाज एक्ट, 1970’ (UP Goondas Act) के अंधाधुंध और मनमाने इस्तेमाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि राज्य की नौकरशाही (Bureaucracy) और प्रशासन गुंडा एक्ट का इस्तेमाल इसके मूल उद्देश्य के विपरीत आम नागरिकों और बेगुनाहों के खिलाफ ‘दमन के हथियार’ (Tool of Oppression) के रूप में कर रहे हैं। जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने गाजियाबाद के एक मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्यवाही को रद्द करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने पीड़ित को ₹50,000 का हर्जाना देने का आदेश दिया और स्पष्ट किया कि राज्य सरकार चाहे तो यह राशि अवैध आदेश पारित करने वाले लापरवाह अधिकारियों के वेतन से वसूल सकती है।

अदालत के बार-बार आदेश के बावजूद मनमानी कर रहे हैं अफसर: हाईकोर्ट

जस्टिस संदीप जैन की पीठ ने गाजियाबाद निवासी अभिषेक त्यागी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया:

  • फैसलों की अनदेखी: कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि हाईकोर्ट बार-बार स्पष्ट कर चुका है कि महज एक या दो आपराधिक मुकदमों के आधार पर किसी भी नागरिक को ‘गुंडा’ घोषित नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद नौकरशाह जानबूझकर अदालती दिशानिर्देशों को नजरअंदाज कर रहे हैं और मनमाने व गैर-कानूनी आदेश पारित कर रहे हैं।

  • अदालतों पर बोझ और जनता का उत्पीड़न: बेंच ने टिप्पणी की कि अधिकारियों की इस हठधर्मिता के कारण अदालतों में मुकदमों का अंबार लग रहा है और निर्दोष लोगों को मानसिक व सामाजिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है।

  • कड़े संदेश का वक्त: अदालत ने कहा कि अब तक वह ऐसे अधिकारियों पर व्यक्तिगत हर्जाना लगाने से बचती रही है, लेकिन अब समय आ गया है कि नौकरशाही को कड़ा संदेश दिया जाए कि वे ऐसी मनमानी बंद करें, वरना अपनी जेब से दंडात्मक हर्जाना (Punitive Damages) भुगतने के लिए तैयार रहें।

क्या था पूरा मामला?

गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट के एडिशनल कमिश्नर ऑफ पुलिस ने अभिषेक त्यागी के खिलाफ दर्ज केवल दो मुकदमों के आधार पर उसे ‘गुंडा’ घोषित कर दिया था, जिसे मेरठ मंडल के कमिश्नर ने भी अपील में बरकरार रखा था।

  • 3 साल का अंतर: हाईकोर्ट ने पाया कि जिन दो मुकदमों का हवाला दिया गया, उनके बीच तीन साल का लंबा फासला था।

  • ‘आदतन अपराधी’ की श्रेणी में नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत किसी को गुंडा तब माना जाता है जब वह अपराध करने का ‘आदतन’ (Habitual Offender) हो। छिटपुट या वर्षों के अंतराल पर दर्ज मामलों को आदतन अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

  • कार्रवाई रद्द और ₹50,000 हर्जाना: कोर्ट ने दोनों प्रशासनिक आदेशों को रद्द करते हुए पीड़ित को हुई मानसिक पीड़ा और सामाजिक प्रतिष्ठा को पहुंचे नुकसान के एवज में ₹50,000 का मुआवजा एक माह के भीतर देने का निर्देश दिया।

कुछ ही दिनों पहले गोंडा के मामले में भी लगी थी फटकार

उल्लेखनीय है कि इसी हफ्ते इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने भी गोंडा के एक मामले (ज़ाहिद अली बनाम उत्तर प्रदेश सरकार) की सुनवाई के दौरान ऐसी ही कड़ी टिप्पणी की थी।

  • उस मामले में गोंडा के डीएम ने एक ऐसे मुकदमे के आधार पर व्यक्ति को गुंडा घोषित कर छह महीने के लिए जिलाबदर कर दिया था, जिसमें वह अदालत से पहले ही बाइज्जत बरी हो चुका था।

  • उस समय भी हाईकोर्ट ने गोंडा डीएम और कमिश्नर के आदेशों को खारिज करते हुए कहा था कि राज्य सरकार गुंडा एक्ट को उत्पीड़न और दमन की नीति की तरह इस्तेमाल करने पर अड़ी हुई दिखती है, जिसे कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट के इस सख्त आदेश के बाद उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक और पुलिस महकमे में हलचल मच गई है, क्योंकि अब मनमाने ढंग से गुंडा एक्ट लगाने वाले जिलाधिकारियों और पुलिस अफसरों पर सीधे तौर पर व्यक्तिगत जवाबदेही और वित्तीय पेनल्टी का खतरा मंडराने लगा है।

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