सहायक अध्यापक की बर्खास्तगी का आदेश रद्द: फर्जी प्रमाण पत्र और पुरानी नियुक्ति का पेच हाईकोर्ट ने सुलझाया

उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों की बर्खास्तगी, फर्जी दस्तावेजों और पिछली नियुक्तियों से जुड़े एक बेहद जटिल कानूनी विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने संतकबीर नगर जिले के एक उच्च प्राथमिक विद्यालय में गणित के सहायक अध्यापक के पद पर कार्यरत शिक्षक की सेवा समाप्ति के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने विधि व्यवस्था तय करते हुए साफ किया कि पिछली किसी नियुक्ति का फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर रद्द होना अपने आप में सेवा से औपचारिक ‘बर्खास्तगी’ नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने दो टूक टिप्पणी की कि यदि किसी शिक्षक की वर्तमान नियुक्ति बिल्कुल वैध और असली शैक्षिक दस्तावेजों के आधार पर हुई है, तो केवल पिछली नियुक्ति के रद्द होने की बात न बताने के आधार पर उसे सेवा से बाहर नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की पीठ का अहम फैसला, 2019 का आदेश निरस्त

यह ऐतिहासिक निर्णय इलाहाबाद हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने संतकबीर नगर के शिक्षक अनिल कुमार द्वारा दाखिल रिट याचिका पर विस्तृत सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता अनिल कुमार को बेसिक शिक्षा परिषद की चयन प्रक्रिया के तहत वर्ष 2015 में गणित विषय के सहायक अध्यापक पद पर नियुक्त किया गया था। चयन के समय उनके सभी अनिवार्य शैक्षिक दस्तावेजों की प्रारंभिक जांच और सत्यापन के उपरांत उन्होंने 24 सितंबर 2015 को विधिवत पदभार संभाला था। सेवाकाल का एक वर्ष संतोषजनक रूप से पूरा होने के बाद विभाग द्वारा उनकी सेवाएं स्थायी (कन्फर्म) भी कर दी गई थीं।

हालांकि, सेवा के लगभग तीन वर्ष बीत जाने के बाद वर्ष 2018 में विभाग को उनके खिलाफ एक गोपनीय शिकायत प्राप्त हुई, जिसमें आरोप लगाया गया था कि शिक्षक ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे नियुक्ति हासिल की है। शिकायत के आधार पर जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) ने मई 2018 में पहले शिक्षक का वेतन रोक दिया और बाद में विभागीय सत्यापन की अंतिम रिपोर्ट आए बिना ही 20 अप्रैल 2019 को उनकी सेवाएं समाप्त करते हुए बर्खास्तगी का आदेश थमा दिया था।

2004 की पुरानी नियुक्ति और 2015 की नई भर्ती का कानूनी पेच

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के समक्ष पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया गया कि वर्ष 2004 में अभ्यर्थी की एक अन्य भर्ती प्रक्रिया के तहत अलग नियुक्ति हुई थी। उस पुरानी नियुक्ति के दौरान जमा किया गया बीएड (B.Ed) का प्रमाण पत्र जांच में फर्जी पाए जाने के बाद वर्ष 2010 में उस पुरानी नियुक्ति को विभाग ने निरस्त कर दिया था।

इसके बाद अभ्यर्थी ने दोबारा नए सिरे से योग्यता हासिल की और वर्ष 2015 में आयोजित एक बिल्कुल नई और स्वतंत्र भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा लिया। वर्ष 2015 की इस नई नियुक्ति में लगाए गए हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और बीएससी (B.Sc) के मूल प्रमाण पत्र विभागीय जांच में पूरी तरह सही और वैध पाए गए थे। हालांकि, वर्ष 2011-12 के नए बीएड अंकपत्र के सत्यापन की रिपोर्ट उस वक्त लंबित थी, लेकिन बीएसए ने पुरानी नियुक्ति के रद्द होने को आधार बनाकर उन्हें नौकरी से बाहर कर दिया।

शिक्षा विभाग का तर्क: ‘तथ्य छिपाकर हासिल की नौकरी’, कोर्ट ने नकारा

राज्य सरकार और बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि याची ने अपनी पिछली नियुक्ति रद्द होने और उस पर लगे आरोपों के तथ्यों को विभाग से जानबूझकर छिपाया। विभाग ने तर्क दिया कि ‘उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अध्यापक सेवा नियमावली 1981’ के नियम 11 के तहत ऐसा व्यक्ति शिक्षक पद के लिए अयोग्य माना जाता है जिसे राज्य सरकार ने सेवा से बर्खास्त या पदच्युत किया हो।

हाईकोर्ट ने सरकार के इस तर्क का कानूनी विश्लेषण करते हुए उसे पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सेवा नियमावली के नियम 11 के तहत अयोग्यता केवल उसी स्थिति में लागू होती है, जब किसी कर्मचारी को औपचारिक विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई (डिसिप्लिनरी प्रोसीडिंग्स) के तहत सेवा से विधिवत बर्खास्त (Dismissed) किया गया हो। कोर्ट ने रेखांकित किया कि किसी पुरानी नियुक्ति का रद्द (Cancellation) होना शुरुआत से शून्य (Void ab initio) माना जा सकता है, लेकिन कानूनी रूप से उसे सेवा से ‘बर्खास्तगी’ के बराबर नहीं माना जा सकता।

‘जब फॉर्म में कॉलम ही नहीं था, तो तथ्य छिपाने का आरोप कैसा?’

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा ‘अवतार सिंह बनाम भारत संघ’ मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि किसी अभ्यर्थी पर ‘तथ्य छिपाने’ (Suppression of Material Facts) का आरोप केवल तभी लगाया जा सकता है, जब संबंधित भर्ती विज्ञापन, आवेदन पत्र, सत्यापन फॉर्म या नियमों में उस विशिष्ट तथ्य की जानकारी देना अनिवार्य किया गया हो।

अदालत ने पाया कि 2015 की भर्ती के आवेदन पत्र या घोषणा पत्र में ऐसा कोई कॉलम मौजूद ही नहीं था, जिसमें अभ्यर्थी से यह पूछा गया हो कि क्या उसकी कोई पूर्व नियुक्ति कभी निरस्त हुई है। इसके अतिरिक्त, फर्जी प्रमाण पत्र पाए जाने मात्र से स्वतः यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अभ्यर्थी को उसके फर्जी होने की पूर्व जानकारी थी। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वर्तमान नियुक्ति में पिछली निरस्त नियुक्ति या उसके दस्तावेज की कोई भूमिका नहीं थी। वर्तमान नियुक्ति पूरी तरह स्वतंत्र और वैध प्रमाण पत्रों के आधार पर हुई थी, इसलिए पूर्व की घटना और वर्तमान पद के बीच कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं होता।

‘कार्रवाई के नाम की जगह उसकी वास्तविक प्रकृति को देखना जरूरी’

न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने विभाग की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि विभाग किसी कर्मचारी पर जानबूझकर तथ्य छिपाने को कदाचार मान रहा था, तो प्राधिकारी को नियमित विभागीय जांच (Departmental Inquiry) करानी चाहिए थी। किसी नियुक्ति को सीधे रद्द करने की आड़ में विभाग जांच की निर्धारित प्रक्रिया से बच नहीं सकता।

अदालत ने कहा कि आदेश के केवल शीर्षक या नाम को देखने के बजाय उसकी वास्तविक कानूनी प्रकृति को देखा जाना अनिवार्य है। इन सभी विधिक आधारों को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने अनिल कुमार की याचिका को स्वीकार कर लिया और 20 अप्रैल 2019 के सेवा समाप्ति आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि याची को सभी परिणामी सेवा लाभों के साथ बहाल माना जाए, जो उसके वर्तमान शैक्षिक दस्तावेजों के अंतिम सत्यापन के अधीन रहेगा।

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