
पूरब के ऑक्सफोर्ड के नाम से विख्यात इलाहाबाद विश्वविद्यालय (University of Allahabad) के 139 साल लंबे इतिहास में एक नया प्रशासनिक और शैक्षणिक अध्याय जुड़ गया है। विश्वविद्यालय की वर्तमान कुलपति प्रोफेसर संगीता श्रीवास्तव को 5 साल के एक और पूर्ण कार्यकाल के लिए फिर से कुलपति (Vice-Chancellor) नियुक्त कर दिया गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की विजिटर और देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की औपचारिक स्वीकृति के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने इस संबंध में आधिकारिक आदेश जारी कर दिया है।
यह पुनर्नियुक्ति कई मायनों में ऐतिहासिक और अभूतपूर्व मानी जा रही है। 1887 में स्थापित हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूरे इतिहास में और विशेष रूप से 2005 में इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने के बाद यह पहला मौका है जब किसी नियमित कुलपति को लगातार दूसरा 5 साल का पूर्ण कार्यकाल सौंपा गया है। यह फैसला ऐसे समय में आया जब विश्वविद्यालय अपना 139वां स्थापना दिवस मना रहा था।
राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद शिक्षा मंत्रालय ने जारी किया आदेश
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग के अवर सचिव राजेश कुमार के हस्ताक्षर से जारी अधिसूचना के अनुसार, प्रो. संगीता श्रीवास्तव का यह दूसरा कार्यकाल 16 सितंबर 2026 से प्रभावी माना जाएगा। यह नियुक्ति अगले 5 वर्षों के लिए अथवा उनके 70 वर्ष की आयु पूरी होने तक, जो भी पहले हो, प्रभावी रहेगी।
प्रो. संगीता श्रीवास्तव ने पहली बार 30 नवंबर 2020 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नियमित कुलपति के रूप में कार्यभार संभाला था। उस समय वह इस प्रतिष्ठित संस्थान की कमान संभालने वाली पहली महिला कुलपति बनी थीं। उनका पहला 5 वर्षीय नियमित कार्यकाल 29 नवंबर 2025 को समाप्त हो रहा था, लेकिन नए उत्तराधिकारी की चयन प्रक्रिया पूरी न होने के कारण मंत्रालय ने उनके कार्यकाल को अंतरिम विस्तार दिया था। अब सरकार ने नए सिरे से उन्हें पूरे 5 साल का नया कार्यकाल सौंपने पर मुहर लगा दी है।
कौन हैं प्रो. संगीता श्रीवास्तव? छात्रा से कुलपति तक का सफर
प्रोफेसर संगीता श्रीवास्तव का इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बेहद गहरा और पुराना नाता रहा है। 22 सितंबर 1964 को जन्मीं प्रो. श्रीवास्तव इसी विश्वविद्यालय की पूर्व मेधावी छात्रा (Alumna) रही हैं। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा यहीं से पूरी की और 1989 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गृह विज्ञान विभाग (Home Science Department) में बतौर व्याख्याता (Lecturer) अपनी अकादमिक सेवा की शुरुआत की।
वह लंबे समय तक गृह विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष रहीं और उनके प्रयासों से ही इस विभाग को एक स्वतंत्र और आधुनिक रूप मिला। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कुलपति बनने से पहले वह प्रयागराज स्थित प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भय्या) राज्य विश्वविद्यालय की भी कुलपति रह चुकी हैं, जहां उनके प्रशासनिक सुधारों की काफी चर्चा रही थी। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के 2005 में केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने के बाद वह अपने ही संकाय (In-house Faculty) से कुलपति की कुर्सी तक पहुंचने वाली पहली प्रोफेसर भी हैं।
पहले कार्यकाल में NAAC A+ ग्रेड और ऐतिहासिक भर्तियां
प्रो. संगीता श्रीवास्तव के पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल को विश्वविद्यालय के बुनियादी ढांचे और अकादमिक स्तर पर बड़े बदलावों के लिए जाना जाता है। उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) से पहली बार प्रतिष्ठित ‘A+’ ग्रेड हासिल कर अपनी खोई हुई साख वापस पाई।
इसके अतिरिक्त, दशकों से लटकी पड़ी शिक्षक और गैर-शैक्षणिक पदों की भर्तियों को उन्होंने प्राथमिकता दी। पहले कार्यकाल में लगभग 400 नए शिक्षकों और 636 गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की पारदर्शी नियुक्तियां की गईं, जबकि करियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) के तहत 280 से अधिक शिक्षकों और करीब 1,000 कर्मचारियों को पदोन्नति का लाभ मिला। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम लागू किए, हिंदू हॉस्टल और विज्ञान परिषद जैसी करीब 200 करोड़ की संपत्तियों को वापस विश्वविद्यालय के अधीन लाया और खेल व शोध सुविधाओं का कायाकल्प किया।
चर्चा, विवाद और दूसरे कार्यकाल के सामने चुनौतियां
प्रो. संगीता श्रीवास्तव का पहला कार्यकाल जहां उपलब्धियों से भरा रहा, वहीं वह कई बार बड़े विवादों और छात्र आंदोलनों के केंद्र में भी रहीं। विश्वविद्यालय में लगभग 400 प्रतिशत फीस वृद्धि के फैसले को लेकर छात्रों ने महीनों तक ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शन किया था। इसके अलावा, सुबह की अजान के लाउडस्पीकर की आवाज से नींद में खलल पड़ने को लेकर उनके द्वारा प्रयागराज प्रशासन को लिखी गई चिट्ठी ने राष्ट्रीय स्तर पर भारी सियासी और सामाजिक बहस छेड़ दी थी।
अकादमिक जगत में उनके दूसरे कार्यकाल को लेकर दो तरह के विचार सामने आ रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि नीतिगत निरंतरता से विश्वविद्यालय के विकास कार्यों को रफ्तार मिलेगी, जबकि कुछ आलोचकों का कहना है कि इतने लंबे 10 साल के कार्यकाल से नए विचारों की संभावना सीमित हो सकती है। अपनी पुनर्नियुक्ति पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रो. श्रीवास्तव ने इसे स्थापना दिवस का सुखद उपहार बताया और कहा कि NAAC A+ सिर्फ एक शुरुआत थी, उनका लक्ष्य विश्वविद्यालय को वैश्विक ज्ञान का शीर्ष केंद्र बनाना है।
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