इंजीनियरिंग और मेडिकल की पढ़ाई बनी ‘डिप्रेशन’ की जड़, अब शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव की मांग..

नई दिल्ली। देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों से आ रही आत्महत्या की खबरों ने एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्तमान दौर में डॉक्टर और इंजीनियर बनने का सपना देख रहे युवाओं के लिए पढ़ाई का बोझ अब जानलेवा साबित हो रहा है। विशेषज्ञों और आंकड़ों की मानें तो इन पाठ्यक्रमों की कठिन डगर और करियर की अंधी दौड़ ने छात्रों को मानसिक रूप से खोखला कर दिया है, जिसके चलते डिप्रेशन के मामले रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं।

करियर की रेस और पढ़ाई का बढ़ता दबाव

इंजीनियरिंग और चिकित्सा क्षेत्र में प्रवेश पाना जितना कठिन है, उससे कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण इसकी पढ़ाई को पूरा करना होता जा रहा है। वर्तमान शैक्षणिक माहौल में छात्रों पर न केवल पाठ्यक्रम का भारी बोझ है, बल्कि भविष्य में एक सफल करियर सुनिश्चित करने का मानसिक दबाव भी है। यही कारण है कि मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों के हॉस्टलों से आए दिन डिप्रेशन और तनाव की शिकायतें सामने आ रही हैं। पढ़ाई के इस बोझ को हल्का करने के बजाय संस्थान केवल परिणामों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जिससे छात्र खुद को अकेला और मजबूर महसूस करने लगते हैं।

संस्थानों में बढ़ती आत्महत्या की घटनाएं चिंताजनक

बीते कुछ समय में आईआईटी (IIT) और मेडिकल कॉलेजों से छात्रों द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटनाओं में तेजी से इजाफा हुआ है। यह रुझान इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हमारी उच्च शिक्षा प्रणाली कहीं न कहीं छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को समझने में विफल रही है। छोटी सी उम्र में बड़े लक्ष्यों का भार और असफल होने का डर छात्रों को उस दहलीज पर ले जा रहा है जहां से वे जिंदगी को खत्म करना ही एकमात्र रास्ता समझने लगते हैं। शैक्षणिक संस्थानों में काउंसलिंग और मेंटल हेल्थ सपोर्ट की कमी इस संकट को और गहरा बना रही है।

शिक्षा प्रणाली को ‘आसान’ बनाने की जरूरत

अब समय आ गया है कि शिक्षा और करियर से जुड़ी नीतियों पर पुनर्विचार किया जाए। जानकारों का कहना है कि जब तक शिक्षा को ‘बोझ’ के बजाय ‘सीखने की प्रक्रिया’ के रूप में विकसित नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसे दुखद हादसों को रोकना मुश्किल होगा। पढ़ाई के तरीकों को अधिक व्यावहारिक और तनावमुक्त बनाने की सख्त जरूरत है। अगर समय रहते छात्रों को एक सहज वातावरण नहीं दिया गया, तो देश की युवा शक्ति डिप्रेशन के दलदल में फंसती चली जाएगी। माता-पिता और समाज को भी समझना होगा कि किसी भी डिग्री की कीमत एक अनमोल जीवन से बढ़कर नहीं हो सकती।

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