
भारत और बांग्लादेश के बीच बीते कई महीनों से जमी बर्फ अब धीरे-धीरे पिघलने की दिशा में बढ़ती दिख रही है। अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के तख्तापलट और उसके बाद बनी अंतरिम व्यवस्था के दौरान द्विपक्षीय संबंधों में जो ऐतिहासिक कड़वाहट आई थी, उसे पाटने के लिए अब ढाका खुद आगे आकर टेबल पर लौटने को विवश हुआ है। व्यापार, सप्लाई चेन और आम नागरिकों के वीजा संकट को हल करने के लिए बांग्लादेश सरकार नई दिल्ली में ‘जॉइंट वर्किंग ग्रुप’ (JWG) की महत्वपूर्ण बैठकों के लिए अपने अधिकारियों की टीम भेजने को तैयार हो गई है। राजनयिक विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक भारत विरोधी रुख दिखाने के बाद अब जमीनी हकीकत, गहराते आर्थिक संकट और भौगोलिक निर्भरता के चलते बांग्लादेश को अहसास हो चुका है कि नई दिल्ली से दूरी बनाकर उसका आगे बढ़ना नामुमकिन है।
ट्रेड और वीजा पर जमी बर्फ पिघलाने के लिए दिल्ली आएगी ढाका की टीम
द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य करने की इस नई पहल के तहत बांग्लादेश वाणिज्य और राजनयिक मामलों पर गठित संयुक्त कार्य समूहों की बैठकों में हिस्सा लेगा। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार यह बैठक 7-8 अक्टूबर के लिए प्रस्तावित थी, जिसे लॉजिस्टिक कारणों से रीशेड्यूल किया जा रहा है। इस वार्ता का मुख्य केंद्र दोनों देशों के बीच बंद या सुस्त पड़े व्यापारिक रास्तों को बहाल करना और सबसे बढ़कर वीजा से जुड़ी गंभीर समस्याओं का समाधान निकालना है। बांग्लादेशी नागरिकों के लिए मेडिकल, छात्र और बिजनेस वीजा पर लगे प्रतिबंधों के कारण ढाका पर अपने ही नागरिकों का भारी आंतरिक दबाव है। बांग्लादेश यह भी चाहता है कि कार्य समूह की इस बैठक के तुरंत बाद दोनों देशों के वाणिज्य सचिव स्तर की बैठक भी आयोजित की जाए।
भारत की दो टूक शर्त: पहले ट्रांजिट और बॉर्डर ट्रेड पर बनेगी बात
हालांकि, बांग्लादेश की इस हड़बड़ी के बीच भारत ने भी अपना राजनयिक रुख पूरी तरह साफ कर दिया है। भारतीय पक्ष ने ढाका को स्पष्ट संदेश दिया है कि वाणिज्य सचिवों की उच्चस्तरीय बैठक तभी संभव होगी, जब ट्रांजिट, ट्रांसशिपमेंट और सीमा व्यापार (Border Trade) जैसे बुनियादी संस्थागत तंत्रों पर पहले सहमति बनेगी और उनकी बैठकें सफलतापूर्वक संपन्न होंगी। भारत ने साफ कर दिया है कि रिश्ते केवल औपचारिकता या एकतरफा प्राथमिकताओं से नहीं चलेंगे, बल्कि आपसी सुरक्षा चिंताओं और जमीनी समझौतों के पालन पर ही आगे का रास्ता तय होगा।
रिश्ते सुधारने के लिए बांग्लादेश में अचानक यह तड़प क्यों?
कूटनीतिक विश्लेषक बांग्लादेश के इस बदले हुए सुर के पीछे कई ठोस आर्थिक और रणनीतिक कारण देख रहे हैं:
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गंभीर आर्थिक और खाद्य निर्भरता: बांग्लादेश अपनी बुनियादी खाद्य आवश्यकताओं, प्याज, गेहूं, चीनी, कपास और आवश्यक दवाओं के लिए बड़े पैमाने पर भारत पर निर्भर है। भारत से सप्लाई बाधित होने पर बांग्लादेश में खुदरा महंगाई आसमान छूने लगती है।
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बिजली और ऊर्जा संकट: भारत से बांग्लादेश को मिलने वाली निर्बाध बिजली और ईंधन आपूर्ति उसके कपड़ा उद्योग (RMG) और विनिर्माण इकाइयों को जिंदा रखने के लिए जीवन रेखा समान है।
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मेडिकल टूरिज्म और वीजा की जरूरत: बांग्लादेश से हर साल लाखों मरीज बेहतर और किफायती इलाज के लिए कोलकाता, चेन्नई और दिल्ली आते हैं। वीजा सेवाओं पर रोक लगने से आम जनता में भारी असंतोष फैल रहा था।
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वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ने का डर: पश्चिमी देशों की आर्थिक शर्तों और घरेलू अस्थिरता के बीच पड़ोस में एक आर्थिक महाशक्ति (भारत) को नाराज रखकर कोई भी सरकार लंबे समय तक अपनी अर्थव्यवस्था को नहीं संभाल सकती।
तारिक रहमान की भारत यात्रा और तारीखों का पेच
फरवरी में हुए चुनावों के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेतृत्व में तारिक रहमान की सरकार आने के बाद भारत ने सकारात्मक शुरुआत करते हुए द्विपक्षीय यात्रा और ब्रिक्स/बिम्सटेक के मंचों के लिए निमंत्रण भेजे थे। हालांकि, बांग्लादेश द्वारा पूर्व में दिखाई गई अनिच्छा और भारत के अत्यधिक व्यस्त अंतरराष्ट्रीय राजनयिक कैलेंडर के चलते फिलहाल तारीखों को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। नई दिल्ली आगामी महीनों में विदेशी राष्ट्राध्यक्षों की मेजबानी और वैश्विक शिखर सम्मेलनों में व्यस्त है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि गेंद अब ढाका के पाले में है।
शेख हसीना का मुद्दा और कूटनीतिक संतुलन
बांग्लादेश की घरेलू राजनीति में भले ही शेख हसीना के प्रत्यर्पण और अदालत के फैसलों को लेकर बयानबाजी का दौर जारी हो, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर ढाका यह समझ चुका है कि केवल राजनीतिक नारों से देश की अर्थव्यवस्था और विदेश नीति नहीं चलाई जा सकती। सीमा सुरक्षा, पूर्वोत्तर राज्यों की कनेक्टिविटी और दोनों देशों की साझा सुरक्षा हितों को देखते हुए व्यावहारिक संबंध बनाना दोनों की मजबूरी है। ऐसे में संयुक्त कार्य समूह की यह प्रस्तावित दिल्ली बैठक इस बात की पहली परीक्षा होगी कि बांग्लादेश वास्तव में व्यावहारिक कूटनीति की ओर लौट रहा है या केवल तात्कालिक राहत पाने की कोशिश कर रहा है।
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