अयोध्या राम मंदिर की पूजा व्यवस्था में बड़ा ऐतिहासिक बदलाव, कल से बिना सिलाई वाले असिले परिधान में दिखेंगे सभी पुजारी; रामानंदीय परंपरा और वैदिक शुचिता के तहत ट्रस्ट ने लागू की नई आचार संहिता

प्रभु श्री राम की पावन नगरी अयोध्या में भव्य और दिव्य राम जन्मभूमि मंदिर में रामलला के दर्शन और नित्य सेवा-पूजा के नियमों में एक बड़ा और युगांतरकारी बदलाव किया गया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने मंदिर की व्यवस्था, गर्भगृह की शुचिता और वैदिक अनुष्ठानों की मर्यादा को और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए पुजारियों के पहनावे को लेकर नई आचार संहिता लागू कर दी है। इसके तहत कल से रामलला के गर्भगृह में सेवा देने वाले मुख्य अर्चक, सहायक पुजारी और सभी नवनियुक्त प्रशिक्षित अर्चक पारंपरिक ‘असिले’ यानी बिना सिलाई वाले विशेष वस्त्रों में नजर आएंगे। सनातन धर्म के शास्त्रों और रामानंदीय परंपरा के प्राचीन विधानों को ध्यान में रखते हुए लिए गए इस फैसले का उद्देश्य रामलला के दरबार में शुद्धता, सात्विकता और पौराणिक मर्यादा को उसके मूल स्वरूप में पुनर्स्थापित करना है।

बिना सिलाई वाले वस्त्रों (असिले परिधान) का वैदिक महत्व और नियम

सनातन धर्म और विशेष रूप से वैष्णव पूजा पद्धति में बिना सिलाई वाले वस्त्रों का अत्यंत पावन और अनिवार्य स्थान माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, सुई और धागे से सिले हुए वस्त्रों को पूजा-अर्चना, यज्ञानुष्ठान और विग्रह की प्रत्यक्ष चरण सेवा के दौरान अशुद्ध माना जाता है, क्योंकि सिलाई की प्रक्रिया में धागे की गांठें और मानवीय स्पर्श के कारण वह शुचिता नहीं रह पाती जो एक प्राकृतिक, अखंड और असिले वस्त्र में होती है।

ट्रस्ट द्वारा निर्धारित नए नियमों के अनुसार, गर्भगृह में प्रवेश करने वाले सभी पुजारियों के लिए पीतांबरी (पीले रंग की पवित्र रेशमी या सूती धोती), उत्तरीय (कंधे पर रखा जाने वाला अंगवस्त्र या दुपट्टा) और सिर पर पारंपरिक साफा या पगड़ी धारण करना अनिवार्य होगा। यह परिधान पूरी तरह से हाथ से बुना हुआ या बिना किसी सिलाई का होगा। इस परिधान के साथ पुजारी जब गर्भगृह में रामलला का अभिषेक, शृंगार, भोग और आरती करेंगे, तो वह दृश्य प्राचीन काल के गुरुकुलों और ऋषि-मुनियों के पावन आश्रमों की याद ताजा कराएगा।

रामानंदीय परंपरा और रामलला की सेवा में शुचिता का नया स्तर

अयोध्या का राम मंदिर वैष्णव संप्रदाय की अत्यंत प्रतिष्ठित ‘रामानंदीय परंपरा’ का अनुसरण करता है। रामानंदीय संप्रदाय में भगवान को केवल एक मूर्ति नहीं बल्कि साक्षात जीवित बाल स्वरूप मानकर उनकी ‘अष्टयाम सेवा’ की जाती है। अष्टयाम सेवा में सुबह मंगला आरती से लेकर रात को शयन आरती तक कुल आठ प्रहर की विशेष पूजा और भोग का विधान होता है।

इस सेवा में शुचिता का स्तर इतना कड़ा होता है कि पुजारी जब तक स्नान कर नया, पवित्र और असिला वस्त्र धारण नहीं कर लेते, तब तक वे गर्भगृह की दहलीज को स्पर्श नहीं कर सकते। ट्रस्ट के पदाधिकारियों का कहना है कि पहले भी पुजारी धोती-कुर्ता पहनते थे, लेकिन कुछ पुजारी सामान्य सिले हुए कुर्ते या परिधान का उपयोग कर लेते थे। नए दिशानिर्देशों के बाद अब सिले हुए कुर्ते, पैंट या आधुनिक कपड़ों पर गर्भगृह के भीतर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा। सभी पुजारियों के लिए एक समान और निर्धारित रंग के असिले वस्त्र ही अनिवार्य किए गए हैं।

नवनियुक्त प्रशिक्षित पुजारियों और मुख्य पुजारियों के लिए तय ड्रेस कोड

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने प्राण प्रतिष्ठा के बाद रामलला की बढ़ती सेवाओं और भव्यता को संभालने के लिए विशेष रूप से अर्चकों (पुजारियों) का एक नया बैच प्रशिक्षित किया है। इन युवा पुजारियों को अयोध्या में महीनों तक वेद, वेदांग, कर्मकांड, रामानंदीय पूजा पद्धति और संस्कृत मंत्रोच्चार का कठोर प्रशिक्षण दिया गया है।

कल से लागू हो रही नई व्यवस्था में मुख्य अर्चक आचार्य सत्येंद्र दास और उनके साथी पुजारियों के साथ-साथ यह सभी नए प्रशिक्षित अर्चक भी इसी नए वैदिक ड्रेस कोड में सेवा देंगे। इससे न केवल मंदिर में एकरूपता और अनुशासन दिखाई देगा, बल्कि देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के मन में पुजारियों के प्रति आस्था और सम्मान का भाव और अधिक गहरा होगा। ट्रस्ट ने सभी पुजारियों के लिए आवश्यक वस्त्रों और परिधानों की व्यवस्था भी स्वयं की है ताकि किसी भी अर्चक को कोई असुविधा न हो।

गर्भगृह में प्रवेश, आरती समय और पूजा पद्धति में हुए अन्य बड़े बदलाव

पुजारियों के ड्रेस कोड के साथ-साथ राम मंदिर की आंतरिक व्यवस्थाओं में कई अन्य महत्वपूर्ण सुधार भी किए गए हैं। गर्भगृह के भीतर केवल उन्हीं पुजारियों और सेवादारों को जाने की अनुमति होगी जिनकी उस विशिष्ट प्रहर की ड्यूटी तय होगी। इसके अलावा, गर्भगृह में किसी भी प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, मोबाइल फोन या चमड़े की वस्तुओं के प्रवेश पर पहले से ही पूर्ण प्रतिबंध है, जिसे अब और अधिक सख्ती से लागू किया जाएगा।

रामलला की विभिन्न आरतियों—जैसे मंगला आरती, शृंगार आरती, राजभोग आरती, संध्या आरती और शयन आरती—के समय और मंत्रोच्चार की विधियों का भी मानकीकरण किया गया है। अब सभी आरतियों के दौरान निर्धारित वैदिक ऋचाओं और वाल्मीकि रामायण के श्लोकों का सस्वर पाठ एक तय लय और ध्वनि में होगा, जिससे मंदिर परिसर का पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से गुंजायमान रहेगा।

भक्तों के दर्शन और राम मंदिर में बढ़ती व्यवस्थाओं का सकारात्मक प्रभाव

22 जनवरी 2024 को हुई ऐतिहासिक प्राण प्रतिष्ठा के बाद से अयोध्या में प्रतिदिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु रामलला के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। ऐसे में मंदिर प्रबंधन के लिए सुरक्षा, सुगम दर्शन और पारंपरिक मर्यादा का संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती रहा है। पुजारियों की इस नई वेशभूषा और अनुशासित व्यवस्था से श्रद्धालुओं को भी गर्भगृह की दिव्यता का एक अलौकिक अनुभव मिलेगा।

दूर-दराज से आने वाले रामभक्तों का कहना है कि जब पुजारी प्राचीन वैदिक वेशभूषा में हाथ में आरती की थाल लेकर खड़े होते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो त्रेतायुग का अयोध्या दरबार साक्षात उतर आया हो। ट्रस्ट के इस कदम की साधु-संतों, धर्माचार्यों और आम श्रद्धालुओं ने एक स्वर में सराहना की है और इसे सनातन संस्कृति के गौरव की पुनर्स्थापना बताया है।

सनातन धर्म की प्राचीन मर्यादा का पुनर्जीवन

अयोध्या राम मंदिर में हुआ यह बदलाव केवल एक बाहरी वेशभूषा का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म की उस मूल आत्मा का पुनर्जागरण है जिसमें बाह्य आचरण और आंतरिक शुचिता दोनों को समान महत्व दिया गया है। जब भगवान के सेवक पूर्ण पवित्रता और बिना सिलाई वाले प्राकृतिक वस्त्रों में प्रभु के सम्मुख नतमस्तक होते हैं, तो वह पूजा अपने आप में सात्विकता का शिखर बन जाती है।

कल सुबह की मंगला आरती के साथ जैसे ही राम मंदिर के कपाट खुलेंगे, रामलला के सेवक एक नए, दिव्य और अलौकिक रूप में श्रद्धालुओं का स्वागत करेंगे। अयोध्या में शुरू हुई यह नई व्यवस्था देश भर के अन्य प्रमुख मंदिरों के लिए भी एक आदर्श और प्रेरणा बनेगी कि कैसे आधुनिक युग में भी प्राचीन धार्मिक मर्यादाओं और वैदिक परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखा जा सकता है।

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