अमेरिका-ईरान शांति वार्ता: 21 घंटे के मंथन के बाद भी परमाणु मुद्दे पर अड़ा ईरान, पर जेडी वेंस की पहल ने जगाई ‘गुडविल’ की उम्मीद

वॉशिंगटन/इस्लामाबाद: अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई हाई-प्रोफाइल शांति वार्ता भले ही बिना किसी औपचारिक समझौते के समाप्त हो गई हो, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में इसे पूरी तरह विफल नहीं माना जा रहा है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में चली 21 घंटे की मैराथन बैठक ने दोनों कट्टर विरोधियों के बीच ‘विश्वास की कमी’ (Trust Deficit) को पाटने का काम किया है।


21 घंटे की बातचीत: अविश्वास से ‘दोस्ती’ तक का सफर

द वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, वार्ता के शुरुआती घंटों में दोनों पक्षों के बीच भारी तनाव और अविश्वास देखा गया। हालांकि, जैसे-जैसे बातचीत आगे बढ़ी, माहौल में नरमी आई। खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वीकार किया कि बातचीत काफी गहन थी और अंत तक आते-आते दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच एक ‘दोस्ताना’ तालमेल विकसित हो गया था। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ईरान की नई नेतृत्व टीम के साथ यह ‘गुडविल’ (सद्भावना) भविष्य के समझौतों की नींव बन सकती है।

परमाणु कार्यक्रम: समझौते की राह में सबसे बड़ा रोड़ा

इतनी लंबी बातचीत के बावजूद पेंच अभी भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर फंसा हुआ है।

  • अमेरिका की मांग: ईरान अपनी परमाणु संवर्धन (Nuclear Enrichment) क्षमता को पूरी तरह खत्म करे ताकि वह कभी भी परमाणु बम न बना सके।

  • ईरान का रुख: तेहरान का तर्क है कि उसका कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण और नागरिक उद्देश्यों (ऊर्जा) के लिए है, और वह अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा।

ईरान की ‘कमजोरी’ भांप गया अमेरिका?

रिपोर्ट के मुताबिक, इस 21 घंटे की बातचीत के दौरान अमेरिकी इंटेलिजेंस और राजनयिकों को यह संकेत मिले हैं कि ईरान की आंतरिक स्थिति वैसी नहीं है जैसी वह बाहर से दिखाने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका को अब तेहरान की आर्थिक और सामरिक कमजोरियों का बेहतर अंदाजा लग गया है, जिसका इस्तेमाल भविष्य की वार्ता में ‘लीवरेज’ के तौर पर किया जा सकता है।

दबाव की राजनीति: होर्मुज की नाकाबंदी

एक तरफ शांति की बातें हो रही हैं, तो दूसरी तरफ राष्ट्रपति ट्रंप ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में नाकाबंदी की घोषणा कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह ‘दोतरफा रणनीति’ का हिस्सा है—एक हाथ में बातचीत का प्रस्ताव और दूसरे हाथ में आर्थिक नाकाबंदी का डंडा। इस कदम का उद्देश्य ईरान पर दबाव डालना है ताकि वह अमेरिकी शर्तों पर झुकने को मजबूर हो।

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