कैलाश मानसरोवर यात्रा पर विवाद: नेपाल की बालेन शाह सरकार ने भारत और चीन को क्यों भेजा कड़ा पत्र? जानें पूरा मामला

Diplomacy News: भारत और चीन के बीच लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा को फिर से शुरू करने पर बनी सहमति के बाद हिमालयी राजनीति में नया मोड़ आ गया है। नेपाल की बालेन शाह सरकार ने इस यात्रा पर कड़ी आपत्ति जताते हुए भारत और चीन दोनों देशों को कूटनीतिक पत्र (Diplomatic Note) भेजा है। नेपाल का दावा है कि जिस लिपुलेख क्षेत्र से यात्री गुजरेंगे, वह उसका संप्रभु हिस्सा है।

क्या है ताज़ा विवाद?

हाल ही में भारत और चीन ने मानसरोवर यात्रा के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की थी। इसके तहत:

  • कुल 1,000 तीर्थयात्रियों को यात्रा की अनुमति दी गई।

  • 500 यात्री उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से होकर जाने थे।

  • बाकी 500 यात्री सिक्किम के नाथुला दर्रे से गुजरने वाले थे।

जैसे ही इस यात्रा का टाइम-टेबल जारी हुआ, नेपाल की राजनीति में हलचल मच गई। बालेन शाह प्रशासन के विदेश मंत्रालय ने 6 बिंदुओं वाला बयान जारी कर कहा कि वे इस क्षेत्र में भारत या चीन द्वारा की जाने वाली किसी भी गतिविधि (सड़क निर्माण, व्यापार या तीर्थयात्रा) का विरोध करते हैं।


बालेन शाह सरकार का स्टैंड: ओली की राह पर?

नेपाल में नई सरकार आने के बाद उम्मीद थी कि सीमा विवाद पर कूटनीतिक नरमी आएगी, लेकिन बालेन सरकार ने पूर्ववर्ती केपी शर्मा ओली सरकार के कड़े रुख को ही दोहराया है।

  1. चीन को ‘मित्र’ और भारत को ‘पड़ोसी’ का दर्जा: नेपाल ने अपने पत्र में चीन को मित्र देश बताते हुए लिपुलेख पर अपना दावा जताया है।

  2. कालापानी-लिपुलेख विवाद: नेपाल का कहना है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा नेपाल के अभिन्न अंग हैं और वहां बिना उनकी अनुमति के कोई भी विदेशी गतिविधि स्वीकार्य नहीं है।


क्या है इस हिस्से का ऐतिहासिक विवाद?

भारत और नेपाल के बीच यह विवाद सुगौली की संधि (1816) की व्याख्या को लेकर है:

  • नेपाल का तर्क: नेपाल का मानना है कि महाकाली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा में है, इसलिए इसके पूर्व का पूरा हिस्सा (लिपुलेख सहित) नेपाल का है।

  • भारत का तर्क: भारत का कहना है कि नदी का वास्तविक उद्गम पूर्व की ओर लिपुखोला के पास है। इसी आधार पर भारत आजादी के बाद से ही इस क्षेत्र पर नियंत्रण रखता है और 1962 से वहां भारतीय सेना की चौकियां मौजूद हैं।


2020 में भड़की थी चिंगारी

यह विवाद साल 2020 में तब चरम पर पहुंचा जब भारतीय रक्षा मंत्री ने लिपुलेख दर्रे तक बनी सड़क का उद्घाटन किया। इसके जवाब में तत्कालीन ओली सरकार ने नेपाल का नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें भारत के इन तीन क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया। हाल ही में नेपाल ने अपने 100 रुपये के नए नोटों पर भी इसी विवादित नक्शे को छापने का निर्णय लिया था।

बालेन सरकार के लिए क्या है चुनौती?

नेपाल के भीतर विपक्षी दल और जनता बालेन शाह पर भारत के प्रति “नरम” होने का आरोप लगा रहे थे। जानकारों का मानना है कि घरेलू राजनीति के दबाव और अपनी राष्ट्रवादी छवि को बनाए रखने के लिए बालेन शाह ने चुप्पी तोड़ते हुए यह कड़ा कूटनीतिक कदम उठाया है। अब देखना यह होगा कि भारत और चीन इस विरोध के बीच मानसरोवर यात्रा को किस तरह आगे बढ़ाते हैं।

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