ईरान के ‘अंडरग्राउंड मिसाइल सिटी’ पर संकट: जिसे समझा था सबसे बड़ी ताकत, वही बनी अब गले की फांस; जानें क्या है इजरायल का ‘किलर प्लान’

तेहरान/यरूशलेम। मिडिल ईस्ट के महायुद्ध में ईरान की सामरिक रणनीति को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। दशकों तक जिस ‘मिसाइल सिटी’ (Underground Missile Cities) को ईरान अपना सबसे अभेद्य सुरक्षा कवच और दुश्मनों के लिए काल मानता था, वही अब उसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो रही है। ताजा रिपोर्ट्स और सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से पता चला है कि इजरायल और अमेरिका के ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ (Operation Epic Fury) ने ईरान के इन गुप्त ठिकानों को ‘पाताल’ में ही कैद करने की तैयारी कर ली है। रडार की नजरों से बचने के लिए पहाड़ों के नीचे बनाए गए ये ठिकाने अब ईरानी मिसाइलों के लिए ‘कब्रगाह’ बनते जा रहे हैं।

सुरंग के बाहर निकलते ही बरस रही है ‘आसानी मौत’

ईरान की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि भले ही उसकी मिसाइलें जमीन के सैकड़ों फीट नीचे सुरक्षित हों, लेकिन उन्हें दागने के लिए बाहर (Exit Points) लाना ही पड़ता है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल और अमेरिका ने ईरान के ऊपर आसमान में ऐसे जासूसी ड्रोन और स्टील्थ फाइटर जेट्स तैनात कर दिए हैं, जो 24 घंटे इन सुरंगों के द्वारों पर नजर रख रहे हैं। जैसे ही कोई मिसाइल लॉन्चर या हथियार प्रणाली बाहर निकलने की कोशिश करती है, ऊपर मंडरा रहे शिकारी विमान उसे तुरंत तबाह कर देते हैं। इस रणनीति ने ईरान की मारक क्षमता को 86 प्रतिशत तक कम कर दिया है।

‘बंकर बस्टर’ बमों से दफन हो रहे हैं ईरानी हथियार

अमेरिकी और इजरायली वायुसेना ने ईरान के सिराज़, तबरीज और इस्फहान जैसे शहरों के पास स्थित भूमिगत ठिकानों पर भीषण बमबारी की है। दावा किया जा रहा है कि शक्तिशाली ‘बंकर बस्टर’ बमों के इस्तेमाल से कई सुरंगों के प्रवेश द्वार ढह गए हैं, जिससे अंदर मौजूद हजारों मिसाइलें और सैनिक वहीं फंस गए हैं। सैटेलाइट तस्वीरों में तबरीज नॉर्थ मिसाइल बेस के पास ढहे हुए टनल साफ देखे जा सकते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि ईरान ने इन ठिकानों को स्थायी और अचल बनाकर बड़ी गलती कर दी, क्योंकि अब इनके सटीक लोकेशन दुश्मनों को पता चल चुके हैं और ये किसी भी हमले के लिए आसान लक्ष्य बन गए हैं।

रडार सिस्टम हुआ फेल, अब ‘अंधेरे’ में लड़ रहा है ईरान

युद्ध के शुरुआती दौर में ही इजरायल ने ईरान के ‘S-300’ जैसे डिफेंस सिस्टम और रडार केंद्रों को काफी हद तक निष्क्रिय कर दिया है। इसके चलते अब ईरानी सेना को यह पता ही नहीं चल पा रहा है कि उनके आसमान में कब और कहां से हमला होने वाला है। थिंक टैंक ‘सीएनए कॉर्प’ के अनुसार, तकनीकी दिक्कतों के कारण ईरान अब इन भूमिगत साइलो (Silos) से मिसाइल दागने की रणनीति छोड़ रहा है, क्योंकि एक बार इस्तेमाल के बाद इन्हें दोबारा तैयार करना बेहद मुश्किल है। ईरान का वह ‘डिटेरेंस’ (खौफ) जो उसकी मिसाइलों पर टिका था, अब धुएं में मिलता नजर आ रहा है।

क्या घुटने टेकने पर मजबूर होगा इस्लामिक गणराज्य?

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की मौत (दावा) के बाद देश में नेतृत्व का संकट गहरा गया है। एक तरफ सैन्य ठिकानों का विनाश और दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था का चरमराना ईरान के लिए दोहरी मार है। अमेरिका के एडमिरल ब्रॉड कूपर ने स्पष्ट किया है कि वे ईरान की आखिरी बची हुई बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को भी खत्म करने के मिशन पर हैं। अगर ईरान के ये ‘पाताल लोक’ वाले ठिकाने पूरी तरह जमींदोज हो जाते हैं, तो उसके पास जवाबी कार्रवाई का कोई प्रभावी जरिया नहीं बचेगा, जो उसे आत्मसमर्पण या भारी समझौते के लिए मजबूर कर सकता है।

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