
बीजिंग/नई दिल्ली। शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़े और क्रांतिकारी बदलाव के नाम पर थोपे गए नए कानून ने वैश्विक स्तर पर बहस छेड़ दी है। नए सरकारी फरमान के अनुसार, अब सभी शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाई का मुख्य माध्यम केवल ‘मंदारिन’ भाषा ही होगा। इस कानून की सबसे कड़ी शर्त यह है कि किसी भी किशोर छात्र को अपनी शिक्षा तभी पूर्ण मानी जाएगी, जब उसे मंदारिन भाषा की गहरी और स्पष्ट समझ होगी। सरकार के इस सख्त रुख ने न केवल छात्रों और अभिभावकों की रातों की नींद उड़ा दी है, बल्कि शिक्षा विशेषज्ञों ने भी इस पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए इसे भाषाई विविधता पर प्रहार बताया है।
पढ़ाई का एकमात्र जरिया होगी मंदारिन भाषा
नए कानून के लागू होने के बाद अब क्षेत्रीय भाषाओं या अन्य माध्यमों में शिक्षा देने वाले संस्थानों को अपनी पूरी कार्यप्रणाली बदलनी होगी। प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च शिक्षा तक, मंदारिन को ही निर्देश की प्राथमिक भाषा (Medium of Instruction) बनाया गया है। प्रशासन का तर्क है कि इससे राष्ट्रीय एकता और संचार में एकरूपता आएगी, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दूसरे भाषाई पृष्ठभूमि वाले छात्रों के लिए यह किसी बड़ी बाधा से कम नहीं है। अब हर विषय, चाहे वह विज्ञान हो या गणित, मंदारिन में ही पढ़ाना और समझना अनिवार्य होगा।
किशोरों के लिए ‘मंदारिन टेस्ट’ पास करना हुआ अनिवार्य
इस कानून का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा किशोरों (Teenagers) से जुड़ा है। नए नियमों के मुताबिक, स्कूली शिक्षा पूरी करने के लिए मंदारिन भाषा में दक्षता साबित करना अब अनिवार्य कर दिया गया है। बिना इस भाषाई समझ के, छात्रों को डिग्री या सर्टिफिकेट हासिल करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि किशोरावस्था में अचानक भाषा का यह दबाव छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और उनके सीखने की क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इससे उन छात्रों के पिछड़ने का डर है जो घर में क्षेत्रीय बोलियां बोलते हैं।
विशेषज्ञों ने जताई चिंता: क्या खत्म हो जाएगी भाषाई विविधता?
दुनियाभर के शिक्षाविदों और भाषा विशेषज्ञों ने इस कदम की कड़ी आलोचना की है। उनका कहना है कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ज्ञान का प्रसार होना चाहिए, न कि किसी विशेष भाषा को जबरन थोपना। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस कानून से स्थानीय संस्कृतियों और भाषाओं का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। साथ ही, यह उन अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए भी एक बड़ा झटका है जो वहां के संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इस ‘भाषाई एकीकरण’ के पीछे के राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थों को लेकर भी अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सवाल उठने लगे हैं।
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