पेरिस/वॉशिंगटन: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को लेकर जारी वैश्विक तनाव के बीच एक बड़ी खबर आ रही है। पश्चिमी देशों और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच बढ़ती कड़वाहट अब एक नई “खिचड़ी” में बदल गई है। यूरोप के दिग्गज देश—फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन—अब अमेरिका के बिना होर्मुज की सुरक्षा के लिए एक स्वतंत्र “इच्छुक देशों का समूह” (Coalition of the Willing) बनाने की गुप्त योजना पर काम कर रहे हैं।
ट्रंप को दरकिनार करने की रणनीति
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल के दिनों में यूरोपीय देशों की तीखी आलोचना और “अमेरिका फर्स्ट” की नीति ने पश्चिमी गठबंधन में गहरी खाई पैदा कर दी है। इसी का नतीजा है कि यूरोप अब समुद्री सुरक्षा के लिए वॉशिंगटन पर निर्भर रहने के बजाय अपना अलग रास्ता चुन रहा है। इस नए प्लान की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें अमेरिका को जानबूझकर शामिल नहीं किया जा रहा है।
मैक्रों और स्टार्मर की ‘सीक्रेट’ बैठक
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्पष्ट किया है कि इस मिशन में वे देश शामिल नहीं होंगे जो मौजूदा ईरान-अमेरिका संघर्ष का सीधा हिस्सा हैं।
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भारत और चीन को बुलावा: इस योजना को जमीन पर उतारने के लिए मैक्रों और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर इसी हफ्ते एक उच्चस्तरीय बैठक कर सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक में अमेरिका को आमंत्रित नहीं किया गया है, जबकि भारत और चीन को इस समूह का हिस्सा बनने के लिए बुलावा भेजा गया है।
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क्षेत्रीय सहयोग: यूरोप इस योजना की सफलता के लिए ईरान और ओमान जैसे क्षेत्रीय देशों के साथ भी तालमेल बिठाने की कोशिश में है।
यूरोप के ‘थ्री-पॉइंट’ प्लान का क्या है मकसद?
यूरोपीय देशों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि युद्ध की स्थिति टलने के बाद वैश्विक व्यापारिक मार्ग (Global Trade Route) सुरक्षित रहे। वियोन (WION) की रिपोर्ट के अनुसार, इस योजना के तीन प्रमुख लक्ष्य हैं:
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जहाजों की निकासी: होर्मुज के अशांत पानी में फंसे व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालना।
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माइन स्वीपिंग (बारूदी सुरंगों की सफाई): युद्ध के दौरान समुद्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों (Mines) को साफ करना, जो व्यापारिक जहाजों के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं।
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दीर्घकालिक निगरानी: जंग के बाद भी इस मार्ग की निरंतर सुरक्षा और निगरानी के लिए एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाना।
अमेरिका के लिए बड़ा झटका
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के तेल व्यापार की जीवनरेखा है। अब तक अमेरिका यहां अपनी नौसैनिक मौजूदगी के जरिए दादागिरी दिखाता रहा है। लेकिन यदि फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे पुराने सहयोगी ही भारत और चीन के साथ मिलकर एक अलग सुरक्षा समूह बना लेते हैं, तो यह डोनाल्ड ट्रंप की वैश्विक कूटनीति और ‘सुपरपावर’ की छवि के लिए एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय अपमान साबित हो सकता है।
जर्मनी ने भी इस योजना में गहरी दिलचस्पी दिखाई है, जिससे यह साफ है कि यूरोप अब अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए अमेरिका की ‘युद्ध वाली कूटनीति’ से दूरी बनाना चाहता है।
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