संसदीय इतिहास में पहली बार! मनोनीत MP हरिवंश निर्विरोध बनेंगे राज्यसभा के उपसभापति

नई दिल्ली। राज्यसभा के उपसभापति के रूप में हरिवंश नारायण सिंह की हैट्रिक अब महज एक औपचारिक घोषणा रह गई है। गुरुवार को नामांकन की समय सीमा समाप्त होने के बाद, वह इस पद के लिए एकमात्र उम्मीदवार के रूप में उभरे हैं। हालांकि, विपक्ष ने इस पूरी प्रक्रिया पर कड़ा एतराज जताते हुए चुनाव के बहिष्कार का फैसला किया है। यदि वह शुक्रवार को निर्विरोध निर्वाचित होते हैं, तो यह उनके संसदीय करियर का लगातार तीसरा कार्यकाल होगा।

सत्ता पक्ष का भारी समर्थन: नड्डा ने पेश किया प्रस्ताव

सदन के नेता जगत प्रकाश नड्डा ने एनडीए (NDA) के घटक दलों के साथ मिलकर हरिवंश के नाम का प्रस्ताव रखा है। भाजपा सदस्य एस. फांगनोन कोन्याक ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। इसके अलावा निर्मला सीतारमण, जयंत चौधरी और संजय कुमार झा जैसे दिग्गजों ने भी उनके समर्थन में प्रस्ताव दिए हैं। नामांकन की अंतिम तिथि दोपहर 12 बजे तक विपक्ष की ओर से कोई भी पर्चा दाखिल नहीं किया गया, जिससे हरिवंश की जीत का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया।

निर्वाचन की प्रक्रिया: ध्वनि मत से होगा फैसला

स्थापित परंपरा के अनुसार, शुक्रवार को सदन में एक-एक कर प्रस्ताव पेश किए जाएंगे। जैसे ही नड्डा द्वारा प्रस्तावित और कोन्याक द्वारा समर्थित पहला प्रस्ताव ध्वनि मत से पारित होगा, सभापति हरिवंश के निर्वाचन की आधिकारिक घोषणा कर देंगे। इसके बाद उन्हें आसन तक ले जाया जाएगा। दिलचस्प बात यह है कि इस बार उन्हें जदयू (JDU) के कोटे से नहीं, बल्कि राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य के रूप में सदन भेजा गया है।

विपक्ष की नाराजगी के 3 मुख्य कारण

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया के जरिए इस चुनाव के बहिष्कार के कारणों को स्पष्ट किया है। उन्होंने सरकार पर संसदीय परंपराओं की अनदेखी का आरोप लगाते हुए तीन बड़ी आपत्तियां जताई हैं:

  1. लोकसभा उपाध्यक्ष का पद: विपक्ष का कहना है कि सरकार ने पिछले सात वर्षों से लोकसभा में डिप्टी स्पीकर की नियुक्ति नहीं की है।

  2. मनोनीत सदस्य पर सवाल: संसदीय इतिहास में शायद यह पहली बार है जब किसी राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य को उपसभापति पद के लिए उम्मीदवार बनाया गया है।

  3. संवाद की कमी: विपक्ष का आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में उनके साथ कोई सार्थक विचार-विमर्श नहीं किया गया।

परंपरा बनाम विरोध

जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि यह विरोध सरकार की कार्यशैली के खिलाफ है, न कि व्यक्तिगत रूप से हरिवंश के प्रति। हालांकि, विपक्ष के इस कदम से सदन में कड़वाहट बढ़ने के आसार हैं। बता दें कि हरिवंश का पिछला कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हुआ था, जिसके अगले ही दिन उन्हें पुनः मनोनीत किया गया।

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