बर्लिन/वाशिंगटन: अमेरिका और जर्मनी के बीच रक्षा संबंधों में आई कड़वाहट अब खुलकर सामने आ गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जर्मनी से अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम करने की चेतावनी के बाद बर्लिन ने कड़ा रुख अपनाया है। जर्मनी ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि वह किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए ‘पूरी तरह तैयार’ है और ट्रंप की धमकियां उसकी विदेश नीति को प्रभावित नहीं कर सकेंगी।
ईरान मुद्दे पर टकराए दो दिग्गज: ट्रंप बनाम फ्रेडरिक मर्ज
इस पूरे विवाद की जड़ ईरान का परमाणु कार्यक्रम और मिडिल ईस्ट का युद्ध है। बुधवार को राष्ट्रपति ट्रंप ने चांसलर फ्रेडरिक मर्ज पर तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया था कि उन्हें ईरान की वास्तविक स्थिति की जानकारी नहीं है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर यहां तक कह दिया कि ईरान वाशिंगटन को अपमानित कर रहा है। इसी तनातनी के बीच ट्रंप ने संकेत दिया कि वे जर्मनी में तैनात हजारों अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला सकते हैं या उन्हें कहीं और तैनात कर सकते हैं।
जर्मनी की दो-टूक: ‘यह कोई नई धमकी नहीं’
ट्रंप के तेवरों पर प्रतिक्रिया देते हुए जर्मन विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल ने मोरक्को यात्रा के दौरान कहा कि जर्मनी इन धमकियों से विचलित नहीं है। वाडेफुल ने कहा, “सैनिकों की संख्या घटाने का विचार नया नहीं है, यह पहले भी कई बार उठ चुका है। हम इसके लिए तैयार हैं।” उन्होंने स्पष्ट किया कि जर्मनी नाटो और ट्रांसअटलांटिक साझेदारी को मजबूत रखने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन वह किसी दबाव में झुकने वाला नहीं है।
रामस्टीन एयर बेस: अमेरिका के लिए भी मजबूरी!
जर्मनी ने अमेरिका को उसकी रणनीतिक जरूरतें भी याद दिलाईं। विदेश मंत्री ने रामस्टीन एयर बेस का उदाहरण देते हुए कहा कि यह सैन्य अड्डा केवल जर्मनी के लिए नहीं, बल्कि खुद अमेरिका के लिए भी ‘अपरिहार्य’ है। विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मनी से सैनिकों को हटाना अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से आत्मघाती साबित हो सकता है, क्योंकि यूरोप और मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ऑपरेशन्स के लिए जर्मनी एक मुख्य केंद्र है।
नाटो में बढ़ सकती है रार
चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने हालांकि सीधे तौर पर ट्रंप का नाम लेने से परहेज किया, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि जर्मनी एक मजबूत और एकीकृत नाटो के पक्ष में है। फिलहाल, बर्लिन वाशिंगटन के आधिकारिक फैसले का इंतजार कर रहा है। लेकिन जिस तरह से जर्मनी ने ‘ताल ठोकी’ है, उससे साफ है कि इस बार यूरोपीय देश ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के सामने आसानी से सरेंडर करने के मूड में नहीं हैं।
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