‘हिन्दू आखिरकार हिन्दू ही है’: जस्टिस नागरत्ना ने सबरीमाला मामले में क्यों दी एकजुटता की नसीहत

नई दिल्ली/डिजिटल डेस्क: सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ के सामने चल रही सबरीमाला मामले की सुनवाई अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। गुरुवार (23 अप्रैल 2026) को सुनवाई के आठवें दिन जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने हिन्दू धर्म की आंतरिक संरचना और मंदिरों में प्रवेश के अधिकार को लेकर एक अत्यंत प्रभावशाली टिप्पणी की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक हिन्दू, चाहे वह किसी भी संप्रदाय का हो, आखिरकार हिन्दू ही है और उसे किसी भी मंदिर में प्रवेश से रोका नहीं जा सकता।

संप्रदाय के नाम पर अलगाव बर्दाश्त नहीं

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने हिन्दू समाज की एकजुटता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मंदिरों को ‘संप्रदाय’ (Sect) की रेखाओं पर एक-दूसरे को बाहर नहीं करना चाहिए। उनका तर्क था कि इस तरह का अलगाव न केवल समाज को बांटता है, बल्कि अंततः उस विशिष्ट संप्रदाय को भी कमजोर करता है।

पूजा पद्धति का संरक्षण बनाम प्रवेश का अधिकार

जस्टिस नागरत्ना ने दक्षिण भारत के मंदिरों का उदाहरण देते हुए संप्रदाय और व्यक्तिगत अधिकार के बीच के अंतर को समझाया:

  • पूजा पद्धति (Rituals): उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत में शैव, वैष्णव या श्री वैष्णव जैसी विभिन्न पूजा पद्धतियां प्रचलित हैं। यदि कोई मंदिर शैव पद्धति का पालन करता है, तो वहां की पूजा उसी विधि से होगी। वैष्णव संप्रदाय के लोग यह मांग नहीं कर सकते कि वहां उनकी पद्धति अपनाई जाए। उस विशिष्ट स्वरूप (पूजा विधि) को संविधान के तहत संरक्षण प्राप्त है।

  • प्रवेश का अधिकार (Right to Enter): जस्टिस नागरत्ना ने साफ किया कि पूजा पद्धति अलग होने का मतलब यह कतई नहीं है कि दूसरे संप्रदाय के व्यक्ति को मंदिर में प्रवेश से रोक दिया जाए। उन्होंने कहा, “एक हिन्दू, आखिरकार हिन्दू ही होता है। वह किसी भी मंदिर में जा सकता है।”

‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ पर तंज और ज्ञान के स्रोत

सुनवाई के दौरान जब वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने शशि थरूर के एक लेख का संदर्भ दिया, तो जस्टिस नागरत्ना ने तंज कसते हुए कहा कि ज्ञान के सभी स्रोतों का स्वागत है, लेकिन “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी” का नहीं। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने भी स्पष्ट किया कि अदालत व्यक्तिगत राय के बजाय संवैधानिक सिद्धांतों और स्थापित कानूनी मापदंडों पर चलती है।

सामाजिक सुधार बनाम धार्मिक प्रथाएं

अदालत ने अनुच्छेद 25(2)(b) पर भी चर्चा की, जो राज्य को सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है। पीठ ने संकेत दिया कि:

  • राज्य लोगों की इच्छा का प्रतिनिधि है और सामाजिक बुराइयों को सुधारने के लिए धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों में हस्तक्षेप कर सकता है।

  • हालांकि, बुधवार को अदालत ने यह भी कहा था कि सुधार के नाम पर किसी धर्म को ‘खोखला’ नहीं किया जा सकता, लेकिन साथ ही भेदभावपूर्ण प्रथाओं के खिलाफ जनहित याचिकाओं (PIL) के दरवाजे भी बंद नहीं किए जा सकते।

क्या हैं 9 जजों की पीठ के मुख्य सवाल?

यह पीठ सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश के साथ-साथ कई व्यापक संवैधानिक प्रश्नों की जांच कर रही है:

  1. संवैधानिक नैतिकता: क्या ‘नैतिकता’ शब्द के दायरे में संवैधानिक मूल्य भी शामिल हैं?

  2. समानता बनाम स्वतंत्रता: अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 26 (संप्रदाय के अधिकार) के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?

  3. न्यायिक समीक्षा: अदालत किसी धार्मिक प्रथा की ‘अनिवार्यता’ को किस हद तक परख सकती है?

  4. बाहरी चुनौती: क्या उस संप्रदाय से बाहर का कोई व्यक्ति (PIL के जरिए) किसी प्रथा को चुनौती दे सकता है?

यह सुनवाई न केवल सबरीमाला, बल्कि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और पारसी महिलाओं के अधिकारों जैसे कई अन्य मुद्दों के लिए एक नया कानूनी ढांचा (Legal Framework) तैयार करेगी।

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