दिल्ली दंगों (Delhi Riots 2020) के कथित साजिश के मामले में पिछले कई सालों से जेल में बंद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद (Umar Khalid) का मुद्दा एक बार फिर देश की राजनीति के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर (Shashi Tharoor) ने उमर खालिद को बिना मुकदमा चलाए (Without Trial) इतने लंबे समय तक सलाखों के पीछे रखने पर देश की न्याय व्यवस्था और सरकार पर तीखा हमला बोला है।
शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर पोस्ट साझा करते हुए साफ शब्दों में कहा कि यदि उमर खालिद के खिलाफ कोई ठोस सबूत हैं, तो सरकार को उसे अदालत में साबित करना चाहिए, न कि बिना ट्रायल के उन्हें अनंत काल के लिए जेल में बंद रखना चाहिए।
“6 साल बिना मुकदमे के जेल में रखना लोकतंत्र पर धब्बा” — शशि थरूर
शशि थरूर ने अपने आधिकारिक बयान में उमर खालिद के मानवाधिकारों और कानूनी अधिकारों की वकालत करते हुए न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए।
शशि थरूर ने लिखा:
“अगर उमर खालिद ने वास्तव में देश में आतंकवाद को उकसाने या भड़काने का काम किया है, तो एजेंसियों को इसे अदालत के सामने पुख्ता सबूतों के साथ साबित करना चाहिए। किसी भी अन्य भारतीय नागरिक की तरह, उमर खालिद को भी एक निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध (Time-bound) सुनवाई का पूरा अधिकार है। करीब 6 वर्षों (2020 से 2026) तक बिना किसी मुकदमे की शुरुआत के किसी को जेल में रखना हमारी न्याय व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है और यह हमारे जीवंत लोकतंत्र पर एक धब्बा है। देश की जनता को यह जानने का पूरा हक है कि आखिर अब तक इस मामले में कानूनी प्रक्रिया आगे क्यों नहीं बढ़ सकी है।”
ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ के इंटरव्यू के बाद गरमाई राजनीति
शशि थरूर की यह तीखी प्रतिक्रिया ब्रिटिश मीडिया संस्थान ‘द गार्जियन’ ( may be The Guardian) में प्रकाशित उमर खालिद के एक सनसनीखेज इंटरव्यू के बाद आई है। जेल से दिए गए अपने इस पहले इंटरव्यू में उमर खालिद ने न केवल सरकार बल्कि देश की मुख्य विपक्षी पार्टियों को भी कटघरे में खड़ा किया:
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विपक्ष की चुप्पी पर उठाए सवाल: उमर खालिद ने निराशा जताते हुए कहा कि जेल में 6 साल बीत जाने के बाद उन्हें इस बात का बेहद दुख है कि देश के प्रमुख विपक्षी दलों, नागरिक समाज (Civil Society) और सामाजिक आंदोलनों ने राजनीतिक बंदियों के मुद्दे पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है।
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दमन को मिलता है हौसला: खालिद का तर्क था कि विपक्ष की यह चुप्पी सरकार को असहमति की आवाज उठाने वाले कार्यकर्ताओं और युवाओं के खिलाफ और अधिक दमनकारी कार्रवाई करने का हौसला देती है।
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मीडिया ट्रायल का आरोप: खालिद ने आरोप लगाया कि उनके खिलाफ एक सोची-समझी रणनीति के तहत ऐसा दुष्प्रचार (Propaganda) चलाया गया, जिसने उन्हें समाज की नजरों में एक ‘आतंकवादी’ के रूप में पेश कर दिया और उनकी मानवीय पहचान को पूरी तरह नष्ट कर दिया।
आखिर उमर खालिद पर क्या हैं आरोप और क्या है UAPA का मामला?
उमर खालिद को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया था।
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साजिश का मास्टरमाइंड: जांच एजेंसियों का आरोप है कि फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों (जिसमें 50 से अधिक लोगों की जान गई थी) की मुख्य साजिश और हिंसा भड़काने की रूपरेखा उमर खालिद ने ही तैयार की थी।
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UAPA कानून: इस मामले की गंभीरता को देखते हुए खालिद पर कड़े गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।
दूसरी तरफ, उमर खालिद और उनके वकील लगातार इन आरोपों को सिरे से खारिज करते आए हैं। उनका कहना है कि यह पूरी कार्रवाई राजनीति से प्रेरित है और उनके भाषणों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।
जेल का मानसिक असर और जमानत पर सस्पेंस
पिछले 6 सालों के दौरान उमर खालिद की नियमित जमानत (Regular Bail) याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट से लेकर दिल्ली हाई कोर्ट और निचली अदालतों में कई बार दाखिल की गईं, लेकिन हर बार उनकी याचिका खारिज हो गई। गौर करने वाली बात यह है कि इतने सालों बाद भी इस मामले में मुख्य मुकदमे (Trial) की औपचारिक शुरुआत तक नहीं हो सकी है।
इंटरव्यू में उमर खालिद ने जेल की कोठरी में बिताए सालों के मानसिक प्रभाव का जिक्र करते हुए कहा कि इतने लंबे समय तक कैद में रहने से किसी भी व्यक्ति की मानसिक स्थिति और आत्मविश्वास पर गहरा और नकारात्मक असर पड़ता है। हालांकि, उन्होंने साफ किया कि इस प्रताड़ना के बावजूद उनके राजनीतिक विचार और विचारधारा नहीं बदली है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि वर्तमान समय में भारत के भीतर नफरत भरी भाषा (Hate Speech) और फेक न्यूज का सामान्य होना बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है।
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