बॉलीवुड के दो दिग्गज और दमदार अभिनेता सनी देओल और अक्षय खन्ना लंबे समय बाद एक साथ कोर्टरूम ड्रामा फिल्म ‘इक्का’ (Ikka) लेकर बड़े पर्दे पर लौटे हैं। सिद्धार्थ पी मल्होत्रा के निर्देशन में बनी इस फिल्म को लेकर सिनेमाप्रेमियों के बीच काफी समय से जबरदस्त बज बना हुआ था। सनी देओल का वकील का किरदार होना फैंस को उनकी आइकॉनिक फिल्म ‘दामिनी’ की याद दिला रहा था। 10 जुलाई 2026 को रिलीज हुई यह फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर कितनी खरी उतरी है, आइए जानते हैं इस डिटेल्ड मूवी रिव्यू में।
क्या है फिल्म ‘इक्का’ की कहानी?
फिल्म की कहानी को अल्थिया कौशल ने लिखा है। कहानी सोमा मित्तल (आकांक्षा रंजन कपूर) नाम की लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक रात शौर्यामन गौर (अक्षय खन्ना) के साथ पार्टी करती है। अगली सुबह सोमा सड़क पर अधमरी हालत में मिलती है। घटना का एकमात्र चश्मदीद गवाह शौर्यामन खुद ही है, जिसे पुलिस हत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार कर लेती है। एक बेहद रसूखदार और पावरफुल राजनेता होने के नाते, शौर्यामन जेल से बाहर आने के लिए देश के सबसे नामी वकील अर्जुन मेहरा (सनी देओल) को अपना केस लड़ने के लिए चुनता है।
शुरुआत में अर्जुन इस केस को हाथ में लेने से साफ मना कर देता है, लेकिन किस्मत का खेल देखिए—उसी दिन अर्जुन की बेटी को कैंसर होने का पता चलता है। इलाज के भारी-भरकम खर्च के कारण मजबूर होकर अर्जुन को शौर्यामन का केस स्वीकार करना पड़ता है, और यहीं से शुरू होती है ‘इक्का’ की कानूनी जंग।
कहां चूक गए फिल्म के मेकर्स? (Review)
एक बेहतरीन स्टारकास्ट और दमदार प्लॉट होने के बावजूद फिल्म स्क्रिप्ट के स्तर पर काफी कमजोर साबित होती है। कोर्टरूम ड्रामा फिल्मों की जान उसकी कानूनी बहस और सस्पेंस होते हैं, लेकिन ‘इक्का’ में कानूनी लड़ाई दिखाने के बजाय अर्जुन और शौर्यामन की पर्सनल लाइफ की कहानियों को ज्यादा तवज्जो दी गई है। अफसोस की बात यह है कि मेकर्स उन व्यक्तिगत कहानियों को भी स्क्रीन पर पूरी तरह से न्यायसंगत ढंग से नहीं उतार पाए।
अक्षय खन्ना के किरदार को देखते हुए उनकी पुरानी फिल्म ‘धुरंधर’ का हैंगओवर साफ नजर आता है। फिल्म में मर्डर केस के आरोपी को जिस तरह स्लो मोशन और लाउड बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ किसी सुपरहीरो की तरह कोर्ट में एंट्री करते दिखाया गया है, वह कोर्टरूम के माहौल से बिल्कुल मेल नहीं खाता।
कैसी है एक्टर्स की परफॉर्मेंस?
अभिनय के मोर्चे पर भी यह फिल्म निराश करती है:
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सनी देओल: पूरी फिल्म में बाकी किरदार सिर्फ यही डायलॉग दोहराते रहते हैं कि अर्जुन मेहरा कितना महान वकील है, लेकिन स्क्रीन पर उनके पास खुद को साबित करने वाला कोई ‘तारीख पर तारीख’ जैसा कड़क सीन नहीं है। सनी दर्शकों से इमोशनल कनेक्शन बनाने में नाकाम रहे।
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अक्षय खन्ना: अक्षय का रोल उनकी पुरानी फिल्मों के किरदारों जैसा ही घिसा-पिटा लगता है और उनकी अजीब विग भी स्क्रीन पर खटकती है।
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दीया मिर्जा: फिल्म ‘अल्फा’ में एक परेशान मां का रोल करने के बाद, दीया इस फिल्म में भी एक लाचार और बेबस मां के उसी पुराने टाइपकास्ट किरदार में नजर आई हैं।
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तिलोत्तमा शोम: एक बेहतरीन अदाकारा होने के बावजूद, उनके सरकारी वकील के किरदार को बेहद कमजोर और खराब तरीके से लिखा गया है।
फाइनल वर्डिक्ट: अगर आप ‘इक्का’ में किसी तीखे कानूनी दांव-पेंच या झकझोर देने वाले कोर्टरूम सस्पेंस की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म आपको निराश कर सकती है। सनी देओल और अक्षय खन्ना जैसे धुरंधरों की मौजूदगी के बावजूद यह फिल्म एक बहुत ही साधारण नोट पर खत्म होती है।
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