आसमान में गूंजेगी भारत की धाक: अमेरिका के साथ हुई ऐतिहासिक जेट इंजन डील

नई दिल्ली। भारत ने रक्षा क्षेत्र में एक ऐसी लंबी छलांग लगाई है जो आने वाले दशकों में भारतीय वायुसेना (IAF) की ताकत और ‘मेक इन इंडिया’ की तस्वीर बदल देगी। अमेरिका की दिग्गज कंपनी GE एयरोस्पेस और भारत की हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के बीच F414 जेट इंजन के संयुक्त उत्पादन को लेकर बड़ी सहमति बन गई है। इस ऐतिहासिक समझौते के साथ ही भारत दुनिया के उन गिने-चुने ‘एलीट’ देशों की सूची में शामिल हो जाएगा जिनके पास फाइटर जेट इंजन बनाने की अत्याधुनिक तकनीक मौजूद है।

रूस पर निर्भरता होगी खत्म, स्वदेशी लड़ाकू विमानों को मिलेगा ‘दिल’

इस डील का प्राथमिक उद्देश्य भारतीय वायुसेना का आधुनिकीकरण करना और हथियारों के लिए रूस पर दशकों पुरानी निर्भरता को कम करना है। भारत की योजना है कि इस शक्तिशाली इंजन का इस्तेमाल 120 से 130 अगली पीढ़ी के स्वदेशी लड़ाकू विमानों (जैसे तेजस Mk2) में किया जाए। अब तक भारत बेहतरीन विमान तो बना रहा था, लेकिन उनके इंजन के लिए विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था। इस समझौते के बाद भारत खुद अपना ‘इंजन’ तैयार कर सकेगा।

क्यों खास है यह समझौता? तकनीक का होगा हस्तांतरण

यह केवल इंजन खरीदने का सौदा नहीं है, बल्कि इसमें टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) यानी तकनीक का हस्तांतरण भी शामिल है। अमेरिका आमतौर पर अपनी जेट इंजन तकनीक किसी भी देश के साथ साझा नहीं करता है, लेकिन भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी और इंडो-पैसिफिक में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए जो बाइडेन प्रशासन ने इस डील को हरी झंडी दी है।

F414 इंजन: युद्ध के मैदान में परखा हुआ योद्धा

अमेरिकी नौसेना के लड़ाकू विमानों में दशकों से इस्तेमाल हो रहा F414 इंजन अपनी विश्वसनीयता के लिए जाना जाता है। इसे युद्ध की स्थितियों में पूरी तरह परखा जा चुका है। भारत में इसके सह-उत्पादन से न केवल सेना को ताकत मिलेगी, बल्कि घरेलू रक्षा उत्पादन शृंखला (Defense Supply Chain) में लाखों नौकरियों और तकनीकी विकास के द्वार खुलेंगे।

एलीट क्लब में भारत की एंट्री

वर्तमान में दुनिया के केवल चार-पांच देशों (अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन) के पास ही लड़ाकू विमानों के लिए इंजन बनाने की क्षमता है। इस समझौते के अंतिम रूप लेते ही भारत इस शक्तिशाली क्लब का स्थायी सदस्य बन जाएगा। यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में अब तक का सबसे ठोस कदम माना जा रहा है।

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