ट्रंप के ‘नरक का द्वार’ वाले बयान पर ईरान का पलटवार: भारत और चीन को बताया ‘सभ्यता की जननी’

तेहरान/वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत और चीन को ‘नरक का द्वार’ (Gates of Hell) बताने वाले विवादास्पद बयान पर अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति गरमा गई है। ट्रंप की इस टिप्पणी के खिलाफ ईरान खुलकर भारत और चीन के समर्थन में उतर आया है। ईरान ने न केवल ट्रंप को तीखा जवाब दिया है, बल्कि अमेरिका को उसकी अपनी सभ्यता और इतिहास की याद भी दिलाई है।

ईरान का करारा जवाब: “असली नरक का द्वार वह देश है…”

हैदराबाद स्थित ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर ट्रंप के बयान की कड़ी निंदा की। ईरान ने अपनी पोस्ट में लिखा:

“चीन और भारत सभ्यता की जननी (Cradle of Civilization) हैं। वास्तव में नरक के द्वार वह देश है, जिसका राष्ट्रपति ईरान जैसी प्राचीन सभ्यता को नष्ट करने की धमकी दे रहा था।”

ईरान का यह बयान उस संदर्भ में आया है जब ट्रंप ने अमेरिकी पॉडकास्टर माइकल सैवेज की एक नस्लीय पोस्ट को साझा किया था। ईरान ने स्पष्ट किया कि जिन देशों का इतिहास हजारों साल पुराना है, उन्हें अपमानित करना अमेरिका की अपनी संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है।

क्या था माइकल सैवेज का ‘नफरती’ दावा?

डोनाल्ड ट्रंप ने जिस वीडियो और ट्रांसक्रिप्ट को साझा किया, उसमें माइकल सैवेज ने बेहद आपत्तिजनक बातें कही थीं:

  • बर्थराइट सिटिजनशिप का विरोध: सैवेज का दावा है कि भारतीय और चीनी लोग अमेरिका आकर ‘जन्मजात नागरिकता’ के कानून का गलत फायदा उठाते हैं। वे यहाँ बच्चे पैदा करते हैं ताकि उनका पूरा परिवार ‘चेन माइग्रेशन’ के जरिए अमेरिका आ सके।

  • लैपटॉप वाले गैंगस्टर: सैवेज ने व्हाइट कॉलर जॉब करने वाले भारतीयों और चीनियों को ‘लैपटॉप वाले गैंगस्टर’ करार दिया।

  • नौकरियों पर कब्जे का आरोप: उन्होंने दावा किया कि एशियाई प्रवासियों की वजह से अमेरिका में श्वेत लोगों के लिए नौकरियां नहीं बची हैं और ये लोग स्थानीय अमेरिकियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते हैं।

सभ्यता बनाम अप्रवास: इतिहास की हकीकत

ईरान ने अपने जवाब में जिस ‘सभ्यता’ का जिक्र किया है, उसके पीछे गहरे ऐतिहासिक तर्क हैं:

  • प्राचीन गौरव: भारत और चीन जैसी सभ्यताएं पिछले 4,000 से अधिक वर्षों से अस्तित्व में हैं और उन्होंने विज्ञान, दर्शन और संस्कृति में विश्व का नेतृत्व किया है।

  • अमेरिका का उदय: इसके विपरीत, अमेरिका की स्थापना मात्र 1776 में हुई थी और इसकी नींव ही अप्रवासियों (Immigrants) ने रखी थी।

  • ट्रंप के पूर्वज: दिलचस्प बात यह है कि जब ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में अप्रवासियों के खिलाफ मुहिम शुरू की थी, तब जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्त्ज ने उन्हें उनके पूर्वज का बर्थ सर्टिफिकेट भेंट कर याद दिलाया था कि वे खुद भी एक अप्रवासी परिवार से ताल्लुक रखते हैं।

अदालती जंग और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

अमेरिका में जन्मजात नागरिकता का मुद्दा फिलहाल कानूनी पेचीदगियों में फंसा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने कई बार इस कानून को चुनौती दी है, लेकिन निचली अदालतों से उन्हें झटका लगा है। फिलहाल यह मामला अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। सैवेज जैसे दक्षिणपंथी विचारकों का तर्क है कि इस पर कानून नहीं बल्कि ‘जनमत’ (Public Opinion) के आधार पर फैसला होना चाहिए, जो सीधे तौर पर अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने जैसा है।

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